शिक्षा विभाग में भर्राशाही उजागर होने से पहले प्रेसवार्ता स्थगित….!

बीआरसी और शिक्षक संघ पदाधिकारियों के बीच खन्दक की लड़ाई में गॉडफादर कौन…?
कोरबा। शिक्षकों की बीएड डिग्री, कथित कूटरचना और फर्जी प्रमाण पत्र से जुड़ा मामला गुरुवार को उस समय और रहस्यमय हो गया, जब इस मामले को लेकर विवाद के बाद थाना की चौखट पार कर चुके दोनों पक्षों की आहूत प्रेस वार्ता अचानक स्थगित कर दी गईं।
बताया जा रहा है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी प्रेस वार्ता में एक-दूसरे से जुड़े गंभीर सवालों पर अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट करने और उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर जानकारी सामने लाने वाले थे।
सुबह 11:30 बजे प्रेस क्लब तिलक भवन, टीपी नगर में छत्तीसगढ़ प्रदेश संयुक्त शिक्षक संघ के कार्यकारी प्रांताध्यक्ष ओमप्रकाश बघेल, बिलासपुर संभागीय अध्यक्ष मोहन लहरी, कोरबा जिलाध्यक्ष नित्यानंद यादव एवं संभागीय पदाधिकारी बलजीत कांत की ओर से प्रेस वार्ता आयोजित की गई थी। इसमें कूटरचना एवं फर्जी प्रमाण पत्र के माध्यम से डिग्री हासिल करने वाले शिक्षकों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग को लेकर जानकारी देने की बात कही गई थी।
इसके ठीक एक घंटे बाद दोपहर 12:30 बजे छत्तीसगढ़ तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष (बीआरसी) अनिल रात्रे तथा शिक्षक कल्याण संघ के जिलाध्यक्ष एवं संरक्षक मुकुंद केशव उपाध्याय की ओर से प्रेस वार्ता रखी गई थी। इस प्रेस वार्ता का विषय व्यक्तिगत दुर्भावना से बीएड डिग्री को लेकर की गई कथित झूठी शिकायत, विभागीय जांच की वस्तुस्थिति और मामले की सत्यता उजागर करने के लिए उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग था।
यानी एक ओर कथित फर्जी प्रमाण पत्र और कूटरचना के जरिए बीएड डिग्री हासिल करने का मामला उठाया जाना था, तो दूसरी ओर इसी प्रकरण में की गई शिकायत को दुर्भावनापूर्ण और झूठा बताते हुए विभागीय जांच की वास्तविक स्थिति सामने रखने की तैयारी थी। इससे साफ है कि दोनों पक्षों के पास अपने-अपने दावे और दस्तावेज होने का संकेत मिल रहा था।
लेकिन अचानक दोनों प्रेस वार्ताएं स्थगित कर देना कई सवालों का जनक बन गया है।
इस घटनाक्रम ने मामले को लेकर कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं—
क्या दोनों पक्षों के बीच कोई नया घटनाक्रम सामने आया?
क्या संबंधित विभाग या उच्च अधिकारियों की ओर से जांच को लेकर कोई पहल हुई?
क्या किसी दस्तावेज अथवा तथ्य के सामने आने के बाद प्रेस वार्ता टालने का निर्णय लिया गया?
या फिर दोनों पक्ष बाद में एक साथ अथवा अलग-अलग तरीके से अपना पक्ष रखने की तैयारी कर रहे हैं?
फिलहाल, बीएड डिग्री और प्रमाण पत्र से जुड़ा यह विवाद अब केवल संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। एक पक्ष जहां कथित कूटरचना और फर्जी प्रमाण पत्र की जांच की मांग कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष शिकायत को ही दुर्भावनापूर्ण और झूठा बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।
ऐसे में सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर बीएड डिग्री और प्रमाण पत्रों से जुड़े वास्तविक तथ्य क्या हैं? क्या वास्तव में किसी शिक्षक ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर डिग्री हासिल की है या फिर किसी वैध डिग्री को लेकर गलत शिकायत की गई है?
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