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कॉपीकेट बनी कांग्रेस ! भाजपा की राह पर कांग्रेस के सिपाही… कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी यादव जी क्या लगा पाएंगे डूबती नैया को पार, या फिर जनता धोखेबाज़ों को फिर से सिखाएगी सबक…वार्डनामा में समझिए कोरबा के इस पॉश इलाके की अब तक की राजनीतिक नब्ज…

कॉपीकेट बनी कांग्रेस ! भाजपा की राह पर कांग्रेस के सिपाही…

कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी यादव जी क्या लगा पाएंगे डूबती नैया को पार, या फिर जनता धोखेबाज़ों को फिर से सिखाएगी सबक…

वार्डनामा में समझिए कोरबा के इस पॉश इलाके की अब तक की राजनीतिक नब्ज…

कोरबा नगर निगम के पंडित रविशंकर शुक्ल नगर वार्ड 26 में इस बार का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए मुश्किल में डालने वाला साबित होगा। दोनों ही पार्टियां गुटबाजी, अंदरूनी राजनीति और बाहरी उम्मीदवारों को टिकट देने की अपनी पुरानी रणनीति पर काम कर रही हैं, लेकिन यह कदम अब स्थानीय जनता के लिए और भी ज्यादा निराशाजनक साबित हो सकता है। इस बार जनता की नजरें फिर से निर्दलीय उम्मीदवार पर हैं, जो स्थानीय मुद्दों पर काम कर चुका है और जनता के बीच एक विश्वसनीय चेहरा बन चुका है।

कांग्रेस की गुटबाजी: बाहरी प्रत्याशी की ओर मोड़ा रुख

खबरीलाल की माने तो कांग्रेस ने वार्ड 26 में अपनी चुनावी रणनीति के तहत एक बाहरी प्रत्याशी यादव जी (वार्ड 27 एसबीएस कॉलोनी निवासी) को टिकट देने का फैसला किया है। यह प्रत्याशी न तो वार्ड का निवासी है, न ही उसने कभी इस क्षेत्र में कोई काम किया है। कांग्रेस का यह कदम स्थानीय लोगों को साफ धोखा देने जैसा है, क्योंकि पार्टी ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बना दिया है, जिसका इस क्षेत्र से कोई संबंध नहीं है

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वार्ड के लोग खुलकर कह रहे हैं, “भाजपा-कांग्रेस दोनों ने हमारे साथ धोखा किया है। बाहरी व्यक्ति को प्रत्याशी बना दिया है, जबकि यहां के स्थानीय मुद्दों को कोई समझता ही नहीं।” कांग्रेस ने जनता के मुद्दों को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल अपनी राजनीति को ध्यान में रखा है, जो आने वाले चुनावों में पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है।

भाजपा का गुटबाज़ी में उलझा चुनावी खेल

भाजपा की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। यहां भी गुटबाज़ी और अंदरूनी राजनीति का खेल चल रहा है। स्थानीय नेतृत्व ने पीएम मोदी और संघ के उद्देश्य से परे जाकर भाजपा ने इस बार बाहरी उम्मीदवार को टिकट देने का फैसला किया है, और स्थानीय युवा नेताओं को दरकिनार कर दिया है। कुछ छुटभैय्ए नेताओं की हरकत से भाजपा और संघ दोनों के उद्देश्य को ही चलता कर दिया गया यह वही पार्टी है जो पिछले निकाय चुनाव में वार्ड 23 जो अब 26 हो गया है में तीसरे स्थान पर रही थी और जिसकी जमानत भी जब्त हो गई थी। फिर भी पार्टी अपने पुराने रास्ते पर चल रही है, बाहरी चेहरे (वार्ड 32 के रहवासी) को आगे बढ़ा रही है और स्थानीय मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर रही है।
इस बार भी पार्टी का चुनावी टिकट वितरण गुटबाज़ी और समीकरणों पर आधारित है, न कि जनता के विकास के मुद्दे पर। भाजपा की इस नीति से साफ है कि पार्टी को जनता के हितों से कोई फर्क नहीं पड़ता। बस सत्ता पाने की जल्दी है। जिस चेहरे पर दांव लगाया गया है वो क्षेत्र, क्षेत्रवासियों और उनकी समस्याओं से पूरी तरह अंजान है बावजूद अब तक के समीकरण में दबाव बना टिकट फाइनल कराया जा रहा है।

निर्दलीय उम्मीदवार: जनता के लिए असली विकल्प

जब भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां बाहरी चेहरों को बढ़ावा देती रहेंगी, तो जनता अपनी आवाज़ कहां सुनेगी? इस बार जनता की नजरें फिर से निर्दलीय उम्मीदवार पर होंगी। पिछले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ने क्षेत्र के विकास और जनता के मुद्दों पर ईमानदारी से काम किया था, माना जा रहा है कि लोग इस बार भी उसी को अपनी उम्मीदों का नेता मानेंगे।
निर्दलीय प्रत्याशी ने कभी भी अपनी जनता को अकेला महसूस नहीं होने दिया और हमेशा उनके लिए काम किया। यह वही उम्मीदवार है जिसने हमेशा जमीनी स्तर पर काम किया है और अपने कार्यकर्ताओं के साथ न केवल क्षेत्र के मुद्दों पर संघर्ष किया, बल्कि उसे हल करने की पूरी कोशिश भी की। यही कारण है कि वार्ड 26 की जनता इस बार फिर से निर्दलीय उम्मीदवार को ही अपना विश्वास देगी। पिछले बार महापौर के अप्रत्यक्ष चुनाव में यही कमी भाजपा को बहुमत से दूर रख दी थी और कम संख्या बल होने के बावजूद कांग्रेस ने भाजपा पार्षदों में सेंधमारी कर अपना महापौर बनाने में सफल हो गई थी, कहीं इस बार सभापति के चुनाव में यही स्थिति बन जाये तो आश्चर्य नहीं होगा।

भाजपा और कांग्रेस की राजनीति का खामियाजा

कांग्रेस और भाजपा दोनों की राजनीति अब पूरी तरह से न केवल जनता के लिए, बल्कि उनके लिए भी आत्मघाती साबित हो सकती है। इन दोनों पार्टियों ने चुनावी फायदे के लिए बाहर से उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि उनका क्षेत्रीय विकास पर कोई ध्यान नहीं है। अब जनता ने यह तय कर लिया है कि वह ऐसे नेताओं को खारिज करेगी जो चुनाव के समय ही उनसे जुड़ते हैं और बाकी समय उनका नाम तक नहीं लेता।
निर्दलीय प्रत्याशी की जीत अब एक संभावित सचाई बन चुकी है। भाजपा और कांग्रेस ने अगर अपनी गुटबाजी और बाहरी प्रत्याशियों की राजनीति को नहीं बदला, तो यह चुनाव वार्ड 26 में उनके लिए एक और हार साबित हो सकता है।

भविष्य की तस्वीर: निर्दलीय पार्षद ही जनता का सच्चा साथी

अगर कांग्रेस और भाजपा ने अपनी राजनीति में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह चुनाव केवल एक वार्ड का नहीं, बल्कि पूरे शहर का चुनाव साबित होगा। निर्दलीय उम्मीदवार ही इस बार जनता की उम्मीदों का केंद्र बनेंगे। दोनों पार्टियों ने गुटबाज़ी और बाहरी प्रत्याशियों को बढ़ावा दिया है, जो जल्द ही उनका आत्मघाती कदम साबित होगा।

जनता का संदेश साफ है: “हमें बाहरी चेहरों की नहीं, ऐसे नेताओं की जरूरत है जो हमारी समस्याओं को समझे और हमारे लिए काम करें। हम चुनावी चेहरा नहीं बल्कि वो जनप्रतिनिधि चुनना चाहते है जो हमारे सुख दुःख में साथ खड़ा रहे” अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और कांग्रेस अपनी गलतियों से सीखते हैं या निर्दलीय उम्मीदवार ही एक बार फिर से वार्ड 26 की राजनीति में अपनी जीत दर्ज करता है।

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