क्या बालको वन परिक्षेत्र में कानून से ऊपर है रेंजर का आदेश?

पहले खुद दी NOC, फिर उसी भूमि पर नोटिस, अब राजस्व विवाद में सुनवाई!
RTI की अनदेखी, अधिकार क्षेत्र पर सवाल, BALCO के लंबित वन मामलों के बीच फिर घिरे वन परिक्षेत्र अधिकारी जयंत सरकार
कोरबा। कोरबा जिले के बालको वन परिक्षेत्र से जुड़े दस्तावेजों के अध्ययन के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, जिस भूमि के संबंध में वर्ष 2025 में स्वयं वन परिक्षेत्र कार्यालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया था कि प्रस्तावित निर्माण से वनभूमि प्रभावित नहीं होगी, उसी प्रकरण में वर्ष 2026 में उसी कार्यालय द्वारा नोटिस जारी कर संबंधित व्यक्ति को उपस्थित होकर जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया गया।
इतना ही नहीं, संबंधित व्यक्ति द्वारा दिए गए विस्तृत जवाब में वन विभाग के अधिकार क्षेत्र, राजस्व मामलों में हस्तक्षेप तथा सूचना के अधिकार अधिनियम के पालन को लेकर कई गंभीर कानूनी प्रश्न भी उठाए गए हैं।
पहला दस्तावेज़: “वनभूमि प्रभावित नहीं होगी“
27 जून 2025 के वन विभाग के पत्र में उल्लेख है कि स्थल निरीक्षण, जीपीएस सत्यापन और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर प्रस्तावित निर्माण से वनभूमि प्रभावित नहीं होगी।
यही दस्तावेज़ आज सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है कि जब विभाग स्वयं पहले ऐसी स्थिति दर्ज कर चुका था, तो बाद में उसी भूमि पर अलग दृष्टिकोण अपनाने का आधार क्या बना?
दूसरा चरण: 13 जुलाई 2026 को नोटिस
13 जुलाई 2026 को वन परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा नया नोटिस जारी कर संबंधित व्यक्ति को कार्यालय बुलाया गया। नोटिस में एक शिकायत के आधार पर आदिवासी भूमि के कथित फर्जी नामांतरण एवं विक्रय की जांच का उल्लेख किया गया।
यहीं से विवाद और गहरा हो गया।
तीसरा चरण: विस्तृत जवाब में उठे कानूनी सवाल
नोटिस के जवाब में संबंधित व्यक्ति ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए—
क्या वन परिक्षेत्र अधिकारी को राजस्व प्रकरणों की सुनवाई का अधिकार है?
यदि शिकायत भूमि के नामांतरण और पंजीयन की है, तो यह विषय राजस्व विभाग का है या वन विभाग का?
जब शिकायत किसी संस्था द्वारा की गई है तो उसकी वैधानिक स्थिति क्या है?
यदि शिकायत गुमनाम या छद्म नाम से है तो उसकी जांच किस नियम के तहत हो रही है?
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आदेश होने के बाद भी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
चौथा चरण: फिर दूसरा नोटिस
23 जुलाई 2026 को वन विभाग ने पुनः पत्र जारी कर संबंधित व्यक्ति को दस्तावेजों सहित उपस्थित होने का निर्देश दिया और यह भी लिखा कि अनुपस्थिति की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
इससे यह विवाद और गहरा गया कि क्या वन विभाग वास्तव में अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कार्य कर रहा है या राजस्व प्रकृति के मामले में भी हस्तक्षेप कर रहा है।
BALCO से जुड़े पुराने विवादों के बीच नए सवाल
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब BALCO–वेदांता से जुड़े वन भूमि, कथित अतिक्रमण और हजारों पेड़ों की कटाई से संबंधित विभिन्न मामले पहले से प्रशासन और न्यायालयों के समक्ष लंबित बताए जाते हैं।
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में भी BALCO के कब्जे से संबंधित वन भूमि का उल्लेख किया है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि विभाग की प्राथमिकता बड़े मामलों की जांच है या व्यक्तिगत नोटिसों पर कार्रवाई।
RTI पर भी गंभीर प्रश्न
दस्तावेजों के अनुसार आरोप है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गई जानकारी प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के निर्देशों के बाद भी उपलब्ध नहीं कराई गई। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह पारदर्शिता के सिद्धांत पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जिला प्रशासन और राज्य सरकार से प्रमुख मांगें
पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
यह स्पष्ट किया जाए कि वन विभाग ने किस वैधानिक प्रावधान के तहत राजस्व प्रकृति के विवाद में नोटिस जारी किया।
2025 की NOC और 2026 की नोटिस के बीच आए बदलाव का आधार सार्वजनिक किया जाए।
सूचना के अधिकार अधिनियम के कथित उल्लंघन की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।
बालको वन परिक्षेत्र में लंबी अवधि से पदस्थ अधिकारियों की प्रशासनिक समीक्षा की जाए।
यदि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की गई है तो नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाए।
संपादकीय टिप्पणी
यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों और पत्राचार पर आधारित है। इसमें वर्णित आरोप संबंधित पक्षों के अभिलेखों और दावों पर आधारित हैं। अंतिम सत्यापन एवं कानूनी निष्कर्ष सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी अथवा न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
लेकिन यदि एक ही कार्यालय पहले किसी भूमि पर “वनभूमि प्रभावित नहीं होगी” का पत्र जारी करे और बाद में उसी प्रकरण में नोटिस देकर जांच शुरू करे, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता—यह प्रशासनिक पारदर्शिता, अधिकार-क्षेत्र और शासन की जवाबदेही का विषय बन जाता है।
अब निगाहें जिला प्रशासन, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा राज्य सरकार पर हैं कि वे इस पूरे मामले में क्या कदम उठाते हैं।
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