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कोरबा निगम में ‘उमेश राज’ या अदृश्य संरक्षण? पौधों से सभागार और ₹5 करोड़ के नाले तक—हर रास्ता एक ही ठेकेदार की चौखट पर क्यों?

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एक नाम से प्रोपराइटरशिप और पार्टनरशिप फर्म; एक फर्म के अनुभव पर दूसरी की पात्रता का आरोप—PWD पंजीयन से SECL के करोड़ों के ठेकों तक जांच की मांग

 

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फर्नीचर, लाइट, साउंड, लैंडस्केपिंग, संचालन और पौधों की परतों के बाद नया सवाल—क्या नगर निगम नियमों से चल रहा है या किसी शक्तिशाली संरक्षण की अदृश्य उंगलियों से?

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क नगर पालिक निगम कोरबा की ठेका व्यवस्था में बार-बार उभरता एक नाम अब महज संयोग मानकर छोड़ देने लायक नहीं रहा। पौधों की खरीदी हो, जवाहरलाल नेहरू सभागार का फर्नीचर हो, लाइट–साउंड हो, लैंडस्केपिंग हो, दैनिक संचालन हो या अब ₹5 करोड़ का RCC नाला—दस्तावेजों और शिकायतों में ठेकेदार उमेश राठौर अथवा उनसे जुड़ी फर्मों का नाम अलग-अलग रूपों में सामने आने का दावा किया जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल नगर निगम की दीवारों से टकरा रहा है

«क्या यह एक ठेकेदार की असाधारण योग्यता है, अधिकारियों की बार-बार उसी दिशा में झुकती पसंद है अथवा पर्दे के पीछे बैठी कोई शक्तिशाली राजनीतिक–प्रशासनिक ताकत है, जिसके इशारे पर नियमों की रीढ़ मोड़ी जा रही है?»

इन प्रश्नों का उत्तर आरोपों से नहीं, बल्कि PWD पंजीयन, partnership deed, PAN–GST, अनुभव प्रमाणपत्र, technical evaluation, बैंक-सत्यापन पत्र और tender portal के digital audit trail से निकलेगा। सरकार को अब मौन की चादर ओढ़ने के बजाय दस्तावेजों की पूरी गठरी खोलनी चाहिए।

सभागार में करोड़ों की परतें—काम बदलता रहा, कथित लाभार्थी क्यों नहीं?

 

जवाहरलाल नेहरू सभागार में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अलग-अलग नामों और मदों में करोड़ों रुपये की निविदाएं सामने आई हैं—
– वर्ष 2022 का कथित composite सभागार कार्य—लगभग ₹2.39 करोड़;
– furniture, PA, video conferencing और sound system—लगभग ₹1.60 करोड़;
– landscaping तथा civil work—लगभग ₹55.64 लाख;
– पूर्व landscaping award—लगभग ₹43.95 लाख;
– daily O&M, DG, sound, lighting, PA और AC संचालन—लगभग ₹9.01 लाख;
– high-mast और lighting work—लगभग ₹5.39 लाख।

 

इन निविदाओं और पूर्व कार्यों को जोड़ने पर सभागार के नाम पर लगभग ₹5 करोड़ से अधिक की वित्तीय परत दिखाई देती है। हर निविदा स्वतंत्र हो सकती है, हर काम का अलग औचित्य हो सकता है—लेकिन जब एक ही परिसर में बार-बार रकम बहती हो और ठेकेदार के रूप में बार-बार एक ही नाम की चर्चा हो, तब यह केवल निर्माण नहीं, ठेका-साम्राज्य की दस्तावेजी शल्य-परीक्षा का विषय बन जाता है।

«सभागार जनता का है या किसी चहेते ठेकेदार के लिए लगातार बहती सरकारी रकम का स्थायी घाट?»

«कुर्सियां बदलीं, लाइटें बदलीं, साउंड बदला, लैंडस्केपिंग बदली—लेकिन कथित ठेका-चक्र का नाम क्यों नहीं बदला?»

सबसे गंभीर आरोप यह भी है कि furniture कार्य की फाइल “closed” अथवा “untraced” बताई गई। यदि फाइल वास्तव में उपलब्ध नहीं है तो यह साधारण लापरवाही नहीं। करोड़ों के सरकारी काम की फाइल गायब होना उस अंधेरे कमरे जैसा है, जहां जनता के पैसे की लाश रखकर दरवाजे पर “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” की पर्ची चिपका दी गई हो।

फाइल किसकी अभिरक्षा में थी? अंतिम बार किस अधिकारी ने देखी? किसने भुगतान स्वीकृत किया? measurement book, stock register और material receipt कहां हैं? क्या पुराना सागौन फर्नीचर हटाया गया? हटाया गया तो disposal register और auction record कहां है? ये प्रश्न तत्काल विभागीय तथा आपराधिक जांच मांगते हैं।

पौधे टेंडर से पहले पहुंच गए—क्या ठेका जन्म लेने से पहले ही उसका वारिस तय था?

ग्राम यात्रा पूर्व में उजागर कर चुका है कि पौधों की दो GeM bids जारी होने और उनकी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही पौधों से भरा वाहन सभागार परिसर में दिखाई दिया। नर्सरी से जुड़े दस्तावेज पर हाथ से “Umesh Sir” लिखा होने का दावा सामने आया।

उस समय सवाल उठे थे

– bid बंद नहीं हुई थी;
– technical evaluation नहीं हुआ था;
– financial bid नहीं खुली थी;
– L1 घोषित नहीं था;
– contract award और सार्वजनिक work order सामने नहीं था;
– फिर हजारों किलोमीटर दूर से माल किस भरोसे पर भेजा गया?
– सरकारी सभागार परिसर को निजी माल का गोदाम किस अधिकारी ने बनाया?
– ट्रक की gate entry, CCTV, inward register और stock entry कहां है?

यदि “Umesh Sir” से आशय उमेश राठौर नहीं था, तो निगम असली व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक करे। यदि पौधों का संबंध उन bids से नहीं था, तो purchase order, invoice और संबंधित कार्य का नाम बताए। और यदि माल उसी प्रस्तावित खरीदी से जुड़ा था, तो bid खुलने से पहले माल पहुंचने का रहस्य खोला जाए।

«क्या कोरबा निगम में टेंडर बाद में पैदा होता है और चहेता ठेकेदार पहले ही पालने में बैठा मिलता है?»

अब एक नाम से दो फर्म—अनुभव किसका, पात्रता किसकी और ठेका किसे?

ताजा शिकायत ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। आरोप है कि उमेश राठौर के नाम से PWD में दो अलग-अलग स्वरूप वाली फर्में मौजूद हैं—

1. एक प्रोपराइटरशिप फर्म;
2. दूसरी पार्टनरशिप फर्म।

आरोप यह नहीं कि किसी व्यक्ति का दो व्यावसायिक इकाइयों से जुड़ा होना अपने-आप अपराध है। असली और विस्फोटक प्रश्न यह है कि क्या प्रोपराइटरशिप फर्म के नाम अर्जित अनुभव प्रमाणपत्र का इस्तेमाल partnership firm को पात्र दिखाने तथा SECL सहित दूसरे विभागों के बड़े ठेके हासिल करने में किया गया?

कानूनी रूप से किसी partner का पूर्व अनुभव कुछ परिस्थितियों में partnership firm के लिए स्वीकार हो सकता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। अंतिम निर्णय संबंधित NIT की भाषा, partnership की वास्तविक संरचना, experience certificate के नाम, disclosure और tender authority की जांच पर निर्भर करेगा।

इसलिए जांच में देखा जाना चाहिए

दोनों फर्मों के PWD registration number क्या हैं?
– दोनों के PAN, GSTIN, EPF और ESIC code अलग हैं या समान?
– partnership firm कब गठित हुई?
– जिस समय अनुभव अर्जित हुआ, उस समय partnership अस्तित्व में थी या बाद में बनाई गई?
– अनुभव प्रमाणपत्र किस exact legal entity के नाम है?
– संबंधित SECL tender ने partner का व्यक्तिगत अथवा पूर्व अनुभव स्वीकार किया था या केवल bidder firm का?
– क्या bid affidavit में दूसरी संबंधित फर्म का खुलासा किया गया?
– क्या एक ही अनुभव प्रमाणपत्र का दो अलग-अलग फर्मों ने अलग ठेकों में समानांतर उपयोग किया?
– क्या दोनों फर्मों ने कभी एक ही tender में अलग bidders बनकर प्रतिस्पर्धा का भ्रम पैदा किया?
– DSC से bids किसने upload कीं और IP address क्या था?
– bank account, authorized signatory तथा वास्तविक लाभार्थी कौन हैं?

«यदि नाम एक, नियंत्रण एक, अनुभव एक और लाभार्थी भी एक है, तो कागज पर दो फर्मों का जंगल किस उद्देश्य से उगाया गया?»

₹5 करोड़ का RCC नाला—तकनीकी पात्रता पर दस्तावेजी घमासान नगर निगम कोरबा ने वार्ड क्रमांक 39, बालको जोन में बालको कूलिंग टावर से ढेंगुर नाला तक RCC नाला निर्माण के लिए लगभग ₹500 लाख की निविदा जारी की।

उपलब्ध tender document में कहा गया है कि आवश्यक तकनीकी दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही पात्र bidders की financial bid खोली जाएगी। सभी mandatory documents ऑनलाइन जमा करना आवश्यक बताया गया है और आवश्यक दस्तावेज न होने पर bid disqualify करने की शर्त दिखाई देती है। इसके बावजूद शिकायत में दो गंभीर technical objections उठाए गए हैं।

पहला आरोप—EPF–ESIC का अनिवार्य चालान अधूरा निविदा में अंतिम तीन महीनों के EPF एवं ESIC challan/receipt मांगे जाने की शर्त दिखाई देती है। आपत्ति है कि दिसंबर 2025, जनवरी 2026 और फरवरी 2026 के दस्तावेज अपेक्षित थे, लेकिन दिसंबर 2025 का चालान ऑनलाइन प्रस्तुत नहीं किया गया।

यदि mandatory document bid की अंतिम तारीख तक अपलोड नहीं था, तो संबंधित bidder को technically qualified किस आधार पर घोषित किया गया?

क्या बाद में दस्तावेज जोड़ने का अवसर दिया गया?

यदि दिया गया तो क्या वही अवसर अन्य bidders को भी मिला?

«क्या तकनीकी पात्रता की छलनी सबके लिए समान थी या किसी खास नाम के सामने उसके छेद अचानक बड़े हो गए?»

दूसरा आरोप—अनुभव प्रमाणपत्र में गलत multiplying factor शिकायत के अनुसार 8 जुलाई 2021 को पूर्ण कार्य के अनुभव-मूल्य पर 1.61 factor लगाया गया, जबकि वित्तीय वर्ष 2021–22 के लिए 1.46 factor लागू होना चाहिए था। यदि completion date वास्तव में 8 जुलाई 2021 है और 1.61 लगाकर अनुभव की समायोजित कीमत बढ़ाई गई, तो यह मामूली दशमलव की चूक नहीं कही जा सकती। बढ़ा हुआ factor bidder को eligibility threshold के ऊपर पहुंचा सकता है।

नगर निगम को मूल completion certificate, final bill, वित्तीय वर्ष, वास्तविक work value, factor table और evaluation calculation sheet तत्काल सार्वजनिक करनी चाहिए।

पहले वर्क ऑर्डर, फिर बैंक से सत्यापन—यह जांच है या ठेका देने के बाद कागजों की धुलाई?

सबसे घातक आरोप यह है कि tender खुलने और work order जारी होने के बाद संबंधित बैंक दस्तावेज सत्यापन के लिए बैंक भेजे गए। अभी उपलब्ध तस्वीरों से यह स्पष्ट नहीं है कि बैंक को Bank Guarantee, FDR, solvency certificate अथवा कोई अन्य दस्तावेज भेजा गया था। इसलिए इस तथ्य की पुष्टि मूल पत्रों से जरूरी है। लेकिन यदि आरोप सही है, तो पूरी tender evaluation प्रक्रिया सवालों के कठघरे में खड़ी हो जाती है।

क्रम स्पष्ट होना चाहिए

पहले दस्तावेज जमा हों → फिर उनकी जांच हो → पात्रता तय हो → financial bid खुले → सफल bidder चुना जाए → उसके बाद work order जारी हो।

यदि दस्तावेजों की प्रामाणिकता ठेका देने के बाद पूछी गई तो सवाल होगा— «जब कागज असली हैं या नहीं, यह पता ही नहीं था, तब करोड़ों का वर्क ऑर्डर किस भरोसे पर सौंप दिया गया?»

जांच में minute-to-minute chronology निकाली जाए:

– bid submission का timestamp;
– technical bid opening;
– scrutiny sheet;
– financial bid opening;
– L1 declaration;
– approval note;
– work order;
– agreement;
– बैंक को verification letter;
– बैंक का उत्तर;
– site handover और commencement।

 

यदि verification work order के बाद हुआ, तो tender committee के सभी सदस्यों की जवाबदेही निर्धारित की जाए।

क्या कोई अधिकारी नियम तोड़ने को मजबूर है—या संरक्षण में नियमों की हत्या हो रही है?

यहां किसी अनदेखी शक्ति को बिना प्रमाण दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल पूछना पत्रकारिता का अधिकार और जनता के धन के प्रति कर्तव्य है।

आखिर कौन अधिकारी है जो हर बार फाइलों को उसी दिशा में मोड़ देता है?

– क्या किसी प्रभावशाली राजनेता, पूर्व मंत्री, जनप्रतिनिधि अथवा वरिष्ठ अधिकारी का मौखिक दबाव है?

क्या engineering, tender, accounts और store शाखाओं में एक स्थायी गठजोड़ सक्रिय है?


क्या अधिकारी स्वेच्छा से नियमों की गर्दन दबा रहे हैं या किसी राजनीतिक छतरी के नीचे यह ठेका-व्यवस्था पनप रही है?


क्या तकनीकी आपत्तियां दबाने और फाइलों को “closed” अथवा “untraced” करने वाले अधिकारियों को संरक्षण प्राप्त है?

– क्या हर जांच इसीलिए ठंडी पड़ जाती है क्योंकि ठेके की जड़ें निगम भवन से बाहर किसी बड़े दरवाजे तक जाती हैं?

«यदि कोई अदृश्य शक्ति नहीं है तो नियम हर बार एक ही नाम के सामने घुटनों पर क्यों दिखाई देते हैं?»

 

«यदि सब कुछ पाक-साफ है तो फाइलें छिप क्यों रही हैं, सत्यापन देर से क्यों हो रहा है और वही ठेका-परिवार बार-बार सरकारी खजाने की चौखट पर क्यों दिखाई देता है?»

 

₹10 करोड़ से अधिक के संयुक्त ठेका-पैटर्न की जांच हो

सभागार से जुड़े लगभग ₹5 करोड़ से अधिक के विभिन्न कार्यों और ₹5 करोड़ की RCC नाला निविदा को मिलाकर मामला ₹10 करोड़ से अधिक के वित्तीय दायरे को छूता है। पौधा खरीदी तथा SECL के कथित contracts इसके अतिरिक्त हैं। यह आवश्यक नहीं कि सभी निविदाओं में अनियमितता हुई हो। लेकिन जब एक ही ठेकेदार अथवा उससे संबंधित फर्मों के आसपास लगातार इतनी बड़ी सार्वजनिक राशि घूमती दिखाई दे, तब प्रत्येक tender को अलग-अलग फाइल में बंद करके देखना सच्चाई के शरीर को टुकड़ों में काटना होगा।

सरकार एक संयुक्त जांच दल गठित करे, जिसमें शामिल हों

– नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग;
– PWD पंजीयन प्रकोष्ठ;
– राज्य स्तरीय technical audit team;
– SECL Vigilance/CVO;
– स्थानीय निधि संपरीक्षा;
– आवश्यकता पड़ने पर EOW/ACB।  तत्काल सील और सुरक्षित किए जाएं डिजिटल तथा भौतिक रिकॉर्ड

जांच शुरू होने से पहले निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं:

– दोनों फर्मों की संपूर्ण PWD registration files;

– proprietorship declaration और partnership deed;

– PAN, GST, EPF, ESIC और bank accounts;

– सभी experience certificates और issuing departments की पुष्टि;

– नगर निगम तथा SECL के tender audit trails;

– bidder DSC और IP logs;

– technical evaluation sheets तथा committee minutes;

– comparative statements और financial bids;

– bank verification letters तथा replies;

– work orders, agreements और performance guarantees;

– सभागार की measurement books और भुगतान फाइलें;

– furniture stock तथा पुराने सामान का disposal record;

– CCTV, gate register और पौधा वाहन की entry;

– सभागार की कथित “closed/untraced” furniture file;

– संबंधित अधिकारियों एवं bidders के आधिकारिक e-mail logs

रिकॉर्ड से छेड़छाड़ रोकने के लिए जांच पूरी होने तक संबंधित फाइलों और portal data का forensic backup लिया जाए।

मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन विभाग अब मौन क्यों?

यह किसी ठेकेदार से व्यक्तिगत दुश्मनी का मामला नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था की जांच का प्रश्न है जिसमें जनता के टैक्स से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और बदले में जनता को फाइलों का अंधेरा, गायब रिकॉर्ड तथा आधे-अधूरे जवाब मिलते हैं।  यदि उमेश राठौर और उनसे संबंधित फर्मों ने प्रत्येक पात्रता शर्त पूरी की है तो सरकार दस्तावेज सार्वजनिक कर उनके ऊपर उठते संदेह समाप्त करे। लेकिन यदि अनुभव प्रमाणपत्रों का अनुचित परस्पर उपयोग हुआ, mandatory documents के बिना technical qualification दी गई, गलत factor से पात्रता बढ़ाई गई अथवा work order के बाद सत्यापन कराया गया, तो संबंधित ठेकेदार के साथ उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने सरकारी मुहर को निजी सुविधा की रबर-स्टाम्प बना दिया।

«भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाले हाथ का नाम नहीं; आंख बंद करने वाला अधिकारी, फाइल दबाने वाला कर्मचारी, नियम मोड़ने वाली समिति और संरक्षण देने वाली राजनीतिक छतरी भी उसी अपराध-श्रृंखला की कड़ियां होती हैं।»

ग्राम यात्रा की खुली चुनौती

नगर निगम, PWD, SECL और संबंधित ठेकेदार सात दिनों के भीतर सार्वजनिक करें—

1. दोनों फर्मों का पूरा कानूनी विवरण;
2. प्रत्येक tender में bidder का exact नाम;
3. उपयोग किए गए अनुभव प्रमाणपत्र;
4. संबंधित eligibility clause;
5. EPF–ESIC upload record;
6. multiplying factor की गणना;
7. बैंक verification तथा work order की तारीख;
8. सभागार के सभी कार्यों की agency-wise payment details;
9. पौधा वाहन की gate entry और purchase order;
10. furniture file का वर्तमान स्थान।

«दस्तावेज साफ हैं तो उन्हें जनता के सामने रखिए।
फाइलें नहीं मिल रही हैं तो जिम्मेदार अधिकारी बताइए।
और यदि पर्दे के पीछे कोई शक्तिशाली संरक्षक बैठा है, तो उसकी पहचान भी अब सामने आनी चाहिए।»

यह केवल दो फर्मों की कहानी नहीं—यह उस कथित ठेका-तंत्र की सड़ती हुई परत है, जिसमें नियमों को चबाकर पात्रता बनाई जाती है, कागजों को मोड़कर करोड़ों का रास्ता खोला जाता है और सवाल उठते ही फाइलों पर खामोशी का ताला जड़ दिया जाता है।  पौधों से सभागार, सभागार से नाला और नाले से SECL तक—यदि हर रास्ता एक ही चौखट पर पहुंच रहा है तो सरकार को देखना होगा कि उस चौखट के पीछे ठेकेदार अकेला खड़ा है या उसके सिर पर किसी अदृश्य सत्ता का हाथ है।

ग्राम यात्रा की दस्तावेजी जांच जारी—अगले खुलासे में दोनों फर्मों के पंजीयन, SECL contracts, अनुभव प्रमाणपत्र, बैंक verification और नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका का नामवार परीक्षण।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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