नगर निगम कोरबा का “सभागार टेंडर-तंत्र

सत्ता की कुर्सी बदली, सभागार की कुर्सियाँ बदलीं—लेकिन करोड़ों के ठेकों में उमेश राठौर का नाम फिर क्यों चमका?
2022 के ₹2.39 करोड़ के कार्य और 2025 की ₹43.95 लाख की लैंडस्केपिंग में उमेश राठौर L-1; अब ₹1.60 करोड़ के फर्नीचर–साउंड टेंडर की बंद मुट्ठी कब खुलेगी?
सभागार के नाम पर बिल और कथित रूप से अधिकारी के निजी मकान में माल? ₹7 लाख से अधिक के आरोप की बिल, MB, चालान और स्टॉक रजिस्टर से हो निष्पक्ष जाँच
पुराने सागौन की कुर्सियाँ कहाँ गईं? नया फर्नीचर कहाँ लगा? सरकार बदली, लेकिन निगम के “टेंडर देवता” का आशीर्वाद किसके सिर बना रहा?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क नगर निगम कोरबा का जवाहरलाल नेहरू सभागार अब केवल कार्यक्रमों का मंच नहीं, बल्कि करोड़ों के टेंडरों की ऐसी अंतहीन पटकथा दिखाई देता है जिसमें दृश्य बदलते हैं, सरकार बदलती है, कुर्सियाँ बदलती हैं—मगर कुछ नाम सरकारी स्क्रीन से उतरने का नाम नहीं लेते। कभी निर्माण, कभी बैलेंस वर्क, कभी फर्नीचर, कभी साउंड, कभी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, कभी अकॉस्टिक्स और कभी लैंडस्केपिंग। हर कुछ वर्षों में सभागार को नई बीमारी और निगम को करोड़ों रुपये का नया “इलाज” मिल जाता है।
जनता पूछ रही है—यह सभागार है या सार्वजनिक खजाने पर लगा ऐसा सरकारी नल, जिसे बंद करने की चाबी किसी “टेंडर मठाधीश” की जेब में है?
₹2.45 करोड़ का काम—वित्तीय मैदान में केवल दो खिलाड़ी!
सिस्टम टेंडर नंबर 89062, फाइल नंबर 8513/Const./2019/KMC में वातानुकूलित सभागार के बैलेंस वर्क का प्राक्कलन ₹2,44,88,510 बताया गया। काम में पब्लिक एड्रेस सिस्टम, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, फर्नीचर, अकॉस्टिक्स, एयर कंडीशनिंग तथा संबंधित कार्य शामिल थे।
वित्तीय तुलनात्मक विवरण के अनुसार:
– जे.पी. कंस्ट्रक्शन कंपनी—₹2,42,43,624.90
– उमेश राठौर—₹2,39,49,762.78 उमेश राठौर L-1 बने। दोनों बोलियों में लगभग ₹2.94 लाख का अंतर था।
इतने बड़े काम के वित्तीय मुकाबले में केवल दो फर्में क्यों दिखाई दीं? बाकी बोलीदाता आए ही नहीं, तकनीकी जाँच में बाहर हुए या पात्रता की छलनी इतनी सुविधाजनक थी कि मैदान अंततः दो खिलाड़ियों तक सिमट गया?
तकनीकी मूल्यांकन पत्रक सार्वजनिक किए बिना निगम प्रतिस्पर्धा की पवित्रता का प्रमाणपत्र स्वयं को नहीं दे सकता।
तीन साल में फर्नीचर बूढ़ा, माइक गूँगा और कैमरे अंधे कैसे हो गए?
वर्ष 2025 में उसी सभागार के लिए लगभग ₹1.60 करोड़ का एक और पैकेज सामने आया—फर्नीचर, पब्लिक एड्रेस, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और साउंड सिस्टम “Enhancement”।
अब सवाल सीधा है—2022 के करोड़ों रुपये वाले कार्य में शामिल फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था तीन वर्षों में कहाँ गई?
क्या सभागार की कुर्सियों पर बैठते ही उनकी सरकारी उम्र समाप्त हो जाती है?
क्या माइक इतने नाजुक थे कि कुछ भाषण सुनकर ही मौनव्रत पर चले गए?
क्या कैमरे निगम की फाइलों में फैले अंधेरे को देखकर स्वयं अंधे हो गए?
या “Enhancement” वह अंग्रेजी पर्दा है जिसके पीछे पुरानी खरीद पर नई खरीद की सरकारी आरती उतारी जा रही है?
निगम को मदवार जवाब देना होगा—2022 में क्या खरीदा, कितनी संख्या में खरीदा, किस ब्रांड का खरीदा, कहाँ लगाया और 2025 में उसी श्रेणी की वस्तुएँ दोबारा क्यों प्रस्तावित की गईं?
एक ही NIT में ₹160.67 लाख और ₹16.67 लाख—करोड़ों की निविदा या रफ कॉपी?
उपलब्ध NIT में कथित रूप से एक स्थान पर ₹160.67 लाख और दूसरे स्थान पर ₹16.67 लाख दर्ज होना मामूली टंकण त्रुटि कहकर टाला नहीं जा सकता। अंतर पूरे ₹1.44 करोड़ का है।
क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने दस्तावेज पढ़े बिना हस्ताक्षर किए?
क्या करोड़ों के टेंडर निगम में उसी सहजता से बनते हैं जैसे बच्चे रफ कॉपी में शून्य जोड़ते-घटाते हैं?
और यदि बाद में Corrigendum जारी हुआ तो उसकी संपूर्ण प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं?
Corrigendum में केवल तारीख बदली गई या पात्रता, BOQ, ब्रांड, मात्रा और तकनीकी शर्तों की भी “सर्जरी” हुई—जनता को जानने का अधिकार है।
लैंडस्केपिंग में फिर वही नाम—क्या संयोग भी सरकारी संरक्षण लेकर आता है?
सिस्टम टेंडर नंबर 164857 में सभागार की लैंडस्केपिंग एवं संबंधित सिविल कार्य का PAC ₹55,63,760 बताया गया।
वित्तीय दरें:
– Nirmaan Engineering—10.01% कम
– Sad Infrastructure—15.86% कम
– Beeta Engineering—19.99% कम
– उमेश राठौर—21% कम
उमेश राठौर की कथित बोली ₹43,95,370.40 रही और वे L-1 बने। L-2 से अंतर लगभग ₹56,194 बताया गया। करीबी दर अपने-आप मिलीभगत सिद्ध नहीं करती। लेकिन एक ही सभागार के अलग-अलग बड़े कार्यों में एक नाम बार-बार L-1 बने तो जाँच माँगना अपराध नहीं—जनहित का कर्तव्य है।
सभी बोलीदाताओं की तकनीकी फाइल, बोली अपलोड का समय, IP लॉग, डिजिटल हस्ताक्षर, EMD का स्रोत और वित्तीय संबंधों की स्वतंत्र जाँच कराई जाए। यदि सब पाक-साफ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में डर कैसा?
सरकार बदली—पर टेंडर की गाड़ी उसी चौखट पर क्यों रुकी?
2022 का बड़ा काम पिछली सरकार के दौरान हुआ। 2025 का लैंडस्केपिंग कार्य बदली हुई सरकार में सामने आया। फिर भी सफल ठेकेदार के रूप में वही नाम दिखाई देता है।
इसलिए प्रश्न किसी एक दल अथवा नेता तक सीमित नहीं है।
क्या पुरानी सत्ता में कोई राजनीतिक छतरी थी?
क्या नई सत्ता में भी वही पकड़ कायम रही?
क्या निगम में कोई स्थायी “टेंडर मठाधीश” बैठा है, जो सरकार बदलते ही केवल अपने छाते का रंग बदल लेता है?
या ठेकेदार वास्तव में हर बार निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा में ही सबसे कम दर देकर सफल हुआ?
इन प्रश्नों का उत्तर न राजनीतिक भाषण देगा, न प्रेस विज्ञप्ति। उत्तर फाइल नोटिंग, मूल्यांकन पत्रक, स्वीकृति आदेश, भुगतान रिकॉर्ड और निविदा के डिजिटल निशान देंगे। अभी उपलब्ध सामग्री किसी नेता को संरक्षणदाता सिद्ध नहीं करती। इसलिए पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल अथवा किसी वर्तमान नेता को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन फाइलों में यदि राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप हुआ है तो वह जाँच से बाहर भी नहीं रहना चाहिए।
“सभागार के नाम पर बिल—अधिकारी के मकान में माल?”
सबसे विस्फोटक आरोप यह है कि सभागार के फर्नीचर अथवा संबंधित काम की आड़ में नगर निगम के एक अधिकारी के निजी मकान में ₹7 लाख से अधिक का कार्य कराया गया। यदि यह आरोप बिल, चालान, माप और भुगतान रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो मामला साधारण अनियमितता का नहीं रहेगा। वह जनता के धन से निजी ऐशगाह सजाने का गंभीर प्रकरण होगा।
लेकिन ग्राम यात्रा किसी का नाम हवा में उछालकर पत्रकारिता को अफवाह की मंडी नहीं बनाएगा।
नाम तभी प्रकाशित होना चाहिए जब सामने हों:
– निजी मकान का सत्यापित पता और स्वामित्व रिकॉर्ड
– सामग्री के मूल बिल तथा GST विवरण
– डिलीवरी चालान, ई-वे बिल, वाहन नंबर और गेटपास
– सप्लायर एवं मजदूरों के सत्यापित बयान
– सभागार की MB में दर्ज मात्रा
– स्टॉक एवं एसेट रजिस्टर की प्रविष्टियाँ
– सभागार में वास्तव में उपलब्ध सामग्री
– निजी मकान में लगी सामग्री का ब्रांड और माप
– भुगतान से संबंधित सरकारी देयक
– बिल सत्यापित करने वाले अधिकारियों के हस्ताक्षर
यदि सरकारी बिल और निजी मकान की सामग्री का डीएनए एक निकला तो फिर फाइल नहीं, पूरा गठजोड़ कटघरे में होगा।
पुराने सागौन का भूत पूछ रहा—“मेरा स्टॉक नंबर कहाँ है?”
सभागार का पुराना और मूल्यवान सागौन फर्नीचर कहाँ गया?
क्या विधिवत नीलामी हुई?
किस मूल्यांकनकर्ता ने उसकी कीमत तय की?
क्या वह किसी निगम स्टोर में रखा गया?
क्या दूसरे कार्यालय को हस्तांतरित किया गया?
क्या नीलामी की रसीद नगर निगम के खाते में जमा हुई?
या सागौन की कुर्सियाँ सरकारी रजिस्टर से उठकर किसी निजी बैठकखाने में विराजमान हो गईं?
और यदि 2022 में नया फर्नीचर खरीदा गया था तो 2025 में फिर फर्नीचर की भूख किसे लगी?
क्या नगर निगम का सभागार कुर्सियाँ खाता है, माइक पचाता है और हर तीसरे वर्ष करोड़ों रुपये का नया भोजन माँगता है?
पुराने सागौन से लेकर नई कुर्सियों तक प्रत्येक वस्तु की टैग संख्या सहित भौतिक जाँच हो। स्टॉक रजिस्टर, MB, बिल और स्थल पर उपलब्ध सामग्री का मिलान कराया जाए। तभी पता चलेगा कि सभागार सजाया गया या रिकॉर्ड सजाए गए।
लगभग ₹4.61 करोड़—फिर भी टेंडर का पेट खाली!
केवल 2022 और 2025 के बताए गए तीन सभागार-संबंधित कामों की अनुमानित राशि लगभग ₹4.61 करोड़ बैठती है। यदि 2017 का ₹84.46 लाख वाला Capacity Development Centre भी यही परिसर सिद्ध होता है, तो पूरी लागत लगभग ₹5.46 करोड़ तक पहुँच सकती है।
इतना पैसा निगलने के बाद भी सभागार को बार-बार फर्नीचर, साउंड और सजावट चाहिए तो तीन ही संभावनाएँ दिखाई देती हैं:
पहली—पुराने कामों की गुणवत्ता इतनी घटिया थी कि करोड़ों की व्यवस्था तीन वर्ष भी नहीं टिक सकी।
दूसरी—जरूरत का आकलन बिना वास्तविक सर्वे और स्टॉक सत्यापन के किया गया।
तीसरी—सभागार को जानबूझकर ऐसी “दुधारू टेंडर गाय” बना दिया गया जिसका पेट फाइलों में कभी भरता ही नहीं।
तीनों में से सच जो भी हो—जवाबदेही निगम की बनती है।
नगर निगम तत्काल ये रिकॉर्ड सार्वजनिक करे
1. सभागार से जुड़े समस्त कार्यादेश एवं अनुबंध
2. सभी सफल ठेकेदारों और उपठेकेदारों के नाम
3. उमेश राठौर अथवा संबंधित फर्मों को किए गए कुल भुगतान
4. ₹1.60 करोड़ वाले टेंडर की L-1 Summary और कार्यादेश
5. संपूर्ण Corrigendum तथा बदलावों की तुलनात्मक सूची
6. वर्ष 2022 और 2025 के विस्तृत BOQ
7. माप पुस्तिका, रनिंग बिल और अंतिम बिल
8. फर्नीचर एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का एसेट रजिस्टर
9. पुराने सागौन फर्नीचर का मूल्यांकन, हस्तांतरण अथवा नीलामी रिकॉर्ड
10. कथित निजी मकान में सामग्री लगाए जाने के आरोप की स्वतंत्र जाँच
11. बिल और MB प्रमाणित करने वाले इंजीनियरों के नाम
12. प्रशासकीय, तकनीकी एवं वित्तीय स्वीकृतियाँ
13. बोलीदाताओं का तकनीकी मूल्यांकन तथा अयोग्यता के कारण
14. ई-टेंडर IP लॉग, अपलोड समय और डिजिटल हस्ताक्षर रिकॉर्ड
15. सामग्री की वर्तमान संयुक्त भौतिक सत्यापन रिपोर्ट
ग्राम यात्रा की दस्तावेजी दस्तक
नगर निगम याद रखे—फाइल पर धूल डालने से दस्तावेज मरते नहीं। वे चुप रहते हैं, मगर जब बिल, MB, स्टॉक रजिस्टर और भुगतान एक साथ बोलते हैं तो वातानुकूलित कमरों में बैठे चेहरों का पसीना छुड़ा देते हैं। यह किसी ठेकेदार, अधिकारी या नेता से निजी दुश्मनी नहीं। यह जनता के धन की शल्य-परीक्षा है।
यदि काम ईमानदार है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक कीजिए।
यदि माल सभागार में है तो गिनवा दीजिए।
यदि पुराना सागौन नीलाम हुआ तो रसीद दिखा दीजिए।
यदि ₹7 लाख वाला आरोप झूठा है तो बिल और स्थल सत्यापन से उसे दफना दीजिए।
लेकिन यदि सभागार के नाम पर बिल बना और माल किसी निजी मकान में पहुँचा—तो यह “विकास” नहीं, जनता की तिजोरी पर सजा सरकारी ड्राइंगरूम होगा।
जल्द बड़ा दस्तावेजी खुलासा
“सभागार के नाम पर बिल—अधिकारी के मकान में माल?”
पुराने सागौन की आखिरी लोकेशन क्या थी?
₹1.60 करोड़ के टेंडर का सफल ठेकेदार कौन?
उमेश राठौर बार-बार L-1—प्रतिस्पर्धा का परिणाम या संरक्षण का कमाल?
पुरानी सत्ता, नई सत्ता या निगम का स्थायी “टेंडर मठाधीश”—आखिर किसकी छतरी में फलता रहा करोड़ों का कारोबार?
नाम अनुमान से नहीं—बिल, MB, BOQ, स्टॉक रजिस्टर, फोटो, चालान और भुगतान की पूरी शृंखला के साथ प्रकाशित होंगे।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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