₹2,000 की कथित डिजिटल वसूली के बाद अब छुट्टी की फाइल पर ₹15–20 हजार का ‘ताला’!

रकम नहीं दी तो महीनों से अटकी स्टाफ नर्सों की फाइल; आरोप— क्या सच मे एमएस के संरक्षण में बाबू मिथलेश मरकाम, बाबू का बेखौफ जवाब, “जहां बताना है बता दो!”
रायपुर DME में किसी ‘अशोक सेठ’ के नाम का कथित इस्तेमाल—व्यक्ति पर नहीं, उसके नाम पर पैसे मांगने वाले पर गंभीर सवाल
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मरीजों की जान बचाने वाली स्टाफ नर्सों की अपनी फाइलें क्या अब रिश्वत की ऑक्सीजन पर चलेंगी? सरकारी सेवा में रहते हुए मिलने वाला एजुकेशन लीव, और अन्य वैधानिक अवकाश क्या किसी बाबू की निजी दुकान का माल बन चुका है—पैसा दो तो फाइल आगे बढ़ेगी, नहीं तो महीनों तक धूल खाती रहेगी?
कोरबा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में सर्विस रिकॉर्ड संबंधी सरकारी कार्य के नाम पर स्टाफ नर्सों से कथित रूप से ₹2,000 ऑनलाइन लेने का मामला सामने आने के बाद अब उसी तंत्र से जुड़ा एक और गंभीर आरोप उठा है। पीड़ित पक्ष से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ स्टाफ नर्सों की एजुकेशन लीव एवं अन्य अवकाश संबंधी फाइलों को रायपुर स्थित चिकित्सा शिक्षा संचालनालय—DME से स्वीकृत कराने के नाम पर ₹15 हजार से ₹20 हजार तक की कथित मांग की गई। स्टाफ नर्सों ने रकम नहीं दी, इसलिए उनकी फाइलें कई महीनों से कथित रूप से अटकी हुई हैं।
यदि आरोप सही हैं तो यह सामान्य लेन-देन नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों को बंधक बनाकर कर्मचारियों की मजबूरी निचोड़ने का बेहद गंभीर मामला है।
पैसा नहीं तो छुट्टी नहीं—क्या सरकारी कार्यालय में खुल गई ‘फाइल छुड़ाओ दुकान’?
नर्सिंग स्टाफ का आरोप है कि उनसे साफ संकेतों में कहा गया कि रकम दिए बिना उनका अवकाश स्वीकृत नहीं होगा। पैसे देने से इनकार करने के बाद फाइल आगे बढ़ने के बजाय महीनों के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
अब प्रशासन को बताना चाहिए—
– नर्सों की फाइलें कब जमा हुईं?
– फाइलें वर्तमान में किस अधिकारी अथवा कर्मचारी के पास हैं?
– किस आपत्ति के कारण ये महीनों से लंबित हैं?
– संबंधित कर्मचारियों को लिखित आपत्ति या कमी क्यों नहीं बताई गई?
– फाइल स्वीकृत कराने के नाम पर ₹15–20 हजार की मांग किसने और किस अधिकार से की?
– क्या अन्य नर्सों एवं स्वास्थ्य कर्मचारियों से भी इसी प्रकार रकम मांगी गई?
सरकारी कर्मचारी की वैधानिक छुट्टी कोई एहसान नहीं है। यदि सभी आवश्यक दस्तावेज पूरे हैं, तो फाइल का समयबद्ध निराकरण विभाग का दायित्व है। उसे महीनों तक दबाए रखना और फिर कथित रूप से पैसे की मांग करना भ्रष्टाचार की सड़ांध की ओर इशारा करता है।
“जहां बताना है बता दो”—क्या एमएस के कथित संरक्षण ने बाबू को बना दिया बेलगाम?
मामले का सबसे विस्फोटक पहलू यह है कि शिकायतकर्ताओं के अनुसार, कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पदस्थ बाबू मिथलेश मरकाम ने कथित रूप से दो टूक कहा—
“जहां बताना है बता दो!”
यह कथित जवाब केवल अहंकार नहीं, बल्कि उस संरक्षण के भरोसे का संकेत प्रतीत होता है जिसकी चर्चा पीड़ित कर्मचारियों के बीच हो रही है। आरोप है कि मिथलेश मरकाम को अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट—एमएस का संरक्षण प्राप्त है और इसी कथित संरक्षण के कारण कर्मचारियों की शिकायतों तथा कार्रवाई की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। यदि संरक्षण का आरोप गलत है तो अस्पताल प्रबंधन को सामने आकर तत्काल निष्पक्ष जांच का आदेश देना चाहिए। लेकिन यदि शिकायत मिलने के बाद भी संबंधित बाबू को संवेदनशील फाइलों से नहीं हटाया जाता, तो सवाल सीधे एमएस की प्रशासनिक भूमिका पर खड़ा होगा।
क्या एमएस को स्टाफ नर्सों की लंबित फाइलों की जानकारी नहीं है?
क्या ₹2,000 के कथित डिजिटल भुगतान की जानकारी प्रबंधन तक नहीं पहुंची?
क्या खबर प्रकाशित होने के बाद कर्मचारियों को कथित रूप से फोन किए जाने की जांच हुई?
और यदि सबकी जानकारी है, तो संबंधित बाबू अब भी कर्मचारियों की फाइलों के आसपास क्यों बना हुआ है?
चुप्पी कभी-कभी तटस्थता नहीं होती—वह गलत आचरण को मिलने वाला मौन कवच भी बन जाती है।
‘अशोक सेठ’ के नाम पर कथित मांग—नाम असली या दबाव बनाने का हथियार?
पीड़ित पक्ष के अनुसार, ₹15 हजार से ₹20 हजार की कथित मांग करते समय रायपुर DME से जुड़े किसी “अशोक सेठ” का नाम लिया गया। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ स्पष्ट करता है कि समाचार में किसी अशोक सेठ पर प्रत्यक्ष रूप से पैसे मांगने का आरोप नहीं लगाया जा रहा है। गंभीर सवाल उस व्यक्ति पर है जिसने कथित रूप से उनका नाम लेकर स्टाफ नर्सों से रकम मांगी।
जांच से स्पष्ट होना चाहिए—
– क्या वास्तव में अशोक सेठ नामक किसी व्यक्ति ने पैसे मांगे?
– क्या उनके नाम का दुरुपयोग कर मिथलेश मरकाम द्वारा कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया?
– क्या रकम को रायपुर तक पहुंचाने के नाम पर कथित वसूली का प्रयास हुआ?
– क्या DME में फाइल आगे बढ़ाने के लिए किसी बाहरी या अंदरूनी बिचौलिया नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है?
यदि किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के नाम का गलत इस्तेमाल हुआ है, तो संबंधित व्यक्ति को भी सामने आकर स्थिति स्पष्ट करते हुए नाम का दुरुपयोग करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। पहले ₹2,000 खाते में, खबर छपी तो कथित रकम वापसी—अब फाइल रोकने की चेतावनी! सर्विस रिकॉर्ड संबंधी सरकारी कार्य के नाम पर स्टाफ नर्सों से कथित तौर पर ₹2,000 ऑनलाइन लिए जाने का मामला प्रकाशित होने के बाद घटनाक्रम और गंभीर हो गया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि खबर सामने आने के बाद मिथलेश मरकाम द्वारा कुछ संबंधित नर्सों को फोन किया गया। कथित रूप से उन्हें भविष्य में अपने काम का परिणाम भुगतने जैसी नसीहत दी गई। कुछ लोगों को ऑनलाइन रकम वापस करने तथा इसके बाद “अब देखते हैं इनका काम कैसे होता है” जैसा कथित संदेश दिए जाने की बात भी सामने आई है।
यदि पैसा वैध सरकारी शुल्क था, तो वह किसी कर्मचारी के निजी खाते में क्यों लिया गया?
उसकी सरकारी रसीद कहां है?
खबर छपने के बाद रकम क्यों लौटाई गई?
और पैसा वापस करने के साथ कर्मचारियों के काम रोकने जैसी बात क्यों कही गई?
पैसा वापस कर देना मामले का पटाक्षेप नहीं करता। मूल भुगतान, रकम मांगने का उद्देश्य, भुगतान के बाद किया गया सरकारी कार्य तथा खबर प्रकाशित होने के बाद की कथित वापसी—इन सभी की जांच जरूरी है।
क्या स्टाफ नर्सों को रिश्वत नहीं देने की सजा मिल रही है?
एक तरफ यही स्टाफ नर्सें मरीजों की सांस बचाती हैं, प्रसव पीड़ा से जूझती महिलाओं की सेवा करती हैं और आपातकाल में घंटों बिना रुके काम करती हैं। दूसरी तरफ आरोप है कि उनके अपने सरकारी अधिकारों और सेवा संबंधी फाइलों को बाबुओं की कथित वसूली का औजार बनाया जा रहा है।
रकम न देने पर फाइल रोको।
आवाज उठाने पर धमकाओ।
खबर छपे तो पैसा लौटाकर काम बिगाड़ने की चेतावनी दो।
और कार्रवाई की बात हो तो कहो—“जहां बताना है बता दो!”
यदि यही सरकारी व्यवस्था का वास्तविक चेहरा बन चुका है तो इससे अधिक शर्मनाक और क्या हो सकता है?
कलेक्टर, डीएमई और स्वास्थ्य विभाग की अग्निपरीक्षा—कार्रवाई होगी या संरक्षण जीतेगा?
अब केवल संबंधित व्यक्ति से स्पष्टीकरण लेकर फाइल बंद कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जिला कलेक्टर, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन, चिकित्सा शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ सरकार को तत्काल संयुक्त एवं स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।
निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक है कि:
1. मिथलेश मरकाम को जांच पूरी होने तक सर्विस बुक, अवकाश और स्थापना संबंधी संवेदनशील फाइलों से अलग किया जाए।
2. ₹2,000 के कथित ऑनलाइन भुगतान तथा बाद में हुई रकम वापसी का बैंक एवं UPI रिकॉर्ड प्राप्त किया जाए।
3. ₹15–20 हजार की कथित मांग से जुड़े कॉल, संदेश और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित किए जाएं।
4. महीनों से लंबित एजुकेशन लीव एवं दूसरी अवकाश फाइलें जब्त कर उनकी मूवमेंटशीट की जांच की जाए।
5. किस अधिकारी ने फाइल कितने दिन रोकी, इसका नामवार उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए।
6. “अशोक सेठ” के नाम का कथित इस्तेमाल किसने और क्यों किया, इसकी स्वतंत्र जांच हो।
7. कर्मचारियों को फोन कर कथित धमकी देने के आरोप की कॉल डिटेल और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जाए।
8. एमएस के कथित संरक्षण की भूमिका की जांच मेडिकल कॉलेज से बाहर के वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाए।
9. शिकायतकर्ता नर्सों को फाइल रोकने, तबादले अथवा दूसरी प्रशासनिक प्रताड़ना से लिखित सुरक्षा दी जाए।
10. प्रथम दृष्टया तथ्य प्रमाणित होने पर विभागीय कार्रवाई के साथ भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी को प्रकरण सौंपा जाए।सरकारी कुर्सी सेवा का माध्यम है, वसूली का काउंटर नहीं
सरकारी फाइल किसी बाबू की निजी जागीर नहीं और कर्मचारी की छुट्टी कोई ऐसा सामान नहीं, जिसकी कीमत बंद कमरे में तय की जाए। जिस दिन कर्मचारी का अधिकार किसी बाबू की मर्जी और कथित रिश्वत पर निर्भर हो जाए, उस दिन कार्यालय प्रशासनिक संस्था नहीं—वसूली का अड्डा बन जाता है। एमएस को भी स्पष्ट करना होगा कि क्या मिथलेश मरकाम को उनका संरक्षण प्राप्त है?
यदि नहीं, तो गंभीर आरोपों के बावजूद उसे संवेदनशील कार्यों से अलग क्यों नहीं किया गया?
यदि शिकायतकर्ताओं की जानकारी प्रबंधन के पास नहीं है, तो अब समाचार सामने आने के बाद कितने समय में जांच शुरू होगी?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ का सीधा सवाल
क्या ₹2,000 की कथित डिजिटल वसूली केवल छोटी कड़ी है?
क्या ₹15–20 हजार लेकर अवकाश फाइल आगे बढ़ाने का कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है?
क्या रायपुर DME के अधिकारियों के नाम केवल डर और वसूली के औजार के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—“जहां बताना है बता दो” कहने का साहस आखिर किस संरक्षण से मिल रहा है?
रिश्वत नहीं दी तो महीनों से फाइल बंद—अब प्रशासन बताए, दोषियों पर कार्रवाई होगी या जीवनदायिनी नर्सों को ही प्रताड़ना की आग में झोंका जाएगा?
जल्द बड़ा खुलासा—₹2,000 की डिजिटल एंट्री से ₹20,000 की कथित मांग तक; फाइलों के पीछे छिपे पूरे नेटवर्क की परतें खोलेगा ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़!
«संपादकीय स्पष्टीकरण: समाचार पीड़ित पक्ष से प्राप्त आरोपों, कथनों और उपलब्ध डिजिटल सामग्री पर आधारित है। आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। किसी “अशोक सेठ” पर प्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाया गया है; सवाल उनके नाम का कथित इस्तेमाल कर रकम मांगने वाले व्यक्ति पर है। मिथलेश मरकाम, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन, DME तथा अन्य संबंधित पक्षों का तथ्यात्मक जवाब आमंत्रित है और उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।»
Live Cricket Info
