धमेचा बंधुओ का बड़ा कारनामा.. कोरबा में ‘सरकारी जमीन’ का बड़ा खेल! कब होगी इनपर कार्यवाही कब जिला प्रशासन लेंगा संज्ञान

पहले राजस्व रिकॉर्ड में चढ़ी जमीन, फिर बेटे के नाम Gift Deed—राज खुलने लगा तो पिता खुद पहुंचे कोर्ट!…
₹15 लाख लेकर कथित कूटरचित दस्तावेज तैयार कराने का आरोप; जिस जमीन को वाद में बताया शासकीय, वहां आज भी कारोबार? अब B-1 में नया निजी नाम कैसे!
विशेष खोजी खुलासा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा। शहर के बीचों-बीच करोड़ों की जमीन का ऐसा मामला सामने आया है, जिसके न्यायालयीन दस्तावेज पढ़कर राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह आरोप किसी बाहरी शिकायतकर्ता ने नहीं लगाया।
धामेचा परिवार के बुजुर्ग रूपचंद धामेचा स्वयं न्यायालय पहुंचे और अपने ही पुत्र के पक्ष में की गई Gift Deed को शून्य घोषित कराने की मांग कर बैठे।
लेकिन अदालत में पेश वादपत्र में जो कहानी सामने आती है, वह Gift Deed के विवाद से कहीं अधिक गंभीर है।
सवाल है— जिस जमीन को लेकर स्वयं अदालत में शासकीय होने की बात कही गई, उस पर आज कब्जा और कारोबार आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है?
दस्तावेज के अनुसार विवादित भूमि खसरा नंबर 497/206, रकबा 0.03 एकड़ है। न्यायालय में पेश नक्शे में यह जमीन कोरबा-चांपा मेन रोड और इतवारी बाजार क्षेत्र से लगी दिखाई गई है।
₹15 लाख दो और जमीन रिकॉर्ड में चढ़ जाएगी? कोर्ट के दस्तावेज में चौंकाने वाला आरोप
वादपत्र में रूपचंद धामेचा का आरोप बेहद गंभीर है।
उन्होंने न्यायालय के सामने कहा कि प्रतिवादी क्रमांक 2 एवं 3 ने उनसे कहा था कि भूमि को वैधानिक तरीके से उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराया जा सकता है और इसके लिए ₹15 लाख सरकारी शुल्क देना होगा।
वादी का दावा है कि उसने ₹15 लाख दिए, जिसके बाद जमीन को खसरा 497/206 के रूप में उसके नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज कराया गया और उसे B-1, खसरा संबंधी दस्तावेज भी दिए गए। दस्तावेज में पटवारी एवं तत्कालीन तहसीलदार के हस्ताक्षर होने का भी दावा किया गया है।
अब प्रशासन बताए—₹15 लाख गए कहां?
यदि पैसा वास्तव में “सरकारी शुल्क” था तो उसकी सरकारी रसीद कहां है?
किस राजस्व प्रकरण में जमीन निजी नाम पर दर्ज हुई?
किस पटवारी ने प्रतिवेदन बनाया?
किस RI ने सत्यापन किया?
और किस तहसीलदार के आदेश से कथित शासकीय भूमि निजी रिकॉर्ड में पहुंच गई?
रिकॉर्ड बना, बेटे के नाम Gift Deed हुई… फिर कहानी पलट गई!
राजस्व दस्तावेज मिलने के बाद पिता ने अपने पुत्र के पक्ष में 23 दिसंबर 2021 को पंजीकृत Gift Deed कर दी।
लेकिन बाद में पिता स्वयं न्यायालय पहुंचे।
वादपत्र में आरोप लगाया गया कि जानकारी मिलने पर पता चला कि संबंधित भूमि शासकीय प्रकृति की भूमि थी और उसे कथित रूप से गलत तरीके से राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराया गया था। इसके बाद पुत्र के पक्ष में निष्पादित Gift Deed को अवैध एवं शून्य घोषित कराने की मांग की गई।
यहीं से उठता है सबसे विस्फोटक सवाल—
जब जमीन शासकीय निकली तो कब्जा क्यों नहीं हटा?
यदि अदालत में प्रस्तुत वाद के अनुसार जमीन पर निजी स्वामित्व का आधार ही संदिग्ध था, तो राजस्व प्रशासन ने आगे क्या किया?
क्या खसरा 497/206 की मूल फाइल खोली गई?
क्या संबंधित अधिकारियों की भूमिका जांची गई?
क्या कथित गलत प्रविष्टि निरस्त की गई?
और यदि भूमि वास्तव में शासकीय रिकॉर्ड की थी तो—
आज वहां निजी कारोबार किस अधिकार से चल रहा है?
अब B-1 में नया नाम! क्या सरकारी जमीन ने फिर बदला ‘मालिक’?
मामला यहीं समाप्त नहीं होता।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क को उपलब्ध कराई गई वर्तमान जानकारी में दावा किया गया है कि आज के B-1/खसरा रिकॉर्ड में एक अन्य व्यक्ति का नाम तथा जाति “अग्रवाल” दिखाई दे रही है।
वर्तमान B-1 इस न्यायालयीन PDF का हिस्सा नहीं है, इसलिए उसके वास्तविक नाम और प्रविष्टि की स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन यदि प्रमाणित वर्तमान B-1 में वास्तव में नया निजी नाम दर्ज है, तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
जिस जमीन को लेकर अदालत में शासकीय होने का दावा हुआ—वह फिर निजी नाम पर कैसे चढ़ गई?
क्या कोई नया नामांतरण आदेश हुआ?
आदेश क्रमांक क्या है?
किस अधिकारी ने किया?
भूमि का मद कब बदला?
और उसके पीछे कौन-से दस्तावेज लगाए गए?
कहीं फिर राजस्व रिकॉर्ड से तो नहीं खेला गया?
इसका उत्तर अब केवल संबंधित पक्ष नहीं, बल्कि तहसील और जिला प्रशासन के मूल रिकॉर्ड देंगे।एक जमीन नहीं—वादपत्र में दूसरी भूमि को लेकर भी गंभीर आरोप
मामले को और गंभीर बनाता है वादपत्र में दर्ज खसरा 670/1 एवं 670/4 से जुड़ा घटनाक्रम।
इसमें अनुसूचित जनजाति/कंवर समुदाय से संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर और बाद में जमीन के हिस्सों के पंजीकृत हस्तांतरण जैसे आरोप भी लगाए गए हैं।
इसलिए सवाल उठता है—
क्या यह सिर्फ एक जमीन की कहानी है, या राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर का कोई बड़ा पैटर्न?
इसका फैसला आरोपों से नहीं, मूल सरकारी फाइलों की निष्पक्ष जांच से होना चाहिए।
पिता की शपथ, बेटे की Gift Deed और सरकारी जमीन—अब फाइल खुलेगी तो किस-किस का नाम निकलेगा?
अंतिम पृष्ठ पर रूपचंद धामेचा ने बाकायदा शपथपत्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने ₹48 लाख मूल्यांकित संपत्ति से संबंधित 23.12.2021 की Gift Deed को शून्य घोषित कराने के लिए वाद प्रस्तुत करने और संबंधित कथनों को सत्य बताने का शपथपत्र दिया है।
इसलिए प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न है—
जब मामला अदालत तक पहुंच चुका था तो सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए प्रशासन ने क्या किया?
कलेक्टर कोरबा को खसरा 497/206 की शुरुआत से वर्तमान तक की पूरी राजस्व फाइल तत्काल सुरक्षित करानी चाहिए।
पुरानी और वर्तमान B-1 का मिलान हो।
नामांतरण पंजी निकाला जाए।
मूल आदेश देखा जाए।
पटवारी प्रतिवेदन और RI रिपोर्ट जांची जाए।
₹15 लाख वाले आरोप की जांच हो।
Gift Deed और उसके आधारभूत राजस्व दस्तावेजों का परीक्षण हो।
और यदि वर्तमान B-1 में नया निजी नाम है तो उस नाम के चढ़ने की पूरी फाइल सार्वजनिक हो।
क्योंकि अब सवाल सिर्फ धामेचा परिवार का नहीं है—
सवाल सरकारी जमीन का है।
सवाल सरकारी रिकॉर्ड का है।
और सबसे बड़ा सवाल—कोरबा में शासकीय जमीन आखिर निजी हाथों में पहुंचती कैसे है?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की पड़ताल जारी…
अगला खुलासा: खसरा 497/206 की वर्तमान B-1 में आखिर किसका नाम और किस आदेश से?
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