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क्या कोरबा में धीरे-धीरे फैल रहा है सायनाइड मौत का जहर?

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BALCO पर जहरीले अपशिष्ट को खुले में दबाने का आरोप, हाईकोर्ट आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं

कोरबा. ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्युज नेटवर्क

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छत्तीसगढ़ के औद्योगिक शहर कोरबा से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पर्यावरण सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और आम लोगों के जीवन के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO) पर आरोप है कि प्लांट से निकलने वाले अत्यंत जहरीले “सायनाइड युक्त कैथोड ब्लॉक” को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट करने के बजाय खुले में फेंका और जमीन में दबाया जा रहा है।*

शिकायतकर्ता का दावा है कि यही जहर अब मिट्टी, भूजल, हवा और नदी तक पहुंच चुका है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, कोरबा कलेक्टर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य शासन तक शिकायतें पहुंचने के बावजूद आज तक निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।

धीरे-धीरे मौत बांट रहा है जहरीला कचरा?

दस्तावेजों में दावा किया गया है कि BALCO प्लांट में एल्युमिनियम उत्पादन के दौरान निकलने वाला “कैथोड ब्लॉक” अत्यंत खतरनाक अपशिष्ट है, जिसमें सायनाइड जैसे जहरीले तत्व मौजूद रहते हैं।

आरोप है कि:

हर महीने टनों जहरीला अपशिष्ट बाहर निकाला जाता है

उसका वैज्ञानिक ट्रीटमेंट नहीं किया जाता

जहरीले पदार्थ को खुले में रखा और जमीन में दबाया जाता है

बारिश और हवा के जरिए यह जहर खेत, भूजल और हसदेव नदी तक पहुंच रहा है

यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल पर्यावरण प्रदूषण नहीं बल्कि “धीरे-धीरे फैलती औद्योगिक त्रासदी” हो सकती है।

कैंसर, संक्रमण और मौत के दावे

शिकायतकर्ता इंजीनियर उमेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि BALCO प्लांट के आसपास रहने वाले लोगों में गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं।  शिकायत में कैंसर, संक्रमण और असामयिक मौतों तक का उल्लेख किया गया है।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र मेडिकल पुष्टि सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद व्यापक स्वास्थ्य सर्वे क्यों नहीं कराया गया?

क्या जिला प्रशासन व ज़िले के जनप्रतिनिधियों ने भी इस अत्यंत गंभीर मुद्दे पर विरोध दर्ज कराना उचित नहीं समझा?

17 साल से जारी संघर्ष

यह मामला अचानक नहीं उठा। दस्तावेज बताते हैं कि शिकायतकर्ता पिछले लगभग 17 वर्षों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं।

घटनाक्रम:

2008 – सायनाइड ट्रीटमेंट तकनीक का अध्ययन, BALCO को सुझाव

2018 – प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को शिकायत

2019 – कोरबा कलेक्टर को आवेदन

2020 – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका

2021-22 – अवमानना कार्यवाही और जांच निर्देश

2025 – राज्य मंत्री कार्यालय तक नई शिकायत*
फिर भी कोई शिकायत को संज्ञान में नहीं लिया गया अब तक??


हाईकोर्ट के आदेश… फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

उपलब्ध दस्तावेजों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को शिकायतों पर विचार कर उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।  कोरबा कलेक्टर कार्यालय ने भी आदेश अनुपालन को लेकर पत्र जारी किए।

इसके बावजूद यदि:

भूजल जांच नहीं हुई,

वैज्ञानिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई,

जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई,

तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक निष्क्रियता और पर्यावरणीय जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

क्या देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय लापरवाहियों में से एक बन रहा है यह मामला?

कोरबा पहले से ही देश के सबसे प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में गिना जाता है।

ऐसे में यदि जहरीले सायनाइड अपशिष्ट को खुले में रखने और दबाने के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पड़ सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि सायनाइड जैसे तत्व:

भूजल को वर्षों तक जहरीला बना सकते हैं

मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट कर सकते हैं

गंभीर न्यूरोलॉजिकल और कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं

 

अब सबसे बड़े सवाल

क्या BALCO वैज्ञानिक तरीके से जहरीले अपशिष्ट का निष्पादन कर रहा है ?

क्या प्रशासन ने स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई?

क्या आसपास के लोगों का हेल्थ ऑडिट हुआ?

हाईकोर्ट के आदेशों का पालन आखिर कहां तक हुआ?

यदि खतरा नहीं है, तो सार्वजनिक जांच रिपोर्ट जारी क्यों नहीं की जाती?

जनता की मांग

स्थानीय लोग अब मांग कर रहे हैं कि: NGT या सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग में जांच हो। स्वतंत्र वैज्ञानिक एजेंसी से सैंपल टेस्टिंग हो। भूजल और हसदेव नदी की रिपोर्ट सार्वजनिक हो प्रभावित क्षेत्रों का मेडिकल सर्वे कराया जाए। दोषी अधिकारियों और प्रबंधन पर आपराधिक कार्रवाई हो

यह मामला केवल एक कंपनी या एक शहर तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि क्या भारत के औद्योगिक विकास की कीमत आम लोगों की सांसों, पानी और जीवन से चुकाई जा रही है?

यदि आरोप सही हैं, तो कोरबा की यह कहानी आने वाले समय में देश के सबसे बड़े पर्यावरणीय घोटालों में शामिल हो सकती है।**

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