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सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित… फिर भी बाउंड्रीवाल निर्माण ? दो-दो नोटिस के बाद भी नहीं रुका काम, बालको के सीईओ राजेश कुमार और ठेकेदार हेमस कॉर्पोरेशन पर उठे गंभीर सवाल

कोरबा। बेलाकछार नदी किनारे और नेहरू नगर क्षेत्र में बालको टाउनशिप के पास चल रहे बाउंड्रीवाल निर्माण ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। एक ओर जहां नगर पालिक निगम कोरबा ने 2026 में दो-दो नोटिस जारी कर बिना अनुमति निर्माण रोकने का आदेश दिया, वहीं दूसरी ओर मौके पर काम लगातार जारी रहने से सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके दम पर यह निर्माण चल रहा है ?

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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस जमीन पर यह बाउंड्रीवाल खड़ी की जा रही है, उसी मामले में वर्ष 2007 में नगर पालिक निगम ने अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया था। निगम के 03 मई 2007 के पत्र में स्पष्ट लिखा गया था कि संबंधित भूमि का मामला माननीय सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली में रिट पिटिशन (सिविल) क्रमांक 469/2005 – सार्थक एवं अन्य बनाम भारत सरकार एवं अन्य में विचाराधीन है, इसलिए बाउंड्रीवाल निर्माण की अनुमति देना संभव नहीं है और आवेदन वापस किया जाता है।

अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब यह भूमि विवाद सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन रहा है, तो आज उसी स्थान पर यह निर्माण किसके आदेश से चल रहा है ? क्या सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद समाप्त हो चुका है, या फिर नियमों को दरकिनार कर सीधे निर्माण शुरू कर दिया गया ?

इधर नगर पालिक निगम कोरबा ने 02 फरवरी और 03 फरवरी 2026 को दो अलग-अलग नोटिस जारी कर निर्माण रोकने का निर्देश दिया था। नोटिस में स्पष्ट कहा गया कि बिना अनुमति निर्माण छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 293, 302 और 307 का उल्लंघन है। इसके बावजूद मौके पर निर्माण कार्य जारी रहना प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

जानकारी के अनुसार यह निर्माण कार्य हेमस कॉर्पोरेशन नामक ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा है और लगभग दो महीनों से लगातार काम जारी है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ठेकेदार को भूमि की कानूनी स्थिति और अनुमति की जानकारी नहीं थी, या फिर सब कुछ जानते हुए भी निर्माण किया जा रहा है ?

पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल बालको के सीईओ राजेश कुमार और प्रशासनिक प्रमुख कैप्टन धनंजय मिश्रा की भूमिका पर उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बालको प्रबंधन पहले निर्माण शुरू करता है और बाद में नियमों को कागजों में पूरा करने की कोशिश करता है।

अगर वास्तव में अनुमति नहीं है और निगम ने नोटिस भी जारी कर दिया है, तो फिर काम क्यों नहीं रोका गया ? क्या बालको प्रबंधन खुद को कानून से ऊपर समझ रहा है ?

इस निर्माण से दोन्द्रो बेला के ग्रामीणों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है। जिस नदी किनारे रास्ते से ग्रामीण वर्षों से बालको नगर और कोरबा शहर आते-जाते थे, वह रास्ता अब बाउंड्रीवाल की वजह से लगभग बंद हो गया है। ग्रामीणों को कई किलोमीटर घूमकर आना-जाना पड़ रहा है।

अब मांग उठ रही है कि जिला प्रशासन और नगर पालिक निगम तत्काल पूरे मामले की जांच करें और स्पष्ट करें कि यह निर्माण किस अनुमति के आधार पर हो रहा है। यदि बिना अनुमति और न्यायिक विवाद वाली जमीन पर निर्माण किया जा रहा है, तो उस पर तुरंत रोक लगाकर जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट से जुड़े विवाद और निगम के नोटिस के बावजूद निर्माण चलता रहा, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं बल्कि कानून की खुली अवहेलना जैसा गंभीर सवाल खड़ा करेगा।

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