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सीएजी की रिपोर्ट:29 करोड़ की योजना में 103 करोड़ बहाए, फिर भी खेत प्यासे, किसानों को नहीं मिला लाभ

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बलरामपुर-   बलरामपुर जिले की खुटपाली सिंचाई योजना को 2007 में 29 करोड़ रुपए की लागत से मंजूरी मिली थी। करीब दो दशक में इस पर 103 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन किसानों को पानी नहीं मिला।

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एनीकट में पानी की जगह रेत और मलबा भरा है। सूरजपुर जिले में रेहर नदी पर 27 करोड़ रुपए से बना डेडरी एनीकट महज तीन साल में ध्वस्त हो गया।

इससे 18 गांवों को पानी मिलना था। जशपुर की हल्दीमुड़ा योजना का हाल भी ऐसा ही है। वर्ष 1976 में 1.83 करोड़ रुपए की लागत से मंजूर इस योजना पर अब तक करीब 33 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन 50 साल बाद भी मुख्य नहर का करीब 10% काम अधूरा है।

ये तीन योजनाएं सरगुजा संभाग में सिंचाई परियोजनाओं की बदहाली की बानगी हैं।

 

संभाग के पांच जिलों में करीब 700 करोड़ रुपए की लागत वाली 76 सिंचाई योजनाओं पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की तीन साल की जांच में योजनाओं के निर्माण, लागत और गुणवत्ता से जुड़ी गड़बड़ियां सामने आई हैं। भास्कर ने सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर जमीनी पड़ताल की तो कई योजनाएं अधूरी और जर्जर मिलीं।

जांच में सामने आया कि कई योजनाओं की डीपीआर बनाते समय नदी-नालों में उपलब्ध पानी का सही आकलन ही नहीं किया गया। कहीं नहर के लिए जमीन अधिग्रहित नहीं हुई, फिर भी बांध और एनीकट बनाकर भुगतान कर दिया गया। कई योजनाओं में लागत बढ़ती गई, लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। नतीजा, करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंचा।

खुटपाली में नहर बारिश में ढही, मरम्मत पर 1.25 करोड़ और खर्च

बलरामपुर की खुटपाली योजना से 30 गांवों के खेतों की सिंचाई होनी थी। इसके लिए महराजगंज से झलपी तक 85 किमी लंबी नहर बनाने की योजना थी। लेकिन नहर पहली ही बारिश में ढह गई। जांच में 14 लाख रुपए के नुकसान का आकलन किया गया। इसके बाद मरम्मत के नाम पर 1.25 करोड़ रुपए और खर्च कर दिए गए।

योजना में एक जैसे कामों पर करीब 7 करोड़ रुपए खर्च करने का मामला भी सामने आया है। भास्कर की पड़ताल में एनीकट में पानी की जगह रेत और मलबा भरा मिला। गेट से पानी का रिसाव भी हो रहा है। करीब 103 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद 30 गांवों के किसानों को योजना का अपेक्षित लाभ नहीं मिला।

डेडरी: 27 करोड़ का एनीकट 3 साल में टूटा

सूरजपुर जिले में रेहर नदी पर 27 करोड़ रुपए की लागत से डेडरी एनीकट बनाया गया था। इससे 18 गांवों को पानी मिलना था, लेकिन निर्माण के महज तीन साल में ही एनीकट ध्वस्त हो गया। स्थानीय उपसरपंच यादव प्रसाद के मुताबिक, शुरुआत में कुछ दिन नलों से पानी आया। इसके बाद एनीकट टूट गया और आपूर्ति बंद हो गई। अब बची हुई मशीनों को भी उखाड़कर ले जाने की तैयारी है।

अफसरों के तर्क बनाम सीएजी की आपत्ति

अफसरों का तर्क

  • देरी और लागत बढ़ने पर: जमीन अधिग्रहण, वन विभाग की एनओसी और पुनर्वास में समय लगा।
  • बिना मंजूरी अतिरिक्त खर्च पर: निर्माण के दौरान कुछ नए और जरूरी काम सामने आए, इसलिए खर्च बढ़ा।
  • सिंचाई लक्ष्य अधूरा रहने पर: बांध और बैराज बन चुके हैं। नहरों से पानी दिया जा रहा है।

सीएजी की आपत्ति

  • टेंडर जारी करने से पहले जमीन और जरूरी मंजूरियां सुनिश्चित होनी चाहिए थीं। दशकों की देरी को केवल इन कारणों से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
  • लागत 10% से अधिक बढ़ने पर पुनरीक्षित मंजूरी जरूरी थी। इसके बिना अतिरिक्त भुगतान नियमों के खिलाफ है।
  • ढांचे बनने के बावजूद अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंचा। निर्माण को ही सिंचाई का लाभ नहीं माना जा सकता।

कार्रवाई पर सवाल:

डेडरी में दोषी अफसर निलंबित हुए, फिर बहाल होकर रिटायर; खुटपाली में कार्रवाई नहीं

डेडरी एनीकट मामले की जांच में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता जीपी पांडेय, एसडीओ एसके तिवारी और उप अभियंता एसके चतुर्वेदी दोषी पाए गए थे। उन्हें निलंबित किया गया, लेकिन बाद में बहाल हो गए और सेवानिवृत्त भी हो गए। इसी मामले से जुड़े तत्कालीन मुख्य अभियंता को एसीबी ने रिश्वत लेते पकड़ा था।

खुटपाली की विभागीय जांच में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता यूएस राम, एसडीओ एसके दुबे, उप अभियंता जेके साहू, आरसी जैन, एनसी सिंह तथा एसडीओ विनोद भगत और राजेंद्र भगत को जिम्मेदार बताया गया था। इसके बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

सीएजी ने 2020 से शुरू हुई तीन साल की जांच में सिंचाई योजनाओं के दस्तावेज और जमीनी स्थिति की पड़ताल की। रिपोर्ट में वित्तीय गड़बड़ियों के लिए जवाबदेही तय करने के सवाल उठाए गए।

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