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कोरबा में करोड़ों की जमीन घोटाले का खुलासा: तहसीलदार ने लांघी सीमा, शासकीय भूमि को बना दिया निजी ! पूर्व राजस्व मंत्री के करीबी के लिए भूले नियम कानून… देखिए आदेश !

धारा 89 में एसडीएम का अधिकार, लेकिन तहसीलदार ने पारित कर दिया आदेश – पर्दे के पीछे ‘सेटिंग’ का बड़ा खेल ?

कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से एक ऐसा राजस्व घोटाला सामने आया है, जो न केवल सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि जब सिस्टम ही भ्रष्टाचार में डूब जाए, तो कानून और नियम कितने बेबस हो जाते हैं। ग्राम नकटीखार की करीब 6.52 एकड़ शासकीय भूमि को कथित रूप से एक सुनियोजित साजिश के तहत निजी नाम पर दर्ज करा दिया गया — और यह पूरा खेल हुआ राजस्व न्यायालय के आदेश के जरिए।

सबसे बड़ा सवाल: तहसीलदार ने कैसे दे दिया धारा 89 का आदेश?

मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 89 के तहत अभिलेख दुरुस्ती (रिकॉर्ड सुधार) का अधिकार अनुविभागीय अधिकारी (SDM) को होता है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में तहसीलदार कोरबा ने स्वयं आदेश पारित कर दिया।

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कानूनी जानकारों के अनुसार, यह स्पष्ट रूप से अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या फिर किसी बड़े खेल का हिस्सा?

कैसे शासकीय जमीन बनी निजी?

राजस्व अभिलेखों के अनुसार, ग्राम नकटीखार में स्थित भूमि मूलतः खसरा नंबर 312 (रकबा 6.52 एकड़) के रूप में पूर्वजों के नाम दर्ज थी। लेकिन बंदोबस्त सर्वे के दौरान यह भूमि कथित रूप से त्रुटिवश शासकीय मद (सरकारी जमीन) में दर्ज हो गई।

यहीं से शुरू हुआ पूरा खेल। आवेदकों द्वारा धारा 89 के तहत आवेदन दिया गया और बिना किसी आपत्ति के सीधे आदेश पारित कर दिया गया कि यह भूमि निजी खातेदारों के नाम दर्ज की जाए।

चौंकाने वाली बात यह है कि न तो किसी स्तर पर गंभीर आपत्ति दर्ज हुई और न ही उच्च अधिकारी की अनुमति ली गई — जबकि मामला शासकीय भूमि से जुड़ा था।

सूत्रों का दावा: पर्दे के पीछे ‘भू माफिया’ का खेल

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण में मनोज ठाकुर नामक व्यक्ति पर्दे के पीछे मुख्य भूमिका में था। बताया जाता है कि उसने राजस्व विभाग में अपनी पकड़ का इस्तेमाल करते हुए पटवारी से लेकर तहसीलदार तक पूरी सेटिंग जमाई और करोड़ों की जमीन को निजी करा लिया।

सूत्र यह भी बताते हैं कि इस पूरे नेटवर्क में सुमित दान नाम का एक व्यक्ति अहम कड़ी है, जो कथित रूप से दादर, कोरबा और रामपुर क्षेत्र में पटवारी और तहसीलदार स्तर पर सेटिंग कराने का काम करता है।

‘लाइजनर’ का नेटवर्क: पैसे से लेकर फाइल तक सब मैनेज?

आरोप है कि सुमित दान नामक यह व्यक्ति राजस्व विभाग में पैसों के लेन-देन से लेकर दस्तावेजों की हेरफेर तक का काम संभालता है।

सूत्रों का कहना है कि:

  • शासकीय व नजूल भूमि पर नंबर सेट कराना
  • रिकॉर्ड में बदलाव कराना
  • पटवारी रिपोर्ट मैनेज करना
  • फाइलों को आगे बढ़वाना

— यह सब इसी नेटवर्क के जरिए किया जाता है।

स्थानीय स्तर पर इसे “कोरबा राजस्व विभाग का मास्टर माइंड” तक कहा जाता है।

पहले भी सामने आ चुका है नाम

यह कोई पहला मामला नहीं है। सूत्र बताते हैं कि पूर्व में भी मनोज ठाकुर द्वारा शासकीय भूमि को अपने नाम चढ़वाने का मामला सामने आया था।

उस मामले में जिला कलेक्टर की जांच में गड़बड़ी की पुष्टि हुई थी और एफआईआर दर्ज करने के आदेश भी दिए गए थे। हालांकि, संबंधित पक्ष द्वारा मामला हाईकोर्ट में चुनौती दे दिया गया, जहां यह प्रकरण अभी लंबित बताया जा रहा है।

सबूत ऑनलाइन गायब, लेकिन ‘ग्राम यात्रा’ के पास पूरी फाइल

इस पूरे मामले का सबसे संदिग्ध पहलू यह है कि जहां आज के दौर में राजस्व न्यायालय के सभी प्रकरण और आदेश ऑनलाइन अपलोड किए जाते हैं, वहीं इस मामले में आवेदन से लेकर अंतिम आदेश तक कोई रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है

यह अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर इस प्रकरण को ऑनलाइन सिस्टम से क्यों गायब रखा गया?

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के पास इस पूरे मामले की नकल (Certified Copy) मौजूद है, जिसमें साफ तौर पर इस घोटाले की पूरी कहानी दर्ज है — कैसे नियमों को दरकिनार कर, अधिकार क्षेत्र को लांघते हुए और सिस्टम की कमजोरी का फायदा उठाकर करोड़ों की जमीन का खेल खेला गया।

जब सिस्टम ही भ्रष्ट हो जाए…

यह मामला सिर्फ एक जमीन का नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि जब सिस्टम के भीतर बैठे लोग ही नियमों को तोड़ने लगें, तो आम जनता के अधिकार कितने असुरक्षित हो जाते हैं।

यहां सवाल सिर्फ तहसीलदार के आदेश का नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की विश्वसनीयता का है।

जांच और कार्रवाई की मांग

अब इस पूरे मामले में जिला प्रशासन और राज्य सरकार से यह मांग उठ रही है कि:

  • तहसीलदार द्वारा पारित आदेश की वैधता की जांच हो
  • धारा 89 के दुरुपयोग की जांच हो
  • पूरे प्रकरण में शामिल अधिकारियों की भूमिका तय हो
  • भू माफिया और कथित दलालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो
  • ऑनलाइन रिकॉर्ड से दस्तावेज गायब होने की जांच हो
फर्जी आदेश जिसके तहत सरकारी भूमि को निजी बना दिया

सुलगते सवाल

क्या कोरबा में राजस्व विभाग अब कानून से नहीं, बल्कि सेटिंग से चल रहा है?

क्या करोड़ों की सरकारी जमीन इसी तरह निजी हाथों में जाती रहेगी?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या इस बार कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?

(जारी…)

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