कुसमुंडा पेट्रोल पंप पर SECL की रहस्यमयी चुप्पी—क्या पीछे खड़ा है ‘कोयला साम्राज्य’ का दबाव?

अशोक तीवरता समूह के कथित नियंत्रण में पंप संचालन की चर्चा—गेवरा, दीपका और कुसमुंडा के बड़े कोयला कारोबार से क्या जुड़ा है ₹2.5 करोड़ का सौदा?
SECL ने जमीन खाली करने का पत्र तो दिया, लेकिन IOCL से पेट्रोल आपूर्ति रुकवाने के लिए क्या किया? GM–CGM जवाब दें—कार्रवाई फाइलों में दफन क्यों हुई?
कोरबा/कुसमुंडा। कुसमुंडा स्थित M/s Korba Service Station की कहानी अब केवल एक पेट्रोल पंप, पुरानी लीज या किराए के विवाद तक सीमित नहीं रही। इस मामले की परतें खुलीं तो इनके तार SECL की जमीन, कथित ₹2.5 करोड़ के निजी सौदे, विवादित “99 वर्ष” की लीज, IOCL डीलरशिप, PESO लाइसेंस और गेवरा–दीपका–कुसमुंडा में फैले बड़े कोयला कारोबार तक जाते दिखाई दे रहे हैं।
सबसे विस्फोटक सवाल यह है कि क्या इस पेट्रोल पंप का वास्तविक संचालन अथवा आर्थिक नियंत्रण अब कथित रूप से कोयला कारोबारी अशोक तीवरता या तीवरता समूह से जुड़े व्यक्तियों के हाथों में है?
यदि यह सूचना गलत है तो IOCL, SECL और वर्तमान संचालक दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करें। लेकिन यदि पंप का वास्तविक नियंत्रण बदल चुका है, तो यह परिवर्तन कब, किसके आदेश से और किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ?
और यदि किसी निजी पक्ष ने लगभग ₹2.5 करोड़ देकर इस व्यवसाय का नियंत्रण लिया, तो उसने आखिर खरीदा क्या—डीलरशिप, मशीनें, व्यावसायिक नियंत्रण या SECL की उस जमीन पर अधिकार, जिसे बेचने का किसी निजी व्यक्ति को अधिकार ही नहीं था?
क्या कोयले की ताकत के सामने खामोश हो गया SECL?
अशोक तीवरता और उससे जुड़े व्यावसायिक समूह का नाम गेवरा, दीपका तथा कुसमुंडा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कोयला परिवहन, कोल वाशरी, कोल यार्ड और अन्य गतिविधियों से जोड़ा जाता रहा है। क्षेत्र में यह चर्चा पुरानी है कि समूह का खदान क्षेत्र में प्रभाव इतना व्यापक है कि कोयला परिवहन और कारोबार से जुड़े अनेक निर्णयों पर उसकी मजबूत पकड़ है। “इसके इशारे पर खदानें चलती हैं” जैसे आरोप अत्यंत गंभीर हैं और इन्हें बिना जांच अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। मगर इन्हीं आरोपों के बीच SECL की जमीन पर चल रहे विवादित पेट्रोल पंप को लेकर अधिकारियों की असाधारण चुप्पी सवालों को और गहरा करती है।
क्या यही कथित व्यावसायिक प्रभाव कारण है कि SECL के GM–CGM जमीन खाली कराने का पत्र जारी करने के बाद निर्णायक कार्रवाई से पीछे हट गए?
क्या किसी प्रभावशाली कोयला कारोबारी के हित जुड़ने के बाद कब्जा वापसी की फाइल ठंडी कर दी गई?
क्या SECL अधिकारियों और कथित वर्तमान संचालक के बीच कोई लिखित या मौखिक समझ बनी?
क्या जमीन खाली कराने की कार्रवाई केवल कागजी दिखावा थी, जबकि पर्दे के पीछे कारोबार निर्बाध चलने देने की व्यवस्था कर दी गई?
यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ तो SECL प्रबंधन को अपनी निष्क्रियता की साफ और दस्तावेजी वजह बतानी चाहिए।
लीज नहीं, कब्जा वापस मांगा—फिर किसकी अनुमति से पेट्रोल बिक्री जारी?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार SECL ने 3 सितंबर 2024 को नई व्यवस्था स्वीकार करने के बजाय जमीन और भवन खाली कर कब्जा सौंपने का निर्देश दिया था। इसके बाद 27 जनवरी 2025 के पत्र में भी कब्जा नहीं मिलने की स्थिति दर्ज की गई। इसके बावजूद पेट्रोल का भंडारण, आपूर्ति और बिक्री जारी रही।
इसलिए सवाल केवल पंप संचालक से नहीं, SECL के GM, CGM, संपदा विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों से भी है—
«जमीन वापस चाहिए थी तो IOCL को आपूर्ति बंद करने के लिए निर्णायक पत्र क्यों नहीं भेजा गया?
यदि पत्र भेजे गए तो उनकी प्रतियां कहां हैं?
यदि पत्र नहीं भेजे गए तो किसे लाभ पहुंचाने के लिए SECL चुप रहा?»
SECL को बताना चाहिए कि उसने:
– IOCL को लीज समाप्त होने की सूचना कब दी;
– पेट्रोलियम आपूर्ति रोकने के लिए कितने पत्र भेजे;
– PESO को “right to site” के विवाद की जानकारी दी या नहीं;
– जिला दंडाधिकारी से NOC की समीक्षा मांगी या नहीं;
– Public Premises Act के तहत Estate Officer के सामने क्या कार्रवाई की;
– कब्जा वापस लेने के लिए हाईकोर्ट में बाद की तारीखों पर क्या पक्ष रखा।
यदि SECL ने जमीन खाली कराने का पत्र देकर उसके बाद हाथ पर हाथ रख लिया, तो यह सामान्य लापरवाही नहीं बल्कि जवाबदेही से संदिग्ध पलायन माना जाएगा।
GM–CGM की चुप्पी—लापरवाही, दबाव या कोई बड़ी डील?
SECL कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की महारत्न कंपनी है। उसकी जमीन जनता की संपत्ति है। उस जमीन पर चल रहे पेट्रोल पंप की लीज समाप्त हो चुकी हो, नई लीज से इनकार किया गया हो और कब्जा वापस मांगा गया हो—फिर भी कारोबार चलता रहे—तो संबंधित GM और CGM केवल यह कहकर बच नहीं सकते कि मामला अदालत में है।
उन्हें जवाब देना होगा:
1. कब्जा वापसी की कार्रवाई किस अधिकारी को सौंपी गई?
2. कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है?
3. IOCL से कितनी बार पत्राचार हुआ?
4. PESO और कलेक्टर को क्या सूचना दी गई?
5. वर्तमान संचालक से SECL ने कौन-से दस्तावेज मांगे?
6. कथित नियंत्रण परिवर्तन की जानकारी SECL को कब मिली?
7. क्या किसी अधिकारी ने कार्रवाई रोकने या धीमी करने का मौखिक निर्देश दिया?
8. क्या इस मामले से जुड़े किसी व्यक्ति या समूह का SECL के कोयला कारोबार में बड़ा व्यावसायिक हित है?
यदि रिकॉर्ड में कार्रवाई नहीं मिलती तो जांच एजेंसियों को यह भी देखना चाहिए कि कहीं अधिकारियों की खामोशी किसी प्रभाव, अनुचित लाभ या पर्दे के पीछे हुई कथित डील का परिणाम तो नहीं थी।
देवजानी मजुमदार से अशोक तीवरता तक—किसके हाथ में वास्तविक नियंत्रण?
पंप का संबंध पूर्व प्रोपराइटर अथवा संचालक के रूप में देवजानी मजुमदार के नाम से बताया गया है। दूसरी ओर, शिकायत में लगभग ₹2.5 करोड़ के कथित सौदे और किसी अन्य व्यक्ति अथवा समूह द्वारा संचालन संभाले जाने की सूचना दी गई है।
अब जांच का केंद्र केवल कागज पर लिखा नाम नहीं, बल्कि वास्तविक नियंत्रण होना चाहिए:
– पेट्रोल और डीजल का दैनिक हिसाब कौन रखता है?
– कर्मचारियों को वेतन कौन देता है?
– बिक्री की रकम किस बैंक खाते में जाती है?
– IOCL से पत्राचार कौन करता है?
– पंप के लाभ का वास्तविक प्राप्तकर्ता कौन है?
– GST, बिजली, बैंक, बीमा और लाइसेंस किस नाम पर हैं?
– देवजानी मजुमदार की वर्तमान भूमिका क्या है?
– अशोक तीवरता अथवा समूह से जुड़े किसी व्यक्ति ने धन लगाया या नियंत्रण लिया है?
– IOCL ने किसी reconstitution अथवा dealership transfer को मंजूरी दी है?
– क्या SECL से पूर्व अनुमति ली गई?
यदि दस्तावेजों में एक नाम और जमीन पर वास्तविक संचालन किसी दूसरे व्यक्ति का मिले, तो यह केवल कंपनी की आंतरिक व्यवस्था नहीं बल्कि पेट्रोलियम सुरक्षा और लाइसेंसिंग से जुड़ा गंभीर उल्लंघन हो सकता है।
₹2.5 करोड़ में क्या खरीदा—कारोबार या SECL की जमीन पर बैठा विवाद?
कथित ₹2.5 करोड़ के लेन-देन की सच्चाई वित्तीय जांच से सामने आनी चाहिए। जांच एजेंसी को पता लगाना होगा कि कथित सौदे का विषय क्या था:
– IOCL डीलरशिप;
– पेट्रोल पंप का संचालन;
– मशीनें और भूमिगत टैंक;
– भवन और व्यावसायिक परिसंपत्तियां;
– गुडविल;
– अथवा SECL की जमीन पर कथित अधिकार।
यदि सार्वजनिक क्षेत्र की जमीन या उस पर बने ढांचे को निजी रूप से हस्तांतरण योग्य संपत्ति बताकर सौदा किया गया, तो मामला महज संविदात्मक विवाद नहीं रहेगा। बैंक खातों, MoU, पावर ऑफ अटॉर्नी, डिजिटल संदेश, IOCL की reconstitution file, आयकर और GST रिकॉर्ड से पूरे धन-प्रवाह की जांच आवश्यक है।
तीन वर्ष की लीज पर ‘99 वर्ष’ की जादुई स्याही किसकी?
SECL के रिकॉर्ड में मूल व्यवस्था को तीन वर्ष का बताया गया, जबकि सामने आई कथित प्रति में “99 वर्ष” दर्ज होने की बात कही जा रही है।
क्या यह मूल दस्तावेज का हिस्सा है या बाद में जोड़ी गई कोई प्रविष्टि?
इसका जवाब फोटो कॉपी नहीं, बल्कि FSL जांच देगी। वर्ष 1991 का मूल अनुबंध SECL से सुरक्षित कर IOCL, PESO, बैंक, जिला प्रशासन और हाईकोर्ट में प्रस्तुत प्रत्येक प्रति से मिलान कराया जाना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि “99 वर्ष” वाली प्रति किसने तैयार, प्रमाणित और इस्तेमाल की।
यदि किसी जाली अथवा परिवर्तित दस्तावेज के आधार पर लाइसेंस, NOC, न्यायिक राहत या कारोबार जारी रखने का लाभ लिया गया, तो जिम्मेदारी केवल दस्तावेज जमा करने वाले व्यक्ति की नहीं होगी; उसे जानते हुए स्वीकार करने या दबाने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आएगी।
हाईकोर्ट की सीमित रोक को ‘पेट्रोल बेचने का लाइसेंस’ किसने बनाया?
25 मार्च 2025 के उपलब्ध आदेश में SECL के 03 सितंबर 2024 के पत्र के प्रभाव और क्रियान्वयन पर अगली तारीख तक अंतरिम रोक दिखाई देती है।
इस आदेश ने:
– नई लीज जारी नहीं की;
– जमीन पर स्थायी अधिकार घोषित नहीं किया;
– PESO लाइसेंस नवीनीकृत नहीं किया;
– District Authority NOC को वैध घोषित नहीं किया;
– किसी नए संचालक को डीलरशिप नहीं दी;
– पेट्रोलियम कानूनों की स्वतंत्र जांच पर रोक नहीं लगाई।
फिर अंतरिम आदेश को स्थायी संचालन कवच किसने बनाया?
क्या बाद की सुनवाई में रोक बढ़ी? क्या आज भी कोई प्रभावी न्यायिक संरक्षण मौजूद है? प्रशासन को नवीनतम प्रमाणित आदेश प्राप्त कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
«बेदखली पर अंतरिम रोक और पेट्रोल बेचने का वैधानिक अधिकार दो अलग बातें हैं। दोनों को मिलाकर जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।»
यह पंप है, पर कहानी कोयले की काली सुरंग तक जाती है. यह प्रकरण केवल पेट्रोल की कुछ मशीनों या जमीन के एक टुकड़े तक बंद होने वाला नहीं है। यदि कथित खरीदार या वास्तविक संचालक का कारोबार गेवरा, दीपका और कुसमुंडा की खदानों, कोयला परिवहन, वाशरी तथा यार्ड तक फैला है, तो जांच का दायरा भी उतना ही व्यापक होना चाहिए।
जांच एजेंसियों को देखना होगा:
– संबंधित समूह को SECL से कौन-कौन से कार्य, परिवहन या व्यावसायिक लाभ मिले;
– किस अधिकारी के कार्यकाल में मिले;
– पंप विवाद शुरू होने के बाद उन व्यावसायिक संबंधों में क्या परिवर्तन आया;
– SECL अधिकारियों और संबंधित कारोबारियों के बीच बैठकों, पत्राचार और भुगतान का कोई संबंध है या नहीं;
– किसी अधिकारी या उसके निकट संबंधी को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष लाभ मिला या नहीं;
– पंप पर कार्रवाई रोकने के बदले किसी प्रकार का व्यावसायिक लाभ दिया गया या नहीं।
कहानी पेट्रोल पंप के कैनोपी के नीचे शुरू जरूर हुई है, लेकिन इसकी परछाईं कोयला खदानों, वाशरी, यार्ड, परिवहन ठेकों और SECL के बंद कमरों तक जाती दिखाई दे रही है।
दस्तावेज दिखाओ—वरना आपूर्ति रोको
वर्तमान संचालक को तत्काल निम्न मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने चाहिए:
– वैध और वर्तमान लीज;
– SECL की नवीनतम सहमति;
– District Authority NOC;
– PESO/Form XIV लाइसेंस;
– IOCL dealership तथा reconstitution approval;
– Fire NOC;
– tank-integrity certificate;
– electrical-safety certificate;
– public-liability insurance;
– वर्तमान प्रभावी न्यायालयीन आदेश।
यदि वैध “right to site”, NOC और PESO लाइसेंस प्रस्तुत नहीं होते, तो सक्षम अधिकारियों को किसी प्रभावी न्यायिक आदेश का पालन करते हुए आपूर्ति और बिक्री पर रोक लगाने की कार्रवाई करनी चाहिए। परिसर में पेट्रोलियम स्टॉक होने के कारण सीलिंग अथवा बंदी केवल PESO, IOCL और अग्निशमन विभाग की तकनीकी निगरानी में हो।
ग्राम यात्रा के जहरीले नहीं—जवाब मांगते सीधे सवाल
– क्या अशोक तीवरता अथवा उससे जुड़े समूह के व्यक्ति कुसमुंडा पेट्रोल पंप का वास्तविक संचालन कर रहे हैं?
– कथित ₹2.5 करोड़ किसने दिया और किसने लिया?
– सौदे में कौन-सी संपत्ति या अधिकार बेचा गया?
– क्या संबंधित समूह का कोयला कारोबार SECL अधिकारियों की कार्रवाई पर प्रभाव डालता है?
– GM–CGM ने कब्जा वापसी के पत्र के बाद निर्णायक कदम क्यों नहीं उठाए?
– IOCL को आपूर्ति रोकने के लिए कितने पत्र भेजे गए?
– “99 वर्ष” वाली लीज किसने और कहां प्रस्तुत की?
– हाईकोर्ट की सीमित रोक को स्थायी संचालन-अधिकार की तरह किसने इस्तेमाल किया?
– दस्तावेज वैध हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में डर कैसा?
– यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो संयुक्त जांच से परहेज क्यों?
अंतिम बात
यह रिपोर्ट अशोक तीवरता, तीवरता समूह, देवजानी मजुमदार, SECL अधिकारियों अथवा किसी अन्य व्यक्ति को जांच से पहले दोषी घोषित नहीं करती। लेकिन गंभीर आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों के बाद मौन रहने वाले अधिकारी भी अब सवालों से बाहर नहीं हैं।
«SECL की जमीन कोई निजी जागीर नहीं।
अंतरिम रोक कोई स्थायी लीज नहीं।
IOCL की आपूर्ति जमीन का मालिकाना अधिकार नहीं।
और कोयले का प्रभाव कानून से बड़ा नहीं हो सकता।»
यदि दस्तावेज वैध हैं तो सामने रखिए।
यदि सौदा वैध है तो भुगतान का रिकॉर्ड दिखाइए।
यदि संचालन वैध है तो वर्तमान लाइसेंस बताइए।
और यदि सब कुछ पर्दे के पीछे चल रहा है, तो याद रखिए—
कहानी यहां बंद नहीं होगी। इसकी जांच पेट्रोल पंप से निकलकर कोयले की काली सुरंगों, कारोबारी खातों और SECL के जिम्मेदार अधिकारियों की मेज तक जाएगी।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क संबंधित सभी पक्षों—SECL, IOCL, PESO, देवजानी मजुमदार, अशोक तीवरता, तीवरता समूह तथा वर्तमान संचालक—का दस्तावेज-समर्थित पक्ष प्रमुखता से प्रकाशित करने को तैयार है। क्रमशः—कथित ₹2.5 करोड़ का धन-मार्ग, IOCL reconstitution, SECL–IOCL पत्राचार और कोयला कारोबार से जुड़े संबंधों पर जल्द बड़ा दस्तावेजी खुलासा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
Live Cricket Info



