जमीन SECL की, सौदा करोड़ों का! कुसमुंडा पेट्रोल पंप में ₹1.20 करोड़ से ₹2.35 करोड़ तक का कथित ‘खेल’ किसके संरक्षण में?

विश्वजीत, पप्पू पटेल और रहस्यमय तीसरे व्यक्ति की कथित मध्यस्थ भूमिका—SECL ने खाली कराने का आदेश दिया, नया अनुबंध ठुकराया; फिर भी पंप चलता रहा और सौदे की रकम बढ़ती गई!
देवजानी मजुमदार से पंप और HIG मकान का कथित सौदा ₹1.20 करोड़ में—फिर तीवरता समूह तक ₹2.35 करोड़ में पहुंचा मामला; जमीन बेचने का अधिकार नहीं तो करोड़ों में आखिर बेचा क्या गया?
कोरबा। जमीन सार्वजनिक उपक्रम SECL की। मूल अनुबंध की अवधि सीमित। कंपनी का लिखित आदेश—परिसर खाली करो। दूसरा पत्र—नया अनुबंध नहीं मिलेगा और जमा किराया वापस ले जाओ। इसके बाद हाईकोर्ट से केवल खाली कराने वाले पत्र के प्रभाव पर अंतरिम रोक।
फिर भी पेट्रोल पंप चलता रहा, करोड़ों रुपये के कथित सौदों की पटकथा लिखी जाती रही और जिम्मेदार कार्यालयों में ऐसी खामोशी पसरी रही, मानो सरकारी जमीन पर निजी कारोबार की मंडी लगने से किसी को कोई सरोकार ही न हो!
कुसमुंडा स्थित मेसर्स कोरबा सर्विस स्टेशन प्रकरण में सामने आए नए आरोप इस मामले को सामान्य लीज विवाद से निकालकर संभावित बिचौलिया नेटवर्क, मनी ट्रेल और संस्थागत निष्क्रियता की गंभीर जांच तक ले जाते हैं।
सूत्रों एवं शिकायतकर्ता का दावा है कि पंप की पूर्व संचालक/प्रोपराइटर देवजानी मजुमदार से पेट्रोल पंप से जुड़े कथित व्यावसायिक हित और कोरबा स्थित एक HIG मकान का सौदा लगभग ₹1.20 करोड़ में कराया गया।
इस कथित सौदे में विश्वजीत, पप्पू पटेल—जिन्हें मुस्कान पेट्रोल पंप का संचालक बताया गया है—और एक अन्य अज्ञात व्यक्ति की सक्रिय मध्यस्थ भूमिका होने का आरोप है।
लेकिन कथित खेल यहीं समाप्त नहीं हुआ।
दावा है कि बाद में उसी पेट्रोल पंप के कब्जे, संचालन अथवा व्यावसायिक नियंत्रण को तीवरता समूह तक लगभग ₹2.35 करोड़ में पहुंचाने की सौदेबाजी हुई।
ये आरोप अभी बैंकिंग अथवा न्यायिक जांच से प्रमाणित नहीं हैं। मगर यदि सौदों की यह श्रृंखला सही है तो सबसे जहरीला सवाल दस्तावेजों से ही निकलता है—
जिस जमीन को बेचने का अधिकार किसी निजी पक्ष के पास था ही नहीं, उस जमीन पर ₹2.35 करोड़ में आखिर बेचा क्या गया?
क्या रकम पेट्रोल पंप की डीलरशिप के लिए थी?
क्या कब्जे की कीमत लगाई गई?
क्या संचालन का नियंत्रण बेचा गया?
या फिर SECL की कार्रवाई रुकवाने की कथित क्षमता को भी सौदे का हिस्सा बनाकर प्रस्तुत किया गया?
₹1.20 करोड़ में कथित खरीद, ₹2.35 करोड़ में कथित अगला सौदा—₹1.15 करोड़ का अंतर किसकी जेब का सपना था?
सूत्रों के दावे के अनुसार कथित सौदे की पहली सीढ़ी पर देवजानी मजुमदार से पेट्रोल पंप के कथित व्यावसायिक हित और एक HIG मकान को लगभग ₹1.20 करोड़ में लेने की बात सामने आती है। दूसरी सीढ़ी पर उसी पंप से जुड़े कथित कब्जे, संचालन अथवा कारोबारी नियंत्रण को तीवरता समूह के पास ₹2.35 करोड़ में पहुंचाने का आरोप है। यदि दोनों आंकड़े सही पाए जाते हैं तो दोनों सौदों के बीच लगभग ₹1.15 करोड़ का अंतर है।
क्या यह अंतर केवल मुनाफा था?
क्या इसमें बिचौलियों का कमीशन शामिल था?
क्या किसी अधिकारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति तक रकम पहुंचाने का दावा किया गया?
क्या खरीदार को सरकारी जमीन पर निर्बाध संचालन का भरोसा बेचा गया?
इन प्रश्नों का उत्तर बयानबाजी से नहीं, बल्कि बैंक खातों, संपत्ति दस्तावेजों, मोबाइल संदेशों और कॉल रिकॉर्ड से निकलेगा।
जांच एजेंसी को पता लगाना चाहिए—
– ₹1.20 करोड़ वास्तव में किसे और किस माध्यम से दिए गए?
– पेट्रोल पंप तथा HIG मकान की अलग-अलग कीमत क्या थी?
– HIG मकान की रजिस्ट्री और नामांतरण किसके नाम हुआ?
– क्या कोई Agreement to Sell, Receipt, Brokerage Agreement या शपथपत्र बनाया गया?
– ₹2.35 करोड़ की कथित रकम किसने प्रस्तावित अथवा स्वीकार की?
– भुगतान नकद, बैंकिंग, संपत्ति समायोजन या कंपनियों के खातों से हुआ?
– कथित मध्यस्थों को कितना कमीशन मिला?
– सौदे के समय SECL की भूमि और लीज की वास्तविक स्थिति खरीदार को बताई गई थी या नहीं?
यदि सरकारी जमीन पर कब्जे की कीमत वसूली गई तो यह सौदा नहीं—संभावित आर्थिक छल की जांच का विषय है।
विश्वजीत और पप्पू पटेल—सिर्फ परिचित या करोड़ों के कथित सौदे के सूत्रधार?
शिकायत में विश्वजीत तथा पप्पू पटेल, कथित मुस्कान पेट्रोल पंप संचालक, का नाम प्रमुखता से सामने आया है। एक तीसरे व्यक्ति की सक्रियता का भी दावा है, लेकिन उसकी पहचान अभी स्पष्ट नहीं है। नाम सामने आना अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। लेकिन करोड़ों रुपये के दो कथित सौदों के बीच यदि इन्हीं लोगों ने बैठकें कराईं, मूल्य तय कराया, पक्षों को मिलाया या भुगतान का रास्ता बनाया तो उनकी भूमिका की जांच अनिवार्य है।
विश्वजीत और पप्पू पटेल से पूछा जाना चाहिए—
1. क्या वे देवजानी मजुमदार और कथित खरीदारों के बीच हुई बैठकों में शामिल थे?
2. क्या उन्होंने पेट्रोल पंप अथवा HIG मकान की कीमत तय कराने में भूमिका निभाई?
3. क्या उन्होंने किसी पक्ष से कमीशन, ब्रोकरेज या सुविधा शुल्क लिया?
4. क्या उनके मोबाइल से देवजानी मजुमदार, तीवरता समूह अथवा पंप संचालकों से संपर्क हुआ?
5. क्या उन्होंने SECL, IOCL अथवा किसी प्रशासनिक अधिकारी से संपर्क कराने का दावा किया?
6. क्या उनके पास कथित सौदों से जुड़े संदेश, दस्तावेज, रसीद या भुगतान का कोई रिकॉर्ड है?
7. रहस्यमय तीसरा मध्यस्थ कौन है और उसकी भूमिका क्या थी?
संबंधित पक्ष अपना जवाब देकर आरोपों का खंडन कर सकते हैं। लेकिन जवाब आने से पहले सवालों को दबा देना खोजी पत्रकारिता नहीं होगा।
तीन वर्ष की लीज को 99 वर्ष का चोला किसने पहनाया?
SECL के उपलब्ध पत्रों के अनुसार मेसर्स कोरबा सर्विस स्टेशन से संबंधित भूमि/भवन का Lease Agreement 27 मार्च 1991 को निष्पादित किया गया था। कंपनी के 3 सितंबर 2024 और 27 जनवरी 2025 के पत्रों में प्रारंभिक अवधि भवन पूर्ण होने के बाद तीन वर्ष बताई गई है। इसके विपरीत यदि 99 वर्ष के अधिकार का कोई दावा प्रस्तुत किया गया है तो वह दावा गंभीर फॉरेंसिक जांच की मांग करता है।
जांच में देखा जाए—
– 99 वर्ष वाला कथित दस्तावेज मूल है या प्रतिलिपि?
– उसे किस अधिकारी ने और किस अधिकार से निष्पादित किया?
– क्या सक्षम प्राधिकारी अथवा SECL बोर्ड की अनुमति थी?
– दस्तावेज पंजीकृत हुआ या नहीं?
– स्टाम्प, डिस्पैच और फाइल मूवमेंट का रिकॉर्ड कहां है?
– मूल तीन वर्ष वाले दस्तावेज और कथित 99 वर्ष वाले दस्तावेज की स्याही, कागज, टाइपिंग तथा हस्ताक्षरों में क्या अंतर है?
तीन वर्ष की व्यवस्था यदि कागजों में 99 वर्ष बन गई तो यह केवल टाइपिंग की भूल नहीं—सरकारी संपत्ति पर अधिकार की कहानी बदलने का संभावित प्रयास हो सकता है।
SECL ने कहा—30 दिन में खाली करो; लेकिन 30 महीने बाद भी कार्रवाई का हिसाब कहां?
SECL कुसमुंडा क्षेत्र द्वारा जारी पत्र क्रमांक SECL/KSM/GM/Per./2024/46, दिनांक 3 सितंबर 2024 में पंप स्थित भूमि/भवन को 30 दिन के भीतर खाली कर प्रबंधन को सौंपने का निर्देश दिया गया। पत्र में अनुबंध अवधि समाप्त होने, विस्तार स्वीकृत नहीं होने और खदान प्रभावित भू-विस्थापितों की बसाहट के लिए भूमि आवश्यक होने का उल्लेख है। लेकिन पत्र जारी करना कार्रवाई नहीं होता।
SECL बताए—
– 30 दिन पूरे होने पर संयुक्त निरीक्षण क्यों नहीं किया गया?
– कब्जा पंचनामा अथवा Site Possession Memo क्यों नहीं बनाया गया?
– जिला प्रशासन और पुलिस से सहायता मांगी गई या नहीं?
– IOCL को भूमि-अधिकार की वास्तविक स्थिति क्यों नहीं बताई गई?
– PESO तथा जिला तेल प्राधिकरण को लाइसेंस की समीक्षा के लिए क्या लिखा गया?
– पंप पर पेट्रोलियम आपूर्ति रोकने अथवा उसकी वैधानिक समीक्षा की मांग क्यों नहीं हुई?
यदि पत्र केवल दिखावे के लिए जारी हुआ और उसके बाद फाइल बंद कर दी गई तो यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं—जवाबदेही से बचने का कागजी पर्दा कहलाएगा।
जनवरी 2025 में साफ इनकार—“नया अनुबंध नहीं मिलेगा, किराया वापस लो” SECL ने 27 जनवरी 2025 के पत्र में देवजानी मजुमदार को बताया कि संबंधित भूमि कंपनी को आवश्यक है और नया अनुबंध/Lease Deed प्रदान नहीं किया जा सकता। पत्र में यह भी दर्ज किया गया कि 3 सितंबर 2024 के निर्देश के बाद भूमि सौंपने के बजाय किराया जमा कराया गया, जो उचित नहीं था। बैंक खाते का विवरण उपलब्ध कराने पर जमा रकम वापस करने की बात लिखी गई।
अर्थात जनवरी 2025 तक SECL की लिखित स्थिति बिल्कुल स्पष्ट थी—
– भूमि SECL को चाहिए;
– नया अनुबंध नहीं दिया जाएगा;
– पुरानी व्यवस्था को किराया जमा करके जीवित नहीं रखा जा सकता।
इसके बाद भी पंप चलता रहा तो यह पूछना अपराध नहीं, जनहित की जिम्मेदारी है— SECL का आदेश कमजोर था, अधिकारी कमजोर थे या करोड़ों के कथित सौदे की चमक ने कार्रवाई की आंखों पर पट्टी बांध दी?
हाईकोर्ट की अंतरिम रोक को वैधता का प्रमाण बताना तथ्य से खिलवाड़ होगा WPC No. 1559/2025, M/s Korba Service Station Retail Outlet IOCL बनाम SECL में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2025 को SECL के 3 सितंबर 2024 के Memo/Communication के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगाई।इस आदेश की सीमा साफ है।
न्यायालय ने उस आदेश में—
– पंप का भूमि स्वामित्व तय नहीं किया;
– कथित 99 वर्षीय लीज को प्रमाणित नहीं किया;
– डीलरशिप अथवा वास्तविक संचालन हस्तांतरण को वैध नहीं ठहराया;
– ₹1.20 करोड़ अथवा ₹2.35 करोड़ के किसी निजी सौदे को मंजूरी नहीं दी।
इसलिए अंतरिम राहत को स्थायी वैधता का प्रमाण बनाकर प्रस्तुत करना कानूनी स्थिति को तोड़-मरोड़कर दिखाना होगा। न्यायालय ने SECL को रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, अपना जवाब दाखिल करने, कथित सौदों की विभागीय जांच करने या अन्य प्राधिकरणों को तथ्यात्मक जानकारी देने से नहीं रोका था।
GM–CGM की मेज पर फाइल सोती रही या किसी ने उसे जानबूझकर सुलाया?
SECL कुसमुंडा के GM और संबंधित CGM को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए—
– हाईकोर्ट में कंपनी का विस्तृत जवाब कब दाखिल हुआ?
– मूल 1991 Lease File अभी कहां है?
– भूमि SECL के Asset Register और राजस्व रिकॉर्ड में किस स्थिति में दर्ज है?
– पेट्रोल पंप का वास्तविक संचालन वर्तमान में कौन कर रहा है?
– देवजानी मजुमदार के बाद किसी दूसरे पक्ष का नियंत्रण आया तो SECL को कैसे पता नहीं चला?
– कथित ₹1.20 करोड़ और ₹2.35 करोड़ के सौदों की शिकायत पर Vigilance जांच क्यों नहीं बैठी?
– IOCL, PESO और जिला तेल प्राधिकरण को कितने पत्र भेजे गए?
– यदि कोई पत्र नहीं भेजा गया तो निर्णय किस स्तर पर रोका गया?
– क्या इस मामले में जिम्मेदारी तय करने के लिए किसी अधिकारी को नोटिस दिया गया?
कार्रवाई नहीं हुई तो चुप्पी भी जांच के दायरे में आएगी—क्योंकि सरकारी संपत्ति पर निष्क्रियता कभी-कभी निजी खिलाड़ियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। SECL अधिकारियों पर आर्थिक मिलीभगत का आरोप बिना प्रमाण स्थापित नहीं किया जा सकता। लेकिन कंपनी के अपने पत्रों के बाद भी प्रभावी कार्रवाई न होना उनकी कार्यप्रणाली को अत्यंत संदिग्ध अवश्य बनाता है।
यदि अधिकारियों ने ईमानदारी से कार्रवाई की है तो पत्राचार सार्वजनिक करें। यदि कोई पत्राचार नहीं है तो बताएं—हाथ किसने बांधे थे?
क्या कथित सौदे में SECL के नाम और प्रभाव का भी कारोबार हुआ?
सूत्रों ने आशंका जताई है कि कथित बिचौलिया नेटवर्क ने सौदे को विश्वसनीय बनाने के लिए SECL के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच अथवा प्रबंधन से मामले को संभाल लेने की क्षमता का दावा किया हो सकता है। यह आशंका अभी प्रमाणित तथ्य नहीं है। मगर इसकी जांच जरूरी है। कॉल रिकॉर्ड, बैठक रजिस्टर, प्रवेश पास, मोबाइल लोकेशन और डिजिटल संदेश बता सकते हैं कि कथित मध्यस्थों ने सौदे की अवधि में किन अधिकारियों से संपर्क किया। यदि किसी अधिकारी का नाम केवल प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल हुआ तो संबंधित अधिकारी को स्वयं शिकायत दर्ज करानी चाहिए। और यदि संपर्क वास्तव में हुआ तो उसका उद्देश्य सार्वजनिक होना चाहिए।
IOCL बताए—डीलरशिप किसकी, संचालन किसका और पैसा किस खाते में?
IOCL अथवा संबंधित तेल कंपनी भी इस मामले में केवल दर्शक बनकर नहीं रह सकती।
उसे स्पष्ट करना चाहिए—
– डीलरशिप वर्तमान में किसके नाम स्वीकृत है?
– क्या कभी Reconstitution अथवा Constitution Change हुआ?
– वास्तविक पंप संचालक और लाभार्थी कौन है?
– भूमि अधिकार के प्रमाण में कौन-सा Lease Document जमा है?
– कंपनी ने तीन वर्ष और कथित 99 वर्ष में से किस अवधि को स्वीकार किया?
– SECL के 3 सितंबर 2024 और 27 जनवरी 2025 के पत्रों की जानकारी कब मिली?
– विवादित भूमि पर आपूर्ति किस नियम के तहत जारी रखी गई?
– क्या नियंत्रण बदलने अथवा किसी निजी सौदे की सूचना IOCL को दी गई?
– पंप की दैनिक बिक्री का पैसा किस बैंक खाते में जा रहा है?
डीलरशिप किसी को पेट्रोल बेचने का अधिकार दे सकती है, लेकिन SECL की जमीन बेचने अथवा उसका स्थायी कब्जा हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं। अब फाइल नहीं, मनी ट्रेल खुले—तभी करोड़ों के कथित खेल का सच निकलेगा
इस प्रकरण में केवल विभागीय नोटशीट पर्याप्त नहीं होगी। संयुक्त जांच में निम्न रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित किए जाने चाहिए—
– वर्ष 1991 का मूल Lease Agreement;
– कथित 99 वर्षीय दस्तावेज की फॉरेंसिक जांच;
– SECL की Estate, Personnel, Finance, Vigilance और Legal File;
– ₹1.20 करोड़ के कथित सौदे का Agreement एवं Payment Trail;
– HIG मकान की Registry, Mutation और भुगतान रिकॉर्ड;
– ₹2.35 करोड़ के कथित दूसरे सौदे से संबंधित दस्तावेज;
– देवजानी मजुमदार, कथित मध्यस्थों और खरीदार पक्ष के प्रासंगिक बैंक खाते;
– न्यायिक अनुमति के अधीन कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल संदेश;
– IOCL की Dealership तथा Reconstitution File;
– PESO Licence और स्वीकृत Site Plan;
– District Authority NOC और Fire NOC;
– हाईकोर्ट में दाखिल Petition, Reply और उसके बाद के आदेश;
– पंप की दैनिक बिक्री तथा रकम प्राप्त करने वाले बैंक खाते।
यदि भुगतान नकद हुआ तो आयकर विभाग और सक्षम आर्थिक अपराध जांच एजेंसी को रकम के स्रोत तथा उपयोग की जांच करनी चाहिए। जमीन SECL की—तो करोड़ों का निजी सौदा किस अधिकार से?
यह मामला अब केवल तीन वर्ष बनाम 99 वर्ष की लीज का विवाद नहीं रहा। इसके केंद्र में कई विस्फोटक प्रश्न खड़े हैं—
₹1.20 करोड़ किसे मिले?
₹2.35 करोड़ किसने मांगे अथवा स्वीकार किए?
₹1.15 करोड़ के कथित अंतर में किसका हिस्सा था?
विश्वजीत और पप्पू पटेल की वास्तविक भूमिका क्या रही?
रहस्यमय तीसरा मध्यस्थ कौन है?
देवजानी मजुमदार ने ऐसा कौन-सा अधिकार हस्तांतरित किया?
तीवरता समूह ने किस दस्तावेज के भरोसे सौदा किया?
SECL के आदेश जमीन पर क्यों नहीं उतरे?
IOCL ने आपूर्ति जारी रखने से पहले भूमि अधिकार क्यों नहीं परखा?
और यह पंप आज किस वैधानिक आधार तथा किसके संरक्षण में चल रहा है?
अब औपचारिक जवाब और फाइलों में गोलमोल टिप्पणी पर्याप्त नहीं होगी। नामित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। लेकिन “जांच चल रही है” अथवा “मामला न्यायालय में है” कहकर मनी ट्रेल और वास्तविक संचालन से जुड़े प्रश्नों को दफन नहीं किया जा सकता।
SECL के पत्र गरजते रहे, पंप चलता रहा और कथित सौदे की कीमत बढ़ती रही—यह प्रशासनिक लाचारी है या संरक्षण की मोटी दीवार?
संपादकीय एवं कानूनी नोट: ₹1.20 करोड़ और ₹2.35 करोड़ के कथित सौदों तथा विश्वजीत, पप्पू पटेल और एक अन्य व्यक्ति की कथित मध्यस्थ भूमिका से संबंधित विवरण सूत्रों एवं शिकायतकर्ता से प्राप्त आरोप हैं। इनकी स्वतंत्र बैंकिंग, दस्तावेजी अथवा न्यायिक पुष्टि अभी अपेक्षित है। किसी व्यक्ति अथवा संस्था का दोष सिद्ध घोषित नहीं किया जा रहा है। SECL के पत्रों और हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का उल्लेख उपलब्ध प्रतियों के आधार पर किया गया है। हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2025 के आदेश में पंप, भूमि अधिकार अथवा कथित लीज को अंतिम रूप से वैध घोषित नहीं किया था; न्यायालय ने 3 सितंबर 2024 के SECL पत्र के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगाई थी। देवजानी मजुमदार, विश्वजीत, पप्पू पटेल, तीवरता समूह, IOCL तथा SECL के संबंधित अधिकारियों का तथ्यात्मक पक्ष प्राप्त होने पर उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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