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पॉक्सो एक्ट में सजा के लिये शारीरिक संबंध का होना जरूरी नहीं, 18 वर्ष की सजा बरकरार रखी हाईकोर्ट ने

बिलासपुर, 30 मार्च। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पांच साल की बच्ची से यौनिक क्रूरता के मामले में सुनाई गई निचली अदालत की 18 साल की सजा को बरकरार रखते हुए कहा है कि पॉक्सो एक्ट में पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध का बनाया जाना जरूरी नहीं है।

दुर्ग के छावनी थाने में इस प्रकरण की रिपोर्ट 1 मार्च 2015 को दर्ज कराई गई थी। आरोपी रवि खुटियारा ने अपने पड़ोस में रहने वाली पांच साल की एक बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ एक सूनसान मकान में ले गया। उस समय बच्ची के माता-पिता ड्यूटी पर घर से बाहर चले गए थे। आरोपी ने बच्ची के कपड़े उतारकर उसके साथ क्रूरता बरती। उसके निजी अंगों में ऊंगलियां डाली, जिससे खून बह निकला। बच्ची किसी तरह घर वापस पहुंची और ड्यूटी से लौटने पर माता-पिता को पूरी घटना के बारे में बताया। माता-पिता ने छावनी थाने में एफआईआर दर्ज कराई और बच्ची को अस्पताल में दाखिल कर इलाज कराया गया।

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पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर दुर्ग की फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला पेश किया। कोर्ट ने 8 दिसंबर 2017 को आरोपी को आईपीसी की धारा 363, 366 तथा पॉक्सो एक्ट धारा 6 के तहत कुल 18 साल की सजा सुनाई।

सजा के खिलाफ आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में अपील की गई। उसकी ओर से कहा गया कि आरोपी ने दुष्कर्म नहीं किया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। जस्टिस दीपक कुमार तिवारी की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि सन् 2019 में किये गए संशोधन के अनुसार पॉक्सो एक्ट के तहत अधिकतम 20 वर्ष की सजा दी जा सकती है, जिसमें शारीरिक संबंध का बनाया जाना भी आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने आरोपी को दी गई सजा का पालन सुनिश्चित करने का आदेश संबंधितों को दिया है।

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