12 हजार मनरेगा कर्मचारियों का बिगुल: क्या छत्तीसगढ़ के गांवों में विकास की रफ्तार थमने वाली है?

20 साल सेवा, फिर भी असुरक्षा!
2 जुलाई से प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान, सरकार के सामने बड़ा संकट
रायपुर/कोरबा। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण विकास व्यवस्था की नींव माने जाने वाले मनरेगा कर्मचारियों ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। प्रदेश के लगभग 12 हजार मनरेगा कर्मचारी 2 जुलाई 2026 से चरणबद्ध हड़ताल पर जाने की तैयारी में हैं। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो इसका असर सीधे गांवों के विकास कार्यों, मजदूरों के भुगतान और पंचायत व्यवस्था पर पड़ सकता है।
यह केवल कर्मचारियों की हड़ताल नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो दो दशकों से ग्रामीण रोजगार और विकास की रीढ़ मानी जाती रही है।
बड़ा सवाल: 20 वर्षों की सेवा का यही पुरस्कार?
मनरेगा कर्मचारी महासंघ का कहना है कि हजारों कर्मचारी पिछले लगभग 20 वर्षों से गांव-गांव में रोजगार गारंटी योजना को सफल बनाने में जुटे हैं। लेकिन आज भी वे सेवा सुरक्षा, नियमितीकरण, सामाजिक सुरक्षा और स्पष्ट HR पॉलिसी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
यदि यह दावा सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी योजनाओं को चलाने वाले कर्मचारी खुद असुरक्षित रहेंगे?
क्या सरकार के लिए उनकी समस्याएं प्राथमिकता नहीं हैं?
ढाई साल से फाइलों में कैद HR पॉलिसी?
कर्मचारी संगठन का आरोप है कि HR पॉलिसी की फाइल वर्षों से लंबित है। समिति बनी, चर्चा हुई, आश्वासन मिले, लेकिन जमीन पर परिणाम नहीं दिखाई दिए।
अब कर्मचारियों का धैर्य जवाब देता नजर आ रहा है।
तीन चरणों में आंदोलन
2 जुलाई
जनपद स्तर पर हड़ताल और प्रदर्शन
3 जुलाई
जिला मुख्यालयों में रैली और विरोध प्रदर्शन
4 जुलाई
राज्य स्तरीय बड़ा प्रदर्शन
यदि इसके बाद भी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन और व्यापक हो सकता है।
गांवों पर क्या होगा असर?
यदि 12 हजार कर्मचारी कार्य बहिष्कार करते हैं तो—
– मनरेगा के नए कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
– मजदूरी भुगतान में देरी हो सकती है।
– पंचायतों का प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होगा।
– रोजगार मांग पंजीयन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
– ग्रामीण विकास परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है।
सबसे अधिक प्रभावित होंगे वे ग्रामीण परिवार जो मनरेगा को आय का महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं।
सरकार के सामने चुनौती
राज्य सरकार लगातार सुशासन, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन की बात करती है। ऐसे में 12 हजार कर्मचारियों की नाराजगी सरकार के लिए एक गंभीर प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती बन सकती है।
कर्मचारियों की मांग है—
– नियमितीकरण
– 62 वर्ष तक सेवा सुरक्षा
– स्पष्ट स्थानांतरण एवं निलंबन नीति
– वार्षिक वेतन वृद्धि
– चिकित्सा सुविधा
– अनुकंपा नियुक्ति
– सेवा पुस्तिका संधारण
– ग्राम रोजगार सहायकों का संविदाकरण एवं ग्रेड पे निर्धारण
ग्राम यात्रा का सवाल
जब मनरेगा को देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना कहा जाता है, तब उसे जमीन पर लागू करने वाले कर्मचारी आज भी अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित क्यों हैं?
क्या 1 जुलाई से पहले सरकार कोई ठोस निर्णय लेगी?
या फिर 2 जुलाई से शुरू होने वाला आंदोलन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण विकास तंत्र को झकझोर देगा?
अब पूरे प्रदेश की नजरें 1 जुलाई पर टिकी हैं।
फैसला सरकार को करना है—संवाद या संघर्ष?
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