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कोरबा राजस्व विभाग में आखिर कौन बदल देता है सरकारी फैसले?

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पहले अनुमति… फिर खुद ही निरस्त… और कुछ महीनों बाद फिर वही अनुमति!

 

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क्या सरकारी आदेश अब कानून से नहीं, फाइलों की दिशा से तय होंगे?

 

विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

कोरबा।  कोरबा के राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। उपलब्ध सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि एक ही प्रकरण में प्रशासन ने पहले वृक्षों के स्थानांतरण/कटाई की अनुमति दी, फिर स्वयं उसी आदेश को निरस्त कर दिया और कुछ ही महीनों बाद फिर उसी कार्य की अनुमति जारी कर दी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड, कानून और न्यायिक आदेश आखिर इतने कम समय में बदल गए, या केवल प्रशासनिक निर्णय बदल गया?

यदि जून 2025 में पारित आदेश में यह कहा गया कि संबंधित भूमि, वन क्षेत्र और न्यायालयीन आदेशों के कारण अनुमति टिक नहीं सकती, तो नवंबर 2025 में ऐसा कौन-सा नया तथ्य सामने आया जिसने पूरे निर्णय को पलट दिया? यह प्रश्न दस्तावेज़ों से स्पष्ट नहीं होता।

क्या कानून बदल गया या सिर्फ आदेश बदल गया?

 

सरकारी फाइलें केवल कागज़ नहीं होतीं, वे शासन की विश्वसनीयता का आधार होती हैं। जब एक ही मामले में कुछ महीनों के भीतर परस्पर विपरीत आदेश पारित होते हैं, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

यदि पहला आदेश सही था, तो दूसरा क्यों?
यदि दूसरा सही है, तो पहला क्यों?

दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते।

जवाब कौन देगा?
क्या राजस्व विभाग विस्तृत कारण सार्वजनिक करेगा?
क्या दोनों आदेशों का तुलनात्मक परीक्षण कराया जाएगा?
क्या यह बताया जाएगा कि कौन-से नए तथ्य या कानूनी आधार पर निर्णय बदला गया?
क्या इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच होगी?

प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न

यह मामला केवल 172 वृक्षों का नहीं है। यह शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी आदेश किसी स्पष्ट कानूनी आधार पर बदलते हैं या बिना सार्वजनिक कारण बताए भी पलट सकते हैं।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की मांग

 

  • इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि—
  • दोनों आदेशों के बीच हुए तथ्यों और कानूनी आधार का विस्तृत श्वेतपत्र जारी करें।
  • संबंधित अधिकारियों का स्पष्टीकरण सार्वजनिक करें।
  • यदि कोई नया तथ्य सामने आया था, तो उसे भी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए।

पूरे मामले की स्वतंत्र प्रशासनिक समीक्षा कराई जाए ताकि भविष्य में ऐसे विरोधाभासी आदेशों पर अनावश्यक विवाद न हो।

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