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राज्यपाल की मंजूरी के बिना कार्रवाई नहीं: सेवानिवृत्त अभियंता रियाजुल बारी का आरोपपत्र हाईकोर्ट ने निरस्त किया

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वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक की दलीलें स्वीकार; कोर्ट ने कहा—नियम में संशोधन किए बिना मुख्यमंत्री की मंजूरी राज्यपाल की स्वीकृति का विकल्प नहीं बन सकती

 

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बिलासपुर। सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को भारी पड़ी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रियाजुल बारी के विरुद्ध 21 अप्रैल 2026 को जारी आरोपपत्र और उससे शुरू हुई विभागीय कार्यवाही निरस्त कर दी है। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने स्पष्ट किया कि पेंशन नियमों में निर्धारित राज्यपाल की मंजूरी की अनिवार्यता को केवल सरकारी परिपत्र अथवा मुख्यमंत्री की स्वीकृति के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक ने याचिकाकर्ता की ओर से इस कार्रवाई के कानूनी आधार को चुनौती दी। उनकी दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने 5 अक्टूबर 2026 को रिट याचिका WPS क्रमांक 6960/2026 स्वीकार कर ली।

अधिवक्ताओं ने उठाया निर्णायक सवाल—राज्यपाल की मंजूरी कहां है?

 

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी, अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक के साथ उपस्थित हुए। उन्होंने तर्क रखा कि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारी के खिलाफ नई विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9 की अनिवार्य शर्तों का पालन आवश्यक है।  नियम 9(2)(b)(i) के अनुसार, सेवा के दौरान शुरू नहीं हुई विभागीय कार्यवाही सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल की मंजूरी के बिना प्रारंभ नहीं की जा सकती। अधिवक्ताओं ने कहा कि इस मामले में आवश्यक मंजूरी प्राप्त नहीं की गई, इसलिए आरोपपत्र और उसके आधार पर शुरू कार्रवाई कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।  उन्होंने इस संबंध में हाईकोर्ट की खंडपीठ के रिट अपील क्रमांक 266/2025 के निर्णय तथा रिट याचिका क्रमांक 3981/2004 में पारित आदेश का भी हवाला दिया।

चार दशक की सेवा के बाद सेवानिवृत्ति, फिर जारी हुआ आरोपपत्र

आदेश में दर्ज विवरण के अनुसार, रियाजुल बारी ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग में चार दशक से अधिक सेवा देने के बाद 30 जून 2023 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उनकी सेवाएं छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में मुख्य अभियंता (निर्माण) के पद पर संविदा आधार पर ली गईं।  याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि सेवानिवृत्ति से पहले 22 मई 2023 को जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र में उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच या प्रतिकूल मामला लंबित नहीं होने की पुष्टि की गई थी।   इसके बावजूद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने 21 अप्रैल 2026 को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 14 के तहत आरोपपत्र जारी किया। यह आरोपपत्र उन्हें 9 मई 2026 को दिया गया। मामला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के रखरखाव के लिए निर्धारित निधियों में कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित था।

सरकार ने मुख्यमंत्री की मंजूरी का दिया आधार

राज्य शासन की ओर से तर्क दिया गया कि 2 मार्च 2017 के परिपत्र और 5 जुलाई 2014 की अधिसूचना के अनुसार समन्वय विभाग के माध्यम से मुख्यमंत्री की मंजूरी पर्याप्त है तथा अलग से राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक नहीं है। शासन ने बताया कि मुख्यमंत्री की मंजूरी 25 फरवरी 2026 को प्राप्त की गई थी।  लेकिन अदालत ने पाया कि इन दस्तावेजों से पेंशन नियम की मूल वैधानिक शर्त में संशोधन साबित नहीं होता। शासन ऐसा कोई संशोधन प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसमें नियम में प्रयुक्त “राज्यपाल” के स्थान पर “मुख्यमंत्री” किया गया हो।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश—कार्यकारी निर्देश वैधानिक नियम नहीं बदल सकते

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के मीरा साहनी बनाम उपराज्यपाल, दिल्ली, (2008) 9 SCC 177 के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून किसी कार्य को जिस तरीके से करने का प्रावधान करता है, उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए।  हाईकोर्ट ने माना कि कार्य आवंटन में बदलाव या कार्यकारी निर्देश, पेंशन नियम में स्पष्ट रूप से निर्धारित प्राधिकारी का स्थान नहीं ले सकते। इसलिए राज्यपाल की आवश्यक मंजूरी के बिना शुरू की गई विभागीय कार्यवाही कायम नहीं रखी जा सकती।

आरोपपत्र निरस्त, कानून के अनुसार कार्रवाई की स्वतंत्रता बरकरार

अदालत ने आरोपपत्र और उससे उत्पन्न विभागीय कार्यवाही निरस्त कर दी। साथ ही विभाग को पेंशन नियम, 1976 के नियम 9 की आवश्यकताओं का पालन करते हुए कानून के अनुसार आगे कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।  फैसला वित्तीय आरोपों की सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं है। राहत का आधार विभागीय कार्यवाही शुरू करने में अनिवार्य वैधानिक मंजूरी का अभाव है। इस मामले ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक स्वीकृति कितने भी ऊंचे स्तर से मिले, कार्रवाई को कानून की निर्धारित प्रक्रिया पर खरा उतरना होगा।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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