क्या BALCO का हरित विकास सिर्फ कागज़ों तक सीमित? लाखों पौधों के दावों के बीच जमीनी हकीकत पर उठ रहे गंभीर सवाल

कोरबा/छत्तीसगढ़।
देश में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और हरित विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बीच छत्तीसगढ़ के कोरबा क्षेत्र से ऐसे सवाल उठ रहे हैं जो सरकारी दावों, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और वन संरक्षण नीतियों की वास्तविकता को कटघरे में खड़ा करते हैं।
BALCO प्रबंधन द्वारा वर्षों से लाखों पौधे लगाने और बड़े पैमाने पर हरित क्षेत्र विकसित करने के दावे किए जाते रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों में वर्ष 2015-16 से 2023-24 के बीच लगभग 8.87 लाख पौधे लगाए जाने तथा 6.16 लाख पौधों के जीवित होने का उल्लेख है। वहीं प्रतिपूरक वनीकरण के तहत 290 हेक्टेयर क्षेत्र में 3.10 लाख से अधिक पौधे लगाए जाने का भी दावा किया गया है।
लेकिन स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और जनसंगठनों का आरोप है कि इन दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
“धरातल पर हरियाली नहीं, सिर्फ आंकड़े”
स्थानीय लोगों का कहना है कि कागजों में हजारों-लाखों पौधों का रिकॉर्ड दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविक स्थलों पर अपेक्षित घनत्व और संख्या में वृक्ष दिखाई नहीं देते। कई स्थानों पर पहले से मौजूद प्राकृतिक एवं विकसित वृक्षों की कटाई हुई, जबकि उसके बदले किए गए वृक्षारोपण की सफलता संदिग्ध बनी हुई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योग विस्तार, खनन गतिविधियों और अवसंरचना परियोजनाओं के नाम पर वर्षों से क्षेत्र की हरित संपदा प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि यदि दस्तावेजों में दर्ज पौधारोपण और जीवितता के आंकड़े सही हैं, तो संबंधित स्थलों का स्वतंत्र सामाजिक एवं वैज्ञानिक ऑडिट कराया जाना चाहिए।
दस्तावेजों में भी दिखती हैं विसंगतियां
उपलब्ध रिकॉर्ड में कुछ स्थानों पर पौधों की जीवितता दर 80 प्रतिशत से अधिक दिखाई गई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह 0 से 2 प्रतिशत तक दर्ज है। यह स्थिति स्वयं कई प्रश्न खड़े करती है—
- जिन क्षेत्रों में जीवितता शून्य या नगण्य है, वहां पुनः रोपण क्यों नहीं हुआ?
- लाखों पौधों पर खर्च की गई राशि का स्वतंत्र मूल्यांकन कब होगा?
- क्या लगाए गए पौधों की जीआईएस मैपिंग और सार्वजनिक निगरानी की व्यवस्था है?
- क्या स्थानीय ग्रामसभाओं को सत्यापन प्रक्रिया में शामिल किया गया?
शिकायतें प्रशासन से लेकर उच्चतम न्यायालय तक
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई नागरिकों और संगठनों का दावा है कि वृक्ष कटाई, पर्यावरणीय क्षति और प्रतिपूरक वनीकरण से संबंधित शिकायतें जिला प्रशासन, राज्य सरकार तथा विभिन्न न्यायिक एवं वैधानिक मंचों तक पहुंच चुकी हैं। इन शिकायतों के निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षण की मांग लगातार उठती रही है।
जल-जंगल-जमीन की लड़ाई
कोरबा केवल एक औद्योगिक क्षेत्र नहीं, बल्कि जंगलों, जलस्रोतों और आदिवासी समुदायों की जीवनरेखा भी है। पर्यावरणविदों का कहना है कि किसी भी विकास परियोजना का मूल्यांकन केवल उत्पादन और निवेश से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय प्रभाव, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के आधार पर भी होना चाहिए।
क्या होना चाहिए?
विशेषज्ञों और जनसंगठनों की प्रमुख मांगें—
- BALCO और संबंधित परियोजनाओं के वृक्षारोपण दावों का स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट।
- सभी वृक्षारोपण स्थलों की जीआईएस आधारित सार्वजनिक मैपिंग।
- प्रतिपूरक वनीकरण निधि के उपयोग का सामाजिक अंकेक्षण।
- वृक्ष कटाई और पौधारोपण संबंधी सभी अभिलेख सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराना।
- ग्रामसभा, स्थानीय समुदाय और पर्यावरण विशेषज्ञों की संयुक्त निगरानी समिति का गठन।
- जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा हेतु उच्च स्तरीय जांच।
सबसे बड़ा सवाल
यदि लाखों पौधे वास्तव में लगाए गए और जीवित हैं, तो वे कहां हैं?
और यदि वे धरातल पर नहीं हैं, तो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर खर्च हुई करोड़ों रुपये की राशि और सरकारी दावों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
यह सवाल केवल BALCO या कोरबा का नहीं, बल्कि पूरे देश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की विश्वसनीयता का है।
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