गेवरा–दीपका बना ‘KGF’—राष्ट्रीय कोयले पर ₹10 से ₹40 प्रति टन का कथित “काला टैक्स”!

सूत्रों की उंगली एन. खुर्शीद की ओर—क्या सात साल गेवरा रोड सेल में जड़ें जमाने वाला अधिकारी ही कथित सिंडिकेट का मास्टरमाइंड?
मारुति शंकर पर वर्तमान वसूली-तंत्र, पार्थ मुखर्जी पर प्रोडक्शन कोयले के कथित डायवर्जन और संतोष राठौर पर लोडिंग नेटवर्क की “नाड़ी” होने का आरोप
रुंगटा कंपनी का कोयला ₹120 प्रति टन में कथित रूप से आगे बेचने का दावा—सोनू राठौर और मनजीत यादव की भूमिका की जांच जरूरी
रांची, पुरी और जयपुर की कथित करोड़ों की संपत्तियां भी सवालों में—हर DO, ट्रक, कांटा, GPS और बैंक खाते का फोरेंसिक मिलान कब?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
खदान भारत सरकार की।
कोयला राष्ट्र का।
कांटा सरकारी।
गेट सरकारी।
कैमरे सरकारी।
सॉफ्टवेयर सरकारी।
निगरानी करने वाले अधिकारी भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के। फिर राष्ट्रीय कोयले के ऊपर कथित निजी “टोल नाका” किसने खोल दिया?
गेवरा और दीपका से छनकर आ रहे गंभीर आरोप बताते हैं कि एसईसीएल की विशाल कोयला व्यवस्था के भीतर कथित रूप से एक समानांतर “KGF—काला गोरखधंधा फील्ड” खड़ा हो गया है। यहां कोयला एसईसीएल का बताया जाता है, लेकिन उसकी उपलब्धता, प्राथमिकता और लोडिंग का कथित रेट कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा तय किए जाने का आरोप है।
सूत्रों का दावा है कि रोड सेल में कोयला उपलब्ध कराने, तत्काल लोडिंग दिलाने, “स्टॉक नहीं” की बाधा हटाने और वाहनों को सुविधाजनक तरीके से निकालने के नाम पर ₹10 से ₹40 प्रति टन तक कथित अवैध वसूली की जा सकती है।
यह रकम किसी अधिकृत दर-सूची में दर्ज है?
क्या इसकी वैधानिक रसीद दी जाती है?
क्या यह पैसा एसईसीएल के खाते में जमा होता है?
यदि नहीं—तो राष्ट्रीय कोयले की हर टन पर कथित “काला टैक्स” लगाने की अनुमति किसने दी?
और इसकी कथित काली कमाई खदान के नीचे से ऊपर किन-किन सफेदपोश कुर्सियों तक पहुंचती है?
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच अभी बाकी है। लेकिन नाम, पद, स्थान और कथित कार्यप्रणाली इतनी स्पष्ट है कि अब सामान्य विभागीय खानापूर्ति नहीं—CVC की निगरानी में डिजिटल, वित्तीय और संपत्ति आधारित फोरेंसिक जांच आवश्यक दिखाई देती है।
एन. खुर्शीद—क्या कथित सिंडिकेट का केंद्रीय सूत्रधार?
इस पूरे कथित तंत्र के केंद्र में सबसे प्रमुख नाम एन. खुर्शीद का सामने आ रहा है। सूत्र उन्हें गेवरा–दीपका के कोयला आवंटन, रोड सेल, लोडिंग और कारोबारी संपर्कों से जुड़े कथित नेटवर्क का प्रभावशाली सूत्रधार बताते हैं। एन. खुर्शीद वर्तमान में दीपका क्षेत्र में सेल्स मैनेजर अथवा बिक्री विभाग से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे बताए गए हैं। इससे पहले वे करीब सात वर्षों तक गेवरा रोड सेल की संवेदनशील व्यवस्था से जुड़े रहे। सवाल यह नहीं कि खुर्शीद किसी पद पर कितने साल रहे।
असली सवाल यह है कि सात वर्षों में उनके आसपास कैसी कारोबारी शृंखला बनी, किन लिफ्टरों की पहुंच बढ़ी, किन कर्मचारियों को संवेदनशील जिम्मेदारियां मिलीं और उनके दीपका स्थानांतरण के बाद भी गेवरा में उनका कथित प्रभाव कैसे बना रहा?
सूत्रों का आरोप है कि गेवरा रोड सेल के पुराने कथित नेटवर्क का संचालन लोडिंग से जुड़े संतोष राठौर के माध्यम से होता था। यह भी दावा किया गया है कि खुर्शीद के दीपका स्थानांतरण के बाद जब संतोष राठौर को हटाने की मांग उठी, तब खुर्शीद कथित रूप से पांच से सात कोयला लिफ्टरों के साथ तत्कालीन क्षेत्रीय महाप्रबंधक के पास पहुंचे और राठौर को पद पर बनाए रखने की पैरवी कराई। हालांकि करीब एक महीने बाद संतोष राठौर को कथित रूप से उस जिम्मेदारी से हटा दिया गया।
यदि यह घटनाक्रम सही है तो सवाल जहरीला और सीधा है—
दीपका में पदस्थ अधिकारी को गेवरा के एक लोडिंग कर्मचारी की कुर्सी बचाने में इतनी दिलचस्पी क्यों थी?
क्या यह सामान्य प्रशासनिक चिंता थी?
या उस कुर्सी से कथित सिंडिकेट की कोई आर्थिक नस जुड़ी हुई थी?
इसका फैसला आरोप नहीं, ये रिकॉर्ड करेंगे:
– क्षेत्रीय महाप्रबंधक कार्यालय का आगंतुक रजिस्टर;
– संबंधित तारीखों के CCTV फुटेज;
– संतोष राठौर की पदस्थापना और स्थानांतरण फाइल;
– शिकायतों की प्राप्ति तथा कार्रवाई विवरण;
– वैधानिक प्रक्रिया से प्राप्त कॉल एवं लोकेशन रिकॉर्ड;
– नियमित लिफ्टरों और अधिकारियों के डिजिटल संपर्क;
– खुर्शीद के आधिकारिक कार्यक्षेत्र तथा वास्तविक हस्तक्षेप का मिलान।
यदि आरोप झूठे हैं तो रिकॉर्ड एन. खुर्शीद को साफ कर देंगे। यदि रिकॉर्ड संपर्क, बैठक और हस्तक्षेप की कहानी की पुष्टि करते हैं तो जांच को यह निर्धारित करना होगा कि क्या वे इस कथित तंत्र के “मास्टरमाइंड” थे अथवा केवल प्रशासनिक भूमिका निभा रहे थे।
शिकायत के बाद तबादला हुआ या पदोन्नति का पुरस्कार मिला?
सूत्रों का आरोप है कि एन. खुर्शीद लंबे समय तक आर्थिक रूप से संवेदनशील जिम्मेदारी में बने रहे। शिकायत उठने पर उन्हें व्यवस्था से बाहर करने के बजाय पदोन्नति अथवा अधिक प्रभावशाली जिम्मेदारी के साथ दीपका भेज दिया गया।
एसईसीएल सार्वजनिक करे:
– खुर्शीद गेवरा रोड सेल में कब से कब तक रहे?
– उनके पास कौन-कौन से वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार थे?
– संवेदनशील पद के लिए निर्धारित अधिकतम कार्यकाल कितना है?
– उनके विरुद्ध कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं?
– शिकायतों पर विजिलेंस जांच हुई या नहीं?
– स्थानांतरण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी अथवा शिकायत से जुड़ा?
– स्थानांतरण के साथ उन्हें पदोन्नति अथवा बड़ी जिम्मेदारी क्यों मिली?
– दीपका जाने के बाद गेवरा के किन मामलों में उन्होंने हस्तक्षेप किया?
यदि शिकायत के बाद केवल कुर्सी बदली और नेटवर्क की डोर हाथ में बनी रही, तो स्थानांतरण सुधार नहीं—कथित सिंडिकेट का भौगोलिक विस्तार माना जाएगा।
रांची की कथित संपत्ति—दावा हवा में या काली कमाई का पता?
सूत्रों ने एन. खुर्शीद अथवा उनसे जुड़े व्यक्तियों का रांची क्षेत्र के किसी बड़े व्यावसायिक परिसर अथवा मॉल जैसे निवेश से संबंध होने का आरोप लगाया है।
ग्राम यात्रा इस संपत्ति का स्वामित्व, मूल्य अथवा खुर्शीद से संबंध स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं करता। बिना रजिस्ट्री और लाभार्थी स्वामित्व के दस्तावेज के इसे उनकी संपत्ति अथवा अवैध निवेश घोषित नहीं किया जा सकता।
लेकिन आरोप की जांच आवश्यक है:
– खुर्शीद, उनके पति/पत्नी, आश्रितों या संबंधित संस्थाओं के नाम कितनी संपत्ति है?
– खरीद और निर्माण का बैंक स्रोत क्या था?
– वार्षिक संपत्ति विवरण में इसका उल्लेख है?
– किसी रिश्तेदार, साझेदार, फर्म अथवा कंपनी के नाम निवेश हुआ?
– घोषित आय और वास्तविक निवेश में कोई असामान्य अंतर है?
संपत्ति रखना अपराध नहीं। लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की ज्ञात आय और वास्तविक निवेश में भारी अंतर मिले तो वह निजी मामला भी नहीं रहता।
इस आरोप का फैसला विशेषण नहीं—रजिस्ट्री, बैंक खाते, आयकर रिकॉर्ड और संपत्ति घोषणाएं करेंगी।
मारुति शंकर—वर्तमान रोड सेल पर ₹10–₹40 प्रति टन का आरोप
सूत्रों ने मारुति शंकर को गेवरा रोड सेल की वर्तमान व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकारी बताया है। उनके सटीक पदनाम और अधिकारों की आधिकारिक पुष्टि एसईसीएल से अपेक्षित है। आरोप है कि “एलाओ” अथवा सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर ₹10 से ₹40 प्रति टन तक की कथित वसूली की जा सकती है। इसकी दर कथित रूप से DO की मात्रा, कोयले के ग्रेड, तत्काल लोडिंग, वाहन की प्राथमिकता, खरीदार की आर्थिक हैसियत और व्यवस्था में उसकी पहुंच के आधार पर बदलती है।
जांच एजेंसी खरीदारवार यह मिलान करे:
– DO कब जारी हुआ?
– वाहन खदान में कब पहुंचा?
– उसे लोडिंग के लिए कितना इंतजार कराया गया?
– उसी समय किस खरीदार को प्राथमिकता मिली?
– किसे “स्टॉक नहीं” बताया गया?
– किस अधिकारी के लॉगिन से अनुमति जारी हुई?
– DO में कितनी बार परिवर्तन किया गया?
– संबंधित अवधि में किसी अधिकारी या मध्यस्थ को संदिग्ध भुगतान हुआ?
यदि ₹10–₹40 प्रति टन वैधानिक शुल्क है तो एसईसीएल उसकी दर-सूची और रसीद सार्वजनिक करे।
यदि वैधानिक नहीं—तो “एलाओ” के नाम पर ली जाने वाली कथित रकम किसकी जेब का अलाउंस है?
“स्टॉक नहीं” से “लोडिंग चालू”—भुगतान के बाद कोयला पैदा करने वाला कौन-सा जादू?
सूत्रों का दावा है कि कथित भुगतान से इनकार करने वाले खरीदारों को कई बार स्टॉक की कमी, तकनीकी परेशानी या लोडिंग बाधा बताई जाती है। वहीं व्यवस्था में शामिल अथवा प्रभावशाली खरीदारों के लिए उसी अवधि में कोयला उपलब्ध हो जाता है। कोयला धरती के गर्भ में बनने में लाखों साल लगाता है। लेकिन आरोप है कि गेवरा–दीपका की फाइलों में कथित व्यवस्था होते ही वह कुछ घंटों में “अनुपलब्ध” से “उपलब्ध” हो जाता है!
इस चमत्कार की जांच भूवैज्ञानिक नहीं करेंगे। इसकी पोल खुलेगी:
– कंप्यूटर लॉग से;
– स्टॉक रिपोर्ट से;
– वाहन प्रतीक्षा अवधि से;
– कॉल रिकॉर्ड से;
– और संदिग्ध भुगतान के बैंक ट्रेल से।
यदि आरोप सही निकला तो मामला केवल रिश्वत का नहीं रहेगा। यह वैध खरीदारों के अधिकारों से खिलवाड़, सरकारी संसाधन के पक्षपातपूर्ण वितरण और सार्वजनिक कंपनी को निजी दुकान की तरह चलाने का मामला होगा।
पार्थ मुखर्जी—प्रोडक्शन लाइन का कोयला किस रास्ते गया?
सूत्रों ने पार्थ मुखर्जी को गेवरा परियोजना का वर्तमान प्रोजेक्ट जीएम बताया है। उनके पद और कार्यकाल की आधिकारिक पुष्टि अपेक्षित है। उनसे जुड़ा सबसे गंभीर आरोप प्रोडक्शन लाइन के कोयले के कथित डायवर्जन का है। यदि उत्पादन से निकला कोयला निर्धारित जीरो पॉइंट, रेलवे साइडिंग अथवा रोड सेल के कॉमन फेस तक न पहुंचकर किसी निजी स्थल पर गिराया गया, तो यह साधारण अनियमितता नहीं—राष्ट्रीय संपत्ति की संभावित हेराफेरी होगी।
हर वाहन के लिए यह पूरी शृंखला जांची जाए:
लोडिंग स्थल → जीरो पॉइंट → खदान कांटा → साइडिंग/कॉमन फेस → गेट → अंतिम गंतव्य
जांच में GPS, RFID, FASTag, कांटा का raw data, गेट रिकॉर्ड, CCTV, ट्रांसपोर्ट चालान, ई-वे बिल, destination weighment और अधिकारियों के login records मिलाए जाएं।
यदि वाहन निर्धारित स्थान पर पहुंचे तो आरोप समाप्त। यदि GPS और कांटा दूसरी कहानी सुनाते हैं तो कोयले की काली सड़क सीधे जिम्मेदार कुर्सियों तक जाएगी।
रुंगटा का कोयला—₹120 प्रति टन में कथित सौदा किसने किया?
वर्तमान आरोपों का सबसे ठोस परीक्षण-बिंदु रुंगटा कंपनी से जुड़ा बताया जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि प्रोडक्शन लाइन का कोयला जीरो पॉइंट से निर्धारित रेलवे साइडिंग अथवा रोड सेल के कॉमन फेस तक जाना था। आरोप है कि सोनू राठौर और मनजीत यादव ने इससे संबंधित काम पेटी अथवा उप-व्यवस्था में लिया और कोयले की निजी लिफ्टिंग तथा आगे बिक्री में कथित भूमिका निभाई।
सूत्रों ने करीब ₹120 प्रति टन में कोयले के कथित सौदे और “अशोक” नाम से जुड़े व्यक्ति अथवा प्रतिष्ठान का भी उल्लेख किया है। संबंधित व्यक्ति या संस्था की पूर्ण पहचान और व्यापारिक रिकॉर्ड स्वतंत्र रूप से सत्यापित होना शेष है।
जांच में स्पष्ट किया जाए:
– रुंगटा का मूल कार्यादेश किसके नाम था?
– क्या काम उप-ठेके पर देना अनुमत था?
– सोनू राठौर और मनजीत यादव की वैधानिक भूमिका क्या थी?
– वाहन कहां से लोड हुए और कहां पहुंचने थे?
– वास्तव में कोयला कहां खाली हुआ?
– अंतिम स्टॉक किस संस्था के खाते में दर्ज हुआ?
– ₹120 प्रति टन से संबंधित भुगतान अथवा बातचीत का कोई रिकॉर्ड है?
– अंतिम खरीदार और वास्तविक लाभार्थी कौन था?
रुंगटा कंपनी और सभी नामित पक्षों को दस्तावेज सहित अपना पक्ष देने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन स्पष्ट वाहन-आधारित आरोप सामने आने के बाद एसईसीएल केवल मौखिक खंडन की राख डालकर मामले की आग नहीं बुझा सकता।
संतोष राठौर—लोडिंग कर्मचारी या कथित नेटवर्क की नाड़ी?
सूत्रों ने संतोष राठौर को गेवरा रोड सेल के पुराने कथित नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी बताया है।
एसईसीएल बताए:
– संतोष राठौर का वास्तविक पद और दायित्व क्या था?
– वे कितने समय तक लोडिंग से जुड़े रहे?
– उनके विरुद्ध कितनी शिकायतें आईं?
– उन्हें प्रशासनिक कारण से हटाया गया या शिकायतों के आधार पर?
– किन लिफ्टरों ने उन्हें बनाए रखने की पैरवी की?
– पद से हटने के बाद भी क्या उनका लोडिंग व्यवस्था पर प्रभाव रहा?
जब निजी कारोबारी किसी सरकारी कर्मचारी की कुर्सी बचाने के लिए असाधारण चिंता दिखाएं, तब उस चिंता के पीछे का आर्थिक रिश्ता भी जांच योग्य हो जाता है।
पुरी में ₹300 करोड़, जयपुर में ₹150 करोड़ के कथित होटल—सच या सनसनी?
सूत्रों ने पूर्व में पदस्थ बताए गए एस.के. मोहंती और भाठी से संबंधित बड़ी संपत्तियों के आरोप भी लगाए हैं। दावों में पुरी में करीब ₹300 करोड़ तथा जयपुर में करीब ₹150 करोड़ मूल्य के होटल अथवा निवेश का उल्लेख है।
इन संपत्तियों का स्वामित्व, मूल्य और संबंधित अधिकारियों से संबंध अभी प्रमाणित नहीं है। इन्हें उनकी अवैध या बेनामी संपत्ति घोषित करना उचित नहीं होगा।
लेकिन सक्षम एजेंसी जांच करे:
– कथित होटल का नाम, पता और पंजीकृत स्वामी;
– संबंधित कंपनी या LLP के निदेशक;
– वास्तविक लाभार्थी स्वामित्व;
– निर्माण और निवेश का वित्तीय स्रोत;
– अधिकारियों अथवा परिवार से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध;
– एसईसीएल में जमा वार्षिक संपत्ति विवरण;
– ज्ञात आय और संभावित निवेश का अनुपात।
यदि कोई संबंध नहीं है तो दस्तावेज आरोपों को दफना देंगे। संबंध मिलता है तो मामला आय से अधिक संपत्ति और बेनामी निवेश की जांच तक पहुंचेगा।
₹10–₹40 प्रति टन—छोटी रकम नहीं, करोड़ों की संभावित काली फसल
₹10 प्रति टन सुनने में मामूली है।
₹40 प्रति टन भी एक ट्रक के सामने छोटी रकम दिखाई दे सकती है।
लेकिन लाखों टन पर यही कथित वसूली करोड़ों रुपये की समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर सकती है।
यदि किसी अवधि में एक करोड़ टन पर औसतन ₹20 प्रति टन भी वसूली हुई हो तो रकम ₹20 करोड़ होती है। यह केवल गणितीय उदाहरण है—वास्तविक वसूली का निष्कर्ष नहीं। असली आंकड़ा निकालने के लिए अवधि-वार रोड सेल उठाव, खरीदारवार मात्रा, कथित दर, नकद एवं बैंक प्रवाह, मध्यस्थों के खाते और वास्तविक लाभार्थियों का मिलान आवश्यक है।
हर टन से निचोड़ी गई छोटी रकम वर्षों बाद भ्रष्टाचार की ऐसी काली नदी बन सकती है जिसमें कई चमकदार कुर्सियों की सफेदी बह जाए।
रिकॉर्ड अभी सुरक्षित हों—देरी हुई तो डिजिटल पदचिह्न मिट सकते हैं
एसईसीएल, CVC और सक्षम जांच एजेंसियां तत्काल सुरक्षित करें:
1. दस वर्षों के DO और modification logs;
2. खरीदारवार कोयला आवंटन;
3. वाहनवार लोडिंग रिकॉर्ड;
4. weighbridge का मूल raw data;
5. RFID, GPS, FASTag और gate logs;
6. CCTV archive;
7. स्टॉकयार्ड और ड्रोन volumetric reports;
8. grade-wise production तथा dispatch;
9. source–destination weight difference;
10. अधिकारियों के login और approval trail;
11. शिकायत रजिस्टर एवं vigilance files;
12. संवेदनशील पदों की tenure history;
13. संबंधित अधिकारियों की annual property returns;
14. संदिग्ध मध्यस्थों से जुड़े वैधानिक वित्तीय रिकॉर्ड;
15. रुंगटा कंपनी के work order, challan और destination records।
जांच की घोषणा से पहले डेटा सुरक्षित नहीं हुआ तो संदिग्ध व्यवस्था को अपने डिजिटल पदचिह्न धोने का समय मिल सकता है। CVC की निगरानी में जांच हो—अपराध मिले तो CBI दर्ज करे मामला
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है:
– CVC की निगरानी में स्वतंत्र प्रारंभिक जांच;
– आपराधिक संकेत मिलने पर CBI कार्रवाई;
– गेवरा–दीपका का दस वर्षीय फोरेंसिक स्टॉक एवं डिस्पैच ऑडिट;
– ₹10–₹40 प्रति टन कथित वसूली की वित्तीय शृंखला की जांच;
– प्रोडक्शन कोयला डायवर्जन का GPS आधारित सत्यापन;
– रुंगटा से जुड़े प्रत्येक वाहन और भुगतान का मिलान;
– नामित अधिकारियों की घोषित आय एवं संपत्ति का कानूनसम्मत सत्यापन;
– रांची, पुरी और जयपुर की कथित संपत्तियों के वास्तविक लाभार्थी की पहचान;
– संतोष राठौर, सोनू राठौर, मनजीत यादव और रिकॉर्ड में सामने आने वाले अन्य पक्षों की जांच;
– जांच प्रभावित कर सकने वाले व्यक्तियों को संवेदनशील जिम्मेदारियों से अस्थायी रूप से अलग करना;
– शिकायतकर्ताओं और कर्मचारियों को व्हिसलब्लोअर सुरक्षा;
– सभी नामित पक्षों को दस्तावेज सहित जवाब देने का पूरा अवसर।
कोयला काला है—लेकिन हिसाब उससे भी काला नहीं रह सकता
गेवरा और दीपका केवल कोरबा की खदानें नहीं—देश की ऊर्जा व्यवस्था की धमनियां हैं। यहां से निकला प्रत्येक टन कोयला देश की संपत्ति है। यदि उसी टन पर कथित निजी टैक्स लगा, स्टॉक की उपलब्धता बेची गई, प्रोडक्शन लाइन मोड़ी गई और संवेदनशील कुर्सियां संपत्ति बनाने की मशीन बनीं, तो यह विभागीय अनियमितता नहीं बल्कि राष्ट्रीय संसाधन की छाती पर खड़ा कथित संगठित लूट-तंत्र होगा।
अब गरीब की साइकिल से कोयला उतरवाकर फोटो खिंचवाने से काम नहीं चलेगा।
हर नाम की भूमिका जांची जाए।
हर संपत्ति का स्रोत खुले।
हर DO का इतिहास निकले।
हर कांटे का raw data सुरक्षित हो।
हर वाहन की GPS यात्रा पढ़ी जाए।
हर संदिग्ध भुगतान का बैंक ट्रेल खोजा जाए।
और हर उस कुर्सी से जवाब लिया जाए जिसकी निगरानी में राष्ट्रीय कोयले पर कथित निजी टोल नाका चलता रहा।
क्या एन. खुर्शीद इस कथित सिंडिकेट के मास्टरमाइंड हैं?
क्या मारुति शंकर की वर्तमान व्यवस्था में ₹10–₹40 प्रति टन का कथित काला टैक्स लिया जा रहा है?
क्या पार्थ मुखर्जी की निगरानी में प्रोडक्शन लाइन का कोयला रास्ता बदल रहा है?
क्या संतोष राठौर पुराने नेटवर्क की नाड़ी थे?
रुंगटा का कोयला निर्धारित स्थान पर पहुंचा या निजी कारोबार की भट्ठी में झोंक दिया गया?
उत्तर प्रेस विज्ञप्ति से नहीं आएगा। उत्तर आएगा—DO, GPS, कांटा, CCTV, संपत्ति विवरण और बैंक खातों से।
अगला खुलासा
रुंगटा कंपनी का कथित कोयला खेल: कौन-से वाहन कहां से निकले, कहां पहुंचने थे और वास्तव में कहां खाली हुए?
रांची, पुरी और जयपुर की कथित संपत्तियां: सूत्रों के दावे में कितना दम और वास्तविक लाभार्थी कौन?
संवेदनशील कुर्सियों की शृंखला: शिकायत के बाद किसे हटाया गया और किसे पदोन्नति का पुरस्कार मिला?
पड़ताल जारी है…
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
खबर में उल्लिखित सभी दावे सूत्रों से प्राप्त जांच योग्य आरोप हैं, प्रमाणित तथ्य या दोष-सिद्धि नहीं। संबंधित पद, संपत्ति, कथित वसूली और कोयला डायवर्जन की आधिकारिक पुष्टि शेष है। सभी नामित पक्षों का दस्तावेजी जवाब प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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