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देखिए कलेक्टर साहब ! कोरबा मेडिकल कॉलेज में फिर ‘खेला’ — फर्जी एक्सटेंशन के बाद अब नियमों को रौंदता 2 करोड़ का टेंडर

कोरबा। भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुके कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक बार फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है। जब से मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर की यहां पदस्थापना हुई है, तब से इलाज से ज्यादा चर्चा टेंडर, एक्सटेंशन और “सेटिंग” की हो रही है।

डॉ. कंवर के इस खेल में उनका सबसे भरोसेमंद नोडल अधिकारी डॉ. राकेश कुमार वर्मा की भूमिका भी लगातार सवालों के घेरे में है। वैसे तो डॉ. वर्मा शिशु रोग विभाग के प्रमुख हैं, लेकिन इन दिनों वे बच्चों के इलाज की बजाय एमएस के दफ्तर—ट्रामा सेंटर की दूसरी मंज़िल—में ज्यादा नजर आ रहे हैं।

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मरीजों के खाने में भी मलाई!

ताज़ा मामला मरीजों को वितरित किए जाने वाले भोजन (डाइट सर्विस) के टेंडर से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक मेडिकल कॉलेज के लिए GEM पोर्टल पर Medical College Diet Service के नाम से टेंडर क्रमांक 2025/B/7048823 अपलोड किया गया है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 2 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह वही काम है जो पिछले एक साल से अवैध एक्सटेंशन पर चल रहा था। आदेश में जहां सिर्फ 6 माह के एक्सटेंशन की अनुमति थी, वहां पूरे एक साल तक ठेकेदार को खुली छूट दी गई।

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प्री-बिड शर्तें ऐसी कि कोई और आए ही न!

सूत्रों का दावा है कि मनपसंद ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर की प्री-बिड शर्तों में जानबूझकर मनमाने और जटिल नियम जोड़े गए हैं, ताकि कोई दूसरी एजेंसी प्रतिस्पर्धा में शामिल ही न हो सके। यानी टेंडर बाहर से खुला, अंदर से पूरी तरह फिक्स।

तारीखों में भी हेराफेरी

27 दिसंबर 2025 को टेंडर जारी किया गया और इसे खोलने की तारीख 17 जनवरी तय की गई। जबकि छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 (संशोधित 2022/2024) के अनुसार 10 लाख रुपये से अधिक के किसी भी टेंडर के लिए न्यूनतम 30 दिन का समय देना अनिवार्य है।

यहां नियमों को खुलेआम नजरअंदाज कर दिया गया। गौरतलब है कि 31 दिसंबर को इस टेंडर को एक्सटेंशन दिए पूरे एक साल हो जाते, और उससे ठीक पहले नया टेंडर जारी कर दिया गया।

कलेक्टर ने उठाई गुणवत्ता पर उंगली, फिर भी ‘सब बढ़िया’ का बहाना

हैरानी की बात यह है कि हाल ही में नवपदस्थ कलेक्टर कुणाल दुदावत ने अस्पताल में मरीजों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता पर आपत्ति भी जताई थी, इसके बावजूद पहले एक्सटेंशन देते समय रिकॉर्ड में यह लिखा गया कि “खाने की गुणवत्ता बहुत अच्छी है।”

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पहले भी हो चुका है खेल

यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले हाउसकीपिंग और सफाई के काम में नियमों को ताक पर रखकर एक निजी एजेंसी को ठेका दिया गया, जो डेढ़ साल तक एक्सटेंशन पर चलता रहा। वहीं, सिक्योरिटी सेवा का टेंडर तो पूरे दो साल से एक्सटेंशन पर ही चल रहा है।

मरीजों की संख्या में भी ‘फेरबदल’?

सूत्रों के अनुसार खाने के काम में मरीजों की संख्या में हेराफेरी कर जमकर बंदरबांट की जाती रही है। आशंका जताई जा रही है कि इस बार भी वही पुरानी पसंदीदा एजेंसी को काम देने की तैयारी चल रही है।

अब सवाल सीधे कलेक्टर से

नियमों को रौंदकर टेंडर किसके इशारे पर निकाला गया? फर्जी एक्सटेंशन का जिम्मेदार कौन है? मरीजों के नाम पर 2 करोड़ रुपये की मलाई आखिर किसकी थाली में जा रही है?

देखना यह है कि कलेक्टर साहब इस ‘खेल’ पर कब सीटी बजाते हैं या फिर कोरबा मेडिकल कॉलेज ऐसे ही भ्रष्टाचार का अखाड़ा बना रहेगा।

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