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गुणवत्ता पर बड़ा सवालः नीट में 10 फीसद अंक पाने वाले भी बनेंगे डेंटिस्ट

रायपुर। नीट 2019 का पेपर 900 अंक का था। इसके आधार पर मेडिकल कॉलेजों की एमबीबीएस की सीट तो भर गई, लेकिन निजी डेंटल कॉलेजों को बीडीएस सीट नहीं भर पा रही हैं। प्रदेश में 127 सीट लैप्स होने की कगार पर थीं तो निजी कॉलेजों ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाया। तीन राउंड काउंसिलिंग, उसके बाद दो मॉपअप राउंड हुआ और अब थर्ड मॉपअप राउंड करवाया जा रहा है। स्थिति यह है कि नीट में 10 फीसद अंक हासिल करने वाला भी डेंटिस्ट बनने जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर यह आम इंसान के स्वास्थ्य के साथ मजाक नहीं तो और क्या है?
14 सितंबर रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि थी, 26 ने रजिस्ट्रेशन करवाया। 15 सितंबर रात 12 बजे दाखिले की अंतिम तिथि, नतीजे सोमवार को आएंगे कि कितनी सीट भर पाईं और कितनी खाली रह गईं। लेकिन इतना तो तय है कि 26 सीट भरती हैं तो भी 101 सीट लैप्स होना तय है।
दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि 900 में 88 अंक वाले भी डेंटिस्ट बनेंगे। केंद्र के इस फैसले चिकित्सा विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। एक बड़ी बहस छिड़ गई है कि गुणवत्ता युक्त चिकित्सा की बात करने वाली सरकार आखिर ये क्यों कर रही है? काउंसिलिंग कमेटी के सदस्य एवं चिकित्सा शिक्षा संचालनालय में प्रवक्ता डॉ. जीतेंद्र तिवारी का कहना है कि डेंटिस्ट का स्कोप है, लेकिन अभ्यर्थी दाखिला क्यों नहीं लेना चाहते, इस पर अध्ययन की जरूरत है।
सरकारी कॉलेजों की सीट भरीं
प्रदेश के एकमात्र शासकीय डेंटल कॉलेज की 100 में से सभी 100 सीट भर गईं, जबकि पांच निजी कॉलेजों में 500 सीट हैं। इनमें से 50 फीसद मैनेजमेंट कोटा, 50 फीसद राज्य कोटा होता है। काउंसिलिंग संचालनालय की काउंसिलिंग कमेटी ही करवाती है। निजी कॉलेजों को कोई दखल नहीं होता है। वे सिर्फ दाखिला देते हैं, फीस भी फीस विनियामक आयोग ने तय कर दी है।
900 में 107 अंक वाले को भी आवंटित हुई थी सीट
सेकंड मॉपअप राउंड में नीट 2019 में 900 में से 107 अंक वाले को भी सीट आबंटित हुई थी। इस बार तो यह अंक अनारक्षित वर्ग के लिए 133 से 107 हैं तो आरक्षितों के लिए सिर्फ 88 ही। इससे साफ है कि डेंटल चिकित्सा खतरे में है। छात्रों की रुचि नहीं है। संचालनालय ने वेबसाइट पर एक सूचना यह भी जारी की है कि किसी बाहरी व्यक्ति, संस्था के झांसे में न आएं।
एक्सपर्ट व्यू-
सही है कि आज डेंटल एजुकेशन में कम ही लोग जाना चाहते हैं क्योंकि स्कोप नजर नहीं आता। काम ही नहीं है। इनका क्लीनिक आरएसबीवाइ और आयुष्मान योजना पर आधारित हो गया है। चिकित्सा शिक्षा में समझौते का सवाल ही नहीं उठता, क्या आप मरीज की जान से खिलवाड़ करवाना चाहते हैं। अब आप खुद सोचिए कि पहले पर्सेंटेज था, बाद में पर्सेंटाइल किया गया है। अब आप बता रहे हैं कि 88 अंक वाले को भी क्वालीफाइ किया गया है तो यह गलत है। मैरिट के आधार पर ही दाखिले मिलने चाहिए। – डॉ. महेश सिन्हा, शिक्षाविद् एवं सदस्य, आइएमए

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