NOC विवाद पर हाईकोर्ट सख्त: वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की प्रभावी पैरवी के बाद सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) नियुक्ति मामले में 120 दिन में जांच के निर्देश


उच्च शिक्षा विभाग और CGPSC को हाईकोर्ट का आदेश; भर्ती नियमों के पालन और NOC प्रक्रिया की होगी जांच
बिलासपुर/रायगढ़। छत्तीसगढ़ में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) की नियुक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण विवाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) को 120 दिनों के भीतर पूरे मामले की जांच कर विधि अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह मामला वर्ष 2019 की भर्ती प्रक्रिया में अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) से संबंधित नियमों के कथित पालन न किए जाने के आरोपों से जुड़ा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने रखा मजबूत पक्ष
इस मामले में याचिकाकर्ता अली हसन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने प्रभावी और तथ्याधारित पैरवी की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि भर्ती विज्ञापन में सरकारी सेवा में कार्यरत अभ्यर्थियों के लिए नियोक्ता से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रस्तुत करना अनिवार्य था, इसलिए यदि किसी चयनित अभ्यर्थी ने निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया है तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने न्यायालय के समक्ष उपलब्ध दस्तावेजों, सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त अभिलेखों तथा भर्ती विज्ञापन की शर्तों का उल्लेख करते हुए कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों का समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनकी दलीलों के बाद न्यायालय ने आरोपों को प्रथम दृष्टया जांच योग्य मानते हुए संबंधित विभागों को जांच का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता अली हसन, जो अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर थे, ने आरोप लगाया कि मुख्य चयन सूची में चयनित रंजन तिवारी हरियाणा सरकार में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत थे, लेकिन उन्होंने CGPSC के विज्ञापन में निर्धारित शर्तों के अनुरूप अपने नियोक्ता का NOC प्रस्तुत नहीं किया, जबकि यह भर्ती प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त थी।
RTI से सामने आए दस्तावेज
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त अभिलेखों के अनुसार—
हरियाणा उच्चतर शिक्षा निदेशालय के रिकॉर्ड में रंजन तिवारी 13 फरवरी 2020 से शासकीय महाविद्यालय, महेंद्रगढ़ में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) के पद पर कार्यरत बताए गए।
वहीं, शासकीय महाविद्यालय भाटापारा से प्राप्त RTI उत्तर के अनुसार उन्होंने 23 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण किया, लेकिन उस समय कार्यालय में NOC प्रस्तुत होने का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं बताया गया।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता ने भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता पर प्रश्न उठाए।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने 2 जुलाई 2026 को पारित आदेश में कहा कि केवल प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर होने के आधार पर नियुक्ति का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि चयनित अभ्यर्थी के पद ग्रहण करने के बाद प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि NOC प्रस्तुत न किए जाने का आरोप जांच योग्य है। इसलिए उच्च शिक्षा विभाग के सचिव तथा छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया गया कि वे पूरे मामले की जांच कर 120 दिनों के भीतर विधि अनुसार उचित निर्णय लें।
अब जांच के केंद्र में होंगे ये सवाल
क्या सरकारी सेवा में कार्यरत अभ्यर्थियों के लिए NOC अनिवार्य था?
यदि था, तो उसका सत्यापन किस स्तर पर किया गया?
क्या भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का समान रूप से पालन हुआ?
यदि जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित विभाग क्या कार्रवाई करेगा?
आगे की निगाह जांच रिपोर्ट पर
अब इस पूरे मामले की दिशा उच्च शिक्षा विभाग और CGPSC की जांच रिपोर्ट तय करेगी। हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार दोनों संस्थाओं को 120 दिनों के भीतर जांच पूरी कर कानून के अनुरूप निर्णय लेना होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की पैरवी के बाद आए इस आदेश को भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के समान अनुपालन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही, यह मामला भविष्य की सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।

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