विधानसभा में मंत्री का आश्वासन भी फाइलों में कैद! छह महीने बाद फिर खुली स्वास्थ्य विभाग के ‘संलग्नीकरण खेल’ की परत

तीन दिन में अटैचमेंट समाप्त करने का था आदेश, छह महीने तक नहीं पहुंचा अनुपालन प्रमाण-पत्र; संचालनालय ने फिर दिया तीन दिन का अल्टीमेटम
मूल संस्था में पद, दूसरी जगह कुर्सी—अब नाम, पदनाम, दोनों पदस्थापनाएं और अटैचमेंट बचाने का कारण भी देना होगा
रायपुर/कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से जड़ जमा चुके कथित “संलग्नीकरण तंत्र” पर संचालनालय स्वास्थ्य सेवायें का ताजा पत्र गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। विधानसभा के भीतर मंत्री का आश्वासन, संचालनालय का लिखित आदेश और तीन दिन की स्पष्ट समय-सीमा—इसके बावजूद लगभग छह महीने तक अपेक्षित अनुपालन रिपोर्ट संचालनालय नहीं पहुंची।
अब विभाग ने दोबारा पत्र जारी कर अधिकारियों से पूछा है कि आदेश का पालन हुआ या शासन का निर्देश भी फाइलों के अंधेरे में दबा दिया गया?
संचालनालय स्वास्थ्य सेवायें, छत्तीसगढ़ द्वारा 22 सितंबर 2026 को जारी समय-सीमा पत्र में स्पष्ट लिखा गया है कि फरवरी–मार्च 2026 के विधानसभा सत्र में लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन क्रमांक 371 के पालन में प्रदेश की स्वास्थ्य संस्थाओं में कार्यरत संलग्न अधिकारियों और कर्मचारियों का संलग्नीकरण समाप्त करने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन दस्तावेज बताता है कि छह महीने बाद भी संचालनालय को वांछित जानकारी नहीं मिली। सवाल सीधा है—आखिर किसकी कुर्सी इतनी ताकतवर है कि विधानसभा में दिया गया मंत्री का आश्वासन और संचालनालय का लिखित आदेश भी उसके सामने बेअसर हो गया?
12 मार्च को आदेश, 22 सितंबर तक रिपोर्ट नदारद!
संचालनालय ने 12 मार्च 2026 को पत्र क्रमांक संचा./पी.ए./2026/30-31 जारी कर प्रदेश के समस्त संभागीय संयुक्त संचालकों, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों तथा सिविल सर्जन-सह-मुख्य अस्पताल अधीक्षकों को निर्देशित किया था कि मूल पदस्थ संस्था छोड़कर दूसरी स्वास्थ्य संस्था में संलग्न अधिकारियों एवं कर्मचारियों का संलग्नीकरण तीन दिनों के भीतर समाप्त किया जाए।
कार्रवाई पूरी करने के बाद संबंधित अधिकारियों को अनुपालन का प्रमाण-पत्र संचालनालय में अनिवार्य रूप से जमा करना था। लेकिन 22 सितंबर 2026 के नवीन पत्र में संचालनालय ने स्वयं दर्ज किया है कि—
«“वांछित जानकारी आज दिनांक तक अप्राप्त है।”»
यानी तीन दिन में जिस कार्रवाई का प्रमाण-पत्र पहुंचना था, उसका जवाब लगभग छह महीने बाद भी संचालनालय तलाशता रहा। यह केवल पत्राचार में देरी नहीं, बल्कि विधानसभा में दिए गए आश्वासन और शासन की प्रशासनिक गंभीरता पर लगा बड़ा प्रश्नचिह्न है।
क्या ‘चहेतों’ की कुर्सी बचाने के लिए दबा दी गई अनुपालन रिपोर्ट?
प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे में संलग्नीकरण केवल एक प्रशासनिक शब्द नहीं है। इसके पीछे मूल संस्था में रिक्त पड़ी कुर्सियां, प्रभावित चिकित्सा व्यवस्था और दूरस्थ क्षेत्रों के मरीजों की परेशानी भी छिपी हो सकती है। कर्मचारी का वेतन और पद एक संस्था में, जबकि सेवा दूसरी जगह—ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा नुकसान उस जनता का होता है जिसके नाम पर पद स्वीकृत किया गया था।
यदि मार्च में आदेश के अनुसार सभी संलग्नीकरण समाप्त कर दिए गए थे, तो छह महीने तक प्रमाण-पत्र क्यों नहीं भेजा गया?
और यदि संलग्नीकरण समाप्त नहीं हुए, तो किन अधिकारियों ने आदेश का पालन नहीं किया?
क्या कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और कर्मचारियों को मनचाही जगह पर बनाए रखने के लिए निर्देशों की धार कुंद कर दी गई?
इन प्रश्नों का उत्तर अब दस्तावेजों से सामने आना चाहिए। अब छिपाना कठिन—नाम से कारण तक मांगा गया नवीन आदेश के साथ संचालनालय ने निर्धारित प्रारूप भी जारी किया है। संबंधित संस्था प्रमुखों को अब प्रत्येक संलग्न अधिकारी और कर्मचारी के संबंध में बताना होगा—
– अधिकारी या कर्मचारी का नाम;
– पदनाम;
– मूल पदस्थापना स्थल;
– वर्तमान संलग्न पदस्थापना स्थल;
– किस तारीख से संलग्न है;
– संलग्नीकरण समाप्त करने की तारीख;
– और यदि समाप्त नहीं किया गया तो उसका कारण।
इस जानकारी पर संस्था प्रमुख के हस्ताक्षर और पदमुद्रा भी अनिवार्य की गई है। अर्थात अब मामला केवल मौखिक दावे या स्थानीय व्यवस्था का नहीं रहेगा; प्रत्येक जारी संलग्नीकरण की जवाबदेही लिखित रिकॉर्ड में तय करनी होगी।
नया अल्टीमेटम—तीन दिन में प्रमाण-पत्र सहित रिपोर्ट
उप संचालक (विधानसभा) धर्मेन्द्र कुमार गहवई के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी पत्र में प्रकरण की गंभीरता का उल्लेख करते हुए प्रमाण-पत्र सहित जानकारी तीन दिन के भीतर अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने को कहा गया है। पत्र 22 सितंबर 2026 का है। सामान्य गणना में यह समय-सीमा 25 सितंबर के आसपास पूरी होती है। अब निगाह इस बात पर होगी कि इस बार भी आदेश केवल सरकारी फाइलों में घूमता रहेगा या प्रदेशभर से नामवार जानकारी वास्तव में संचालनालय तक पहुंचेगी।
जांच केवल सूची तक सीमित न रहे
यदि सरकार वास्तव में संलग्नीकरण समाप्त करने को लेकर गंभीर है, तो केवल संस्था प्रमुखों से प्रमाण-पत्र लेना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित कर्मचारियों के—
– मूल पदस्थापना आदेश;
– संलग्नीकरण आदेश;
– वेतन आहरण रिकॉर्ड;
– उपस्थिति पंजी;
– ड्यूटी रोस्टर;
– मानव संसाधन पोर्टल की प्रविष्टियां;
– स्थानांतरण एवं कार्यमुक्ति आदेश का आपस में मिलान आवश्यक है।
कागज पर संलग्नीकरण समाप्त दिखाकर व्यक्ति को उसी स्थान पर मौखिक व्यवस्था से बनाए रखने की आशंका को भी जांच के दायरे में लिया जाना चाहिए। गलत या अधूरी जानकारी देने वालों की जवाबदेही भी निर्धारित होनी चाहिए।
मेडिकल कॉलेजों के मामले में अलग प्रशासनिक स्थिति
यह आदेश संचालनालय स्वास्थ्य सेवायें के अधीन स्वास्थ्य संस्थाओं के लिए जारी हुआ है। शासकीय मेडिकल कॉलेज सामान्यतः चिकित्सा शिक्षा विभाग के नियंत्रण में आते हैं। इसलिए मेडिकल कॉलेज में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी पर इसे स्वतः लागू मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कोई कर्मचारी मूलतः स्वास्थ्य विभाग, जिला अस्पताल, CMHO अथवा सिविल सर्जन के अधीन पदस्थ है और उसे मेडिकल कॉलेज अथवा किसी अन्य संस्था में संलग्न किया गया है, तो उसके मूल पदस्थापना एवं संलग्नीकरण रिकॉर्ड की जांच इस आदेश के संदर्भ में आवश्यक हो सकती है।
विधानसभा के आश्वासन की प्रतिष्ठा भी दांव पर
यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों की मनचाही पदस्थापना का नहीं है। सवाल विधानसभा के भीतर दिए गए मंत्री के आश्वासन की विश्वसनीयता का है। यदि सदन में घोषणा के बाद जारी आदेश की अनुपालन रिपोर्ट भी छह महीने तक नहीं पहुंचती, तो यह प्रशासनिक ढांचे की सुस्ती है, आदेश की अवहेलना है या प्रभावशाली संलग्न कर्मचारियों को बचाने का सुनियोजित मौन—सरकार को स्पष्ट करना होगा।
अब जरूरी है कि संचालनालय जिलेवार सूची सार्वजनिक करे और बताए—
1. मार्च 2026 में कुल कितने अधिकारी-कर्मचारी संलग्न थे?
2. कितनों का संलग्नीकरण समाप्त किया गया?
3. कितने लोग अब भी दूसरी संस्थाओं में जमे हुए हैं?
4. किन अधिकारियों ने निर्धारित समय में प्रमाण-पत्र नहीं भेजा?
5. आदेश की अवहेलना पर क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित है?
6. क्या मूल संस्थाओं में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं?
7. संलग्नीकरण जारी रखने के लिए किस सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति ली गई?
ग्राम यात्रा का सीधा सवाल
जब आदेश तीन दिन का था, तो अनुपालन पूछने में छह महीने क्यों लगे?
क्या स्वास्थ्य विभाग में शासन के आदेश से बड़ी कोई अदृश्य व्यवस्था काम कर रही है?
क्या कुछ ‘चहेती कुर्सियों’ को बचाने के लिए विधानसभा के आश्वासन को भी प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया?
अब केवल एक और पत्र नहीं, बल्कि नामवार खुलासा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई ही इस सवाल का उत्तर दे सकती है।
नोट: यह समाचार संचालनालय स्वास्थ्य सेवायें द्वारा जारी 12 मार्च 2026 और 22 सितंबर 2026 के उपलब्ध आधिकारिक पत्रों पर आधारित है। किसी अधिकारी या कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से दोषी घोषित नहीं किया गया है। संबंधित विभाग अथवा प्रभावित पक्ष का तथ्यात्मक उत्तर प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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