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बरबसपुर राखड़ भराव: पीयूष राजपूत की सहमति पर सवाल, प्रसन्ना सोनकर की अनुमति का आधार क्या?

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1.65 लाख टन के बाद 2.30 लाख टन अतिरिक्त राख की अनुमति का मामला—निगम अभियंता की सहमति, पर्यावरण विभाग की तकनीकी जांच और वास्तविक भराव का रिकॉर्ड सामने आए; कलेक्टर से स्वतंत्र जांच की मांग

 

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कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क बरबसपुर डंपिंग यार्ड में राखड़ भराव के मामले में अब जवाबदेही का सवाल दो कार्यालयों के बीच खड़ा है। पर्यावरण विभाग नगर निगम के अभियंता की सहमति का हवाला दे रहा है, जबकि निगम स्तर से अतिरिक्त भराव की अनुमति पर सवाल उठने की खबर सामने आई है। ऐसे में निर्णय का आधार बयान नहीं, मूल दस्तावेज होने चाहिए।

नगर निगम के कार्यपालन अभियंता पीयूष राजपूत ने किस मात्रा और किस क्षेत्रफल के लिए सहमति दी?

क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी प्रसन्ना सोनकर के कार्यालय ने अनुमति से पहले क्या तकनीकी परीक्षण किया?

और स्वीकृति के बाद वास्तविक भराव की निगरानी किसने की?

 

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इन सवालों पर जिला प्रशासन से स्वतंत्र, समयबद्ध और दस्तावेज आधारित जांच की मांग करता है। 

 

सोनकर के प्रकाशित बयान से राजपूत की सहमति जांच का अहम विषय 15 अक्टूबर 2026 की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी प्रसन्ना सोनकर ने दूसरे चरण में राख डालने की अनुमति नगर निगम के कार्यपालन अभियंता पीयूष राजपूत की सहमति के बाद दिए जाने की बात कही है। उसी रिपोर्ट में CSEB के कार्यपालन अभियंता विनय सोनी ने भी नगर निगम के पत्र को आधार बताया है। मूल सहमति पत्र और अनुमति आदेश का परीक्षण अभी शेष है।

इस प्रकाशित पक्ष के बाद पीयूष राजपूत के स्तर से हुए पत्राचार की जांच आवश्यक है। सहमति किस प्रस्ताव पर दी गई, उसमें कितनी मात्रा दर्ज थी और उसे जारी करने का अधिकार किस आदेश से प्राप्त था—यह निगम को स्पष्ट करना चाहिए।  राजपूत की सहमति का उल्लेख अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन अनुमति प्रक्रिया में उस पत्र की भूमिका बताई गई है, इसलिए उसे जांच से बाहर भी नहीं रखा जा सकता।

3.95 लाख टन की अनुमति का उल्लेख—तकनीकी गणना कहां है?

 

प्रकाशित समाचारों में पहले 1.65 लाख टन और दूसरे चरण में 2.30 लाख टन अतिरिक्त राख की अनुमति का उल्लेख है। यदि दोनों अलग और संचयी स्वीकृतियां हैं, तो कुल मात्रा 3.95 लाख टन बनती है। इसकी पुष्टि मूल आदेशों से होनी चाहिए।

  इतनी राख की आवश्यकता किस सर्वे से निर्धारित हुई?

जमीन का प्रारंभिक स्तर क्या था?

भराव कितने क्षेत्रफल में और कितनी ऊंचाई तक प्रस्तावित था?

पहली मात्रा के बाद अतिरिक्त भराव की जरूरत क्यों पड़ी?

 

इन प्रश्नों का जवाब स्वीकृत नक्शे, स्तर मापन और तकनीकी गणना से आना चाहिए। आदेश में टन लिख देने से जमीन की जरूरत प्रमाणित नहीं हो जाती।

पर्यावरण विभाग केवल सहमति का हवाला देकर जवाब पूरा नहीं कर सकता

 

नगर निगम की सहमति अनुमति प्रक्रिया का एक दस्तावेज हो सकती है। लेकिन पर्यावरण विभाग को अपने स्तर पर किए गए परीक्षण और निगरानी का हिसाब भी देना होगा।  प्रसन्ना सोनकर का कार्यालय बताए कि अनुमति से पहले स्थल निरीक्षण किसने किया। धूल नियंत्रण, मिट्टी से ढकाव, जल निकासी और भराव सीमा के लिए क्या शर्तें निर्धारित की गईं? उनका पालन जांचने के लिए कितनी बार निरीक्षण हुआ?

ट्रक आते रहे तो प्राप्त मात्रा का रिकॉर्ड कहां है? निरीक्षण हुआ तो दिनांकित रिपोर्ट कहां है? शर्तों का उल्लंघन मिला तो कार्रवाई क्या हुई?  यदि सभी शर्तों का पालन हुआ है, तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने से स्थिति स्पष्ट होगी। यदि निगरानी में कमी रही है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

बायोगैस परियोजना के लिए समतलीकरण या अतिरिक्त राख निपटान?

 

प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बरबसपुर डंपिंग यार्ड में बायोगैस प्लांट के लिए नगर निगम और गेल इंडिया के बीच अनुबंध तथा जमीन समतलीकरण के पत्राचार का संदर्भ है। इसी प्रक्रिया से राख भराव की अनुमति जुड़ी बताई गई है।   जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि स्वीकृत मात्रा परियोजना की तकनीकी आवश्यकता के अनुरूप थी या नहीं। अतिरिक्त भराव का प्रस्ताव किसने दिया और उसकी जरूरत किस सक्षम तकनीकी अधिकारी ने प्रमाणित की?

सार्वजनिक परियोजना की जमीन पर प्रत्येक अतिरिक्त मात्रा का औचित्य होना चाहिए। जमीन समतलीकरण का उद्देश्य और वास्तविक भराव आपस में मेल खाते हैं या नहीं—यही जांच का महत्वपूर्ण प्रश्न है।

निगम अपनी फाइल भी खोले

नगर निगम की भूमिका दूसरे विभाग से स्पष्टीकरण मांगने तक सीमित नहीं रह सकती। जिस सहमति का हवाला दिया जा रहा है, वह उसके अपने कार्यालय की है।  पीयूष राजपूत से संबंधित पत्राचार, सक्षम अधिकारी का अनुमोदन, प्रस्तावित क्षेत्रफल और मात्रा की जानकारी जांच के सामने रखी जाए। यदि सहमति सीमित थी, तो उसकी सीमा स्पष्ट हो। यदि अतिरिक्त मात्रा भी मंजूर थी, तो उसका तकनीकी और प्रशासनिक आधार सामने आए।

जवाबदेही तभी पूरी होगी जब अनुमति देने वाले और सहमति भेजने वाले—दोनों कार्यालयों के रिकॉर्ड एक साथ जांचे जाएंगे।

पांच लाख टन और भुगतान के दावे की पुष्टि जरूरी

ग्राम यात्रा को प्राप्त सूचना में पांच लाख टन से अधिक राख भराव और ₹50–₹60 प्रति टन भुगतान का दावा किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इन्हें प्रमाणित मात्रा, भुगतान या घोटाले की रकम नहीं माना जा सकता।

फिर भी इनकी जांच का रास्ता स्पष्ट है। प्लांटवार राख निर्गमन, वाहनवार तौल पर्चियां, स्थल प्राप्ति रजिस्टर, परिवहन बिल और भुगतान अभिलेखों का मिलान किया जाए।  यदि पांच लाख टन से अधिक भराव का दावा उसी भूखंड और उन्हीं अनुमतियों से संबंधित है, तो स्वीकृत मात्रा से उसका अंतर निर्धारित हो। भुगतान हुआ हो तो स्पष्ट किया जाए कि वह परिवहन, समतलीकरण अथवा किस अन्य कार्य के लिए था और किसे दिया गया।  राख का वजन तौल से और रकम का रास्ता भुगतान रिकॉर्ड से सामने आएगा—अनुमान से नहीं।

पुराने रिकॉर्ड को वर्तमान अनुमति का विकल्प न बनाया जाए

 

एनजीटी की वेबसाइट पर उपलब्ध जून 2022 की समिति रिपोर्ट में बरबसपुर वेस्टलैंड डंपिंग यार्ड के निकट एक स्थल पर अनुमत राख भराव, मिट्टी से ढकाव और परिवहन नगर के रूप में विकास का उल्लेख है। यह विवरण वर्तमान विवाद वाले भूखंड और वर्तमान कार्य की अनुमति का प्रमाण नहीं है।

इसलिए जांच में वर्तमान स्थल का खसरा, सीमांकन, स्वीकृत नक्शा और प्रत्येक अनुमति की अवधि स्पष्ट की जाए। अलग भूखंडों और अलग वर्षों के रिकॉर्ड को केवल बरबसपुर नाम के आधार पर एक नहीं माना जा सकता।

कलेक्टर स्वतंत्र सर्वे कराएं, निष्कर्ष सार्वजनिक हों

जिला कलेक्टर को मूल अनुमति पत्र, निगम की सहमति, निरीक्षण रिपोर्ट और परिवहन व भुगतान अभिलेख सुरक्षित कराकर स्वतंत्र तकनीकी जांच करानी चाहिए।

स्थल का सीमांकन और स्तर सर्वे हो। उपलब्ध पुराने मापों से वर्तमान भराव का मिलान किया जाए। उपग्रह या ड्रोन चित्रों का उपयोग क्षेत्रफल और समय के साथ बदलाव की पड़ताल में किया जा सकता है; केवल तस्वीर देखकर राख का टन भार निर्धारित नहीं किया जा सकता।  जांच में उल्लंघन मिले तो आगे भराव रोकने, पर्यावरणीय सुधार और जिम्मेदार अधिकारियों व एजेंसियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। निष्कर्ष सार्वजनिक हों।

 

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का सवाल सीधा है—

 

पीयूष राजपूत की सहमति में क्या था, प्रसन्ना सोनकर के कार्यालय ने क्या परखा और जमीन पर वास्तव में कितना भराव हुआ?

बरबसपुर का हिसाब दूसरे कार्यालय का नाम बताने से पूरा नहीं होगा। सहमति, अनुमति, तौल और निरीक्षण—चारों रिकॉर्ड सामने रखिए। अंतर जहां मिले, जिम्मेदारी वहीं तय कीजिए।

तथ्य स्थिति: मूल सहमति पत्र, अनुमति आदेश और वर्तमान भराव का स्वतंत्र सर्वे उपलब्ध नहीं है। प्रसन्ना सोनकर का पक्ष प्रकाशित समाचार के आधार पर शामिल है; पीयूष राजपूत का प्रत्यक्ष पक्ष उपलब्ध नहीं है। पांच लाख टन भराव और प्रति टन भुगतान संबंधी दावे अपुष्ट हैं। किसी अधिकारी की मिलीभगत या अनियमितता सिद्ध नहीं मानी गई है।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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