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निजी लैब को फायदा पहुंचाने अस्पताल प्रबंधन का खेल, नियमों की धज्जियां उड़ीं — कोरबा मेडिकल कॉलेज में रीजेंट की कमी नहीं, बल्कि मिलीभगत का मामला उजागर

कोरबा। आरटीआई दस्तावेज़ों से बड़ा खुलासा हुआ है कि कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पैथोलॉजी जांच कार्य को जानबूझकर निजी लैब को सौंपा गया है। यह सौंपा गया कार्य सिर्फ कोटेशन के आधार पर किया गया है, जबकि छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 यथा संसोधित 2022 में स्पष्ट प्रावधान है कि कोटेशन प्रक्रिया के जरिए केवल 3 लाख रुपये तक के कार्य ही किए जा सकते हैं

लेकिन यहाँ लाखों रुपए के परीक्षण कार्य इसी प्रक्रिया से कराए जा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि पूरा मामला निजी हित साधने और कमीशनखोरी की योजना के तहत संचालित किया जा रहा है।

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अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप — नियम तोड़कर जांच जिम्मा निजी हाथों में

प्राप्त आरटीआई दस्तावेज़ बताते हैं कि अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर की अनुमति से एक निजी पैथोलॉजी लैब को कोटेशन बेस पर ब्लड टेस्ट और अन्य जांचों की जिम्मेदारी दे दी गई।
दस्तावेज़ों में यह भी पाया गया कि अस्पताल की जो अपनी मशीनें और उपकरण पूरी तरह कार्यशील हैं, बावजूद इसके कई ऐसे सैम्पल निजी लैब को भेजे गए

सूत्र बताते हैं कि “जो जांचें अस्पताल में ही हो सकती थीं, उन्हें भी बाहर भेजा गया ताकि बिलिंग बढ़ाई जा सके और कमीशन की राशि अधिक मिले।”


बिलिंग में बड़ा खेल — जितनी अधिक जांच, उतना अधिक कमीशन

अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि इस पूरी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य बिलिंग को बढ़ाना है।

“जितना ज्यादा बिल बनेगा, उतना ज्यादा कमीशन मिलेगा।”

यहाँ तक कि कुछ मामलों में अस्पताल के चिकित्सकों के नाम पर भी जांच पर्चियाँ तैयार की गईं, ताकि बिलिंग और भुगतान का हिस्सा “सभी स्तरों तक” बाँटा जा सके।


भंडार क्रय नियमों का खुला उल्लंघन

छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम, 2002 के अनुसार:

“कोटेशन के आधार पर केवल ऐसे कार्य किए जा सकते हैं जिनकी वार्षिक राशि 3 लाख रुपये तक सीमित हो। उससे अधिक राशि के लिए अनिवार्य रूप से टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।”

लेकिन कोरबा मेडिकल कॉलेज में कोटेशन के जरिए ही कई गुना अधिक राशि का कार्य कराया गया। इससे न केवल वित्तीय अनुशासन टूटा है, बल्कि सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुँचा है।


आरटीआई से निकले दस्तावेज़ों ने खोली पोल

आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार,

  • निजी लैब को बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के जांच कार्य सौंपा गया,
  • जिन 3 कोटेशन को मंगाया गया है उनमें 2 कोटेशन एक ही संस्था से संबंधित थे, मतलब एक अस्पताल का और दूसरा उसके सहयोगी पैथोलॉजी लैब का।
  • अस्पताल से भेजे गए सैम्पलों की संख्या और भुगतान की रकम में भारी अंतर पाया गया,
  • और विभागीय स्वीकृति के बिना भुगतान किया गया।

इन सभी दस्तावेज़ों की कॉपी ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के पास मौजूद है।


जनता पर डाली गई आर्थिक मार

रीजेंट की कमी का हवाला देकर निजी लैब को फायदा पहुँचाया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि

“अस्पताल की अपनी लैब पूरी तरह सक्षम थी। लेकिन मरीज़ों को निजी सेंटरों की ओर भेजकर उनसे मोटी फीस वसूली गई।”

इससे गरीब और बीपीएल मरीजों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा और मुफ्त जांच की सरकारी योजना बेअसर हो गई।


कलेक्टर व स्वास्थ्य विभाग से जांच की मांग

अस्पताल प्रबंधन की मनमानी इससे ही समझी जा सकती है कि कोरबा के ईमानदार कलेक्टर ने नई मशीने तक खरीदकर अस्पताल में भेजवा दिए थे बावजूद मशीनों को प्रारम्भ नहीं किया गया था 3 माह बाद कलेक्टर से मिली फटकार के बाद अधिकांश मशीनों को शुरू किया गया है लेकिन अब भी अंदरखाने में खेल जारी है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने अब इस पूरे मामले की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार है।

उन्होंने कहा कि –

“जब भंडार क्रय नियम में साफ लिखा है कि 3 लाख से ऊपर का कार्य टेंडर के बिना नहीं हो सकता, तो फिर यह कोटेशन प्रक्रिया क्यों अपनाई गई ?”


अस्पताल प्रबंधन ने जवाब नहीं दिया

इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए अस्पताल प्रशासन और मेडिकल सुप्रिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर से संपर्क किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
यदि उनका पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे अद्यतन रूप में प्रकाशित किया जाएगा।

“कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रीजेंट की कमी की आड़ में जो खेल खेला जा रहा है, वह सीधे जनता की जेब पर वार है। अब यह मामला केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। न्यायालय और शासन को इसमें तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।”

 

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