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सड़क PWD की, उपयोग BALCO का, निर्माण DMF से ? पहले खुद मरम्मत कराई, अब सरकारी पैसे से करोड़ों का काम — BALCO मॉडल पर उठे बड़े सवाल

पहले खुद मरम्मत कराई, अब सरकारी पैसे से करोड़ों का काम — BALCO मॉडल पर उठे बड़े सवाल

कोरबा। जिले में विकास कार्यों के नाम पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम की प्राथमिकताओं और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस सड़क का स्वामित्व लोक निर्माण विभाग (PWD) के पास है, उसका सबसे अधिक उपयोग BALCO</b द्वारा किया जाता है, और अब उसी सड़क के निर्माण के लिए जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, क्योंकि यहां तस्वीर साफ दिखती है — सड़क सरकारी है, उपयोग निजी है और खर्च जनता के खनिज फंड से किया जा रहा है।

पूरे मामले को समझें तो सामने आता है कि जिस मार्ग पर यह निर्माण प्रस्तावित है, वह लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों का मुख्य मार्ग बना हुआ है। इस सड़क पर सबसे ज्यादा दबाव BALCO के भारी वाहनों, ट्रांसपोर्ट और मटेरियल मूवमेंट का रहता है। आम नागरिकों का उपयोग इसके मुकाबले काफी कम बताया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस सड़क का प्रमुख उपयोग एक औद्योगिक इकाई कर रही है, उसके निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी आखिरकार सरकारी फंड पर क्यों डाली जा रही है।

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इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आता है कि करीब 12 साल पहले इसी ध्यानचंद चौक से परसाभाठा बाजार तक की सड़क की मरम्मत BALCO द्वारा कराई गई थी। यानी उस समय कंपनी ने खुद यह स्वीकार किया था कि यह मार्ग उनके उपयोग में है और उसकी देखरेख में उनकी भूमिका है। लेकिन अब जब फिर से सड़क निर्माण की जरूरत पड़ी, तो जिम्मेदारी सीधे DMF फंड पर डाल दी गई। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नीयत और प्राथमिकता दोनों पर सवाल खड़ा करता है।

DMF फंड का उद्देश्य स्पष्ट रूप से खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाएं देना है — जैसे ग्रामीण सड़कें, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा। लेकिन जब इसी फंड का उपयोग ऐसे मार्ग पर किया जाता है, जिसका मुख्य लाभ एक बड़ी औद्योगिक कंपनी को मिलता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह फंड अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है।

स्थानीय स्तर पर अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यह एक तरह का “मॉडल” बनता जा रहा है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग निजी होता है, लेकिन उसका खर्च सार्वजनिक फंड से उठाया जाता है। यानी फायदा कंपनी का और बोझ जनता के पैसे पर। यह व्यवस्था न केवल असंतुलित है, बल्कि भविष्य के लिए एक खतरनाक उदाहरण भी बन सकती है।

प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या इस सड़क के उपयोग का सही मूल्यांकन किया गया? क्या यह देखा गया कि इसका लाभ किसे ज्यादा मिल रहा है? क्या कंपनी की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया? या फिर सीधे DMF फंड का उपयोग आसान विकल्प मान लिया गया? ये सभी सवाल अब सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं।

लोगों का कहना है कि जहां ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सड़क, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, वहां करोड़ों रुपये ऐसे कार्यों पर खर्च करना, जिनका सीधा लाभ उद्योग को मिले, कहीं न कहीं प्राथमिकताओं की गंभीर गड़बड़ी को दर्शाता है।

यह मामला केवल एक सड़क का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सोच का आईना है। यदि इसी तरह सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निजी लाभ के लिए होता रहा, तो DMF जैसे महत्वपूर्ण फंड का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

अब नजर इस बात पर है कि क्या इस मामले में जवाबदेही तय होगी, या फिर यह भी अन्य मामलों की तरह कागजों में दबकर रह जाएगा।

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