सिजिमाली से कोरबा तक: क्या कॉरपोरेट खनन के आगे झुक रहा है जंगलों का कानून?
आदिवासियों की पुकार, जंगलों की चीख और अदालतों में लंबित न्याय की कहानी

भारत में “विकास” और “पर्यावरण संरक्षण” के बीच संघर्ष कोई नया नहीं है। लेकिन ओडिशा के सिजिमाली पहाड़ और छत्तीसगढ़ के कोरबा क्षेत्र से उठ रही आवाजें अब एक बड़े राष्ट्रीय सवाल में बदलती दिख रही हैं —
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ओडिशा के सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना के लिए वन भूमि डायवर्जन को मंजूरी दिए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में लंबित होने के बावजूद स्वीकृति मिलने से पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और आदिवासी समुदायों में भारी नाराजगी है।
सिजिमाली: जहां पहाड़ सिर्फ पत्थर नहीं, आस्था हैं
ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में स्थित सिजिमाली पहाड़ स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र हैं।
यहाँ प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर ग्रामीणों का आरोप है कि:
- ग्राम सभाओं में वास्तविक सहमति नहीं ली गई,
- वन अधिकार कानूनों की अनदेखी हुई,
- और परियोजना को चरणों में बाँटकर पर्यावरणीय अनुमति हासिल की गई।
ग्रामीणों का कहना है कि:
NGT में चुनौती, फिर भी मिली मंजूरी
सड़क निर्माण के लिए लगभग 4.9 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरण को लेकर मामला अभी भी National Green Tribunal में विचाराधीन है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि:
- सड़क को मुख्य खनन परियोजना से अलग दिखाया गया,
- ताकि Forest Rights Act और पर्यावरणीय जांच को कमजोर किया जा सके।
इसके बावजूद केंद्र सरकार द्वारा अंतिम वन स्वीकृति दिए जाने ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
कोरबा: “ऊर्जा राजधानी” या जंगलों का संकट क्षेत्र?
छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला पहले से ही पर्यावरणीय संकट का प्रतीक माना जाता रहा है।
कोयला खनन, ताप विद्युत परियोजनाओं और भारी उद्योगों के कारण:
- हजारों एकड़ वन क्षेत्र प्रभावित हुए,
- आदिवासी विस्थापन बढ़ा,
- और प्रदूषण लगातार गंभीर होता गया।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का आरोप है कि:
- कई क्षेत्रों में वन भूमि पर अवैध कब्जे हुए,
- बिना वैधानिक प्रक्रिया निर्माण कार्य किए गए,
- और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई।
इनमें से कुछ मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएँ लंबित बताई जा रही हैं।
आरोप क्या हैं?
स्थानीय संगठनों के अनुसार:
- सैकड़ों एकड़ वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण,
- वन स्वीकृति के बिना निर्माण,
- पर्यावरणीय शर्तों का उल्लंघन,
- और वन क्षेत्र में औद्योगिक विस्तार।
हालांकि इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी लंबित है, लेकिन पर्यावरण समूहों का कहना है कि:
विकास बनाम पर्यावरण: असली लड़ाई क्या है?
भारत जैसे विकासशील देश में उद्योग और खनन आवश्यक माने जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि:
- क्या विकास स्थानीय समुदायों की कीमत पर होगा?
- क्या जंगलों को केवल “खनिज भंडार” मान लिया जाएगा?
- क्या पर्यावरणीय कानून सिर्फ औपचारिकता बनते जा रहे हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- Forest Rights Act,
- PESA कानून,
- और पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)
का उद्देश्य केवल कागजी मंजूरी नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करना था।
नियामगिरि से सिजिमाली तक
ओडिशा में पहले भी:
Niyamgiri Anti-Mining Movement
खनन विरोधी आंदोलन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था।
उस मामले में:
- ग्राम सभाओं ने खनन का विरोध किया,
- सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता दी,
- और अंततः परियोजना रोक दी गई।
सिजिमाली विवाद अब उसी संघर्ष की नई कड़ी माना जा रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
- पहाड़ी खनन से जल स्रोत प्रभावित होते हैं,
- जंगल कटने से तापमान और मिट्टी कटाव बढ़ता है,
- हाथियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग टूटते हैं,
- और आदिवासी संस्कृति पर स्थायी असर पड़ता है।
न्यायपालिका की भूमिका पर उम्मीद
पर्यावरण समूहों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि:
- NGT और सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना चाहिए,
- वन अधिकार कानूनों का वास्तविक पालन सुनिश्चित होना चाहिए,
- और पर्यावरणीय मंजूरियों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल
या फिर जंगल, जल और आदिवासी अधिकार धीरे-धीरे औद्योगिक विस्तार की कीमत बनते जाएंगे?
संबंधित संस्थाएँ
- Vedanta Limited
- National Green Tribunal
- Forest Rights Act
- Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act
स्रोत
- The Wire रिपोर्ट
- Vedanta Limited आधिकारिक वेबसाइट
जल बचेगा तो जीवन बचेगा।
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