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कुसमुंडा पेट्रोल पंप की फाइल में “बारूदी शिकायत”—17 दरवाजों पर दस्तक!

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कलेक्टर से लेकर मुख्य सचिव, DGP, PESO, SECL, IOCL, EOW और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय तक भेजा अभ्यावेदन—अब किस दफ्तर में दबेगा “Right to Site” का सच?

 

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कथित ₹2.5 करोड़ का सौदा, संदिग्ध “99 वर्ष” लीज और SECL भूमि पर जारी पेट्रोल कारोबार जाँच के घेरे में; वैध दस्तावेज नहीं मिले तो आपूर्ति रोकने, सुरक्षित सीलिंग और FIR की माँग

एक विभाग ने दबाई फाइल तो दूसरे से उठेगा सवाल—बहु-एजेंसी दस्तक से बड़ी कार्रवाई की आहट, लेकिन अंतिम फैसला दस्तावेज और निष्पक्ष जाँच से ही

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कुसमुंडा स्थित मेसर्स कोरबा सर्विस स्टेशन का विवाद अब किसी एक कार्यालय की बंद फाइल नहीं रहा। भूमि-अधिकार, जिला NOC, PESO लाइसेंस, IOCL डीलरशिप, अग्नि सुरक्षा, कथित ₹2.5 करोड़ के निजी सौदे और विवादित “99 years” लीज की जाँच की माँग वाली शिकायत प्रशासनिक व्यवस्था के एक नहीं, अनेक दरवाजों तक पहुँचा दी गई है। भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ, छत्तीसगढ़ के प्रदेश सचिव अब्दुल सुल्तान द्वारा प्रस्तुत अति आवश्यक जनसुरक्षा शिकायत-सह-अभ्यावेदन में कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी को मुख्य शिकायत दी गई है। इसके साथ मुख्य सचिव, गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, पुलिस अधीक्षक कोरबा, नगर निगम आयुक्त, PESO, SECL, IOCL, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री, अग्निशमन विभाग, पर्यावरण संरक्षण मंडल और EOW/ACB सहित 17 अधिकारियों एवं संस्थाओं को प्रतिलिपि चिह्नित की गई है।

अब फाइल किसी एक मेज की दराज में डालकर मामला शांत करना आसान नहीं होगा।
यदि जिला प्रशासन मौन रहा तो PESO से प्रश्न उठेगा।
यदि PESO चुप रहा तो IOCL को जवाब देना होगा।
यदि IOCL ने आँखें मूँदीं तो SECL के मूल भूमि रिकॉर्ड सामने आएँगे।
यदि कथित सौदे का वित्तीय निशान मिला तो EOW/ACB की भूमिका खड़ी होगी

और यदि विवादित दस्तावेज न्यायालय अथवा सरकारी कार्यालय में इस्तेमाल हुआ है तो मामला साधारण भूमि विवाद की सीमा तोड़कर संभावित कूटरचना और धोखाधड़ी की जाँच तक जा सकता है।

17 प्रतिलिपियाँ—क्या बड़ी कार्रवाई की आहट?

प्रतिलिपियाँ भेजे जाने भर से कार्रवाई प्रारंभ या अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। लेकिन शिकायत का दायरा बताता है कि मामला अब बहु-विभागीय जवाबदेही की ओर बढ़ सकता है।

शिकायत में जिन संस्थाओं को प्रतिलिपि चिह्नित की गई है, उनमें प्रमुख हैं:

– मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन
– प्रमुख सचिव, गृह विभाग
– पुलिस महानिदेशक
– पुलिस अधीक्षक, कोरबा
– आयुक्त, नगर पालिक निगम कोरबा
– मुख्य नियंत्रक विस्फोटक एवं संबंधित PESO अधिकारी
– CMD, SECL एवं महाप्रबंधक, कुसमुंडा क्षेत्र
– अध्यक्ष एवं रिटेल सेल्स अधिकारी, IOCL
– सचिव, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय
– केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री
– जिला अग्निशमन अधिकारी
– क्षेत्रीय अधिकारी, पर्यावरण संरक्षण मंडल
– पुलिस अधीक्षक, EOW/ACB
– वर्तमान पेट्रोल पंप संचालक

यह सूची अपने-आप में प्रशासनिक विस्फोट की गारंटी नहीं, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ऐसा जवाबदेही-जाल खड़ा करती है जिसमें प्रत्येक संस्था को अपने अधिकार-क्षेत्र का उत्तर देना पड़ सकता है।  अब कोई विभाग यह कहकर नहीं बच सकता कि मामला दूसरे विभाग का है। जमीन SECL की बताई गई है, पेट्रोल IOCL भेज रहा है, भंडारण PESO लाइसेंस से जुड़ा है, NOC जिला प्रशासन की है, सुरक्षा अग्निशमन एवं विद्युत विभाग का विषय है और कथित करोड़ों का सौदा वित्तीय जाँच एजेंसी के दायरे में आ सकता है।

SECL ने जमीन खाली करने को कहा—तो पेट्रोल किस अधिकार से बिक रहा है?

 

शिकायत का केंद्रीय प्रश्न किसी राजनीतिक नारे से अधिक सीधा है:

«वर्तमान संचालक के पास इस विशिष्ट स्थल पर पेट्रोलियम पदार्थ रखने और बेचने का आज का वैध “Right to Site” कहाँ है?»

SECL के 3 सितंबर 2024 के संदर्भित पत्र में कथित रूप से 30 दिनों के भीतर भूमि एवं भवन खाली कर कब्जा लौटाने का निर्देश दिया गया था। 27 जनवरी 2025 के पत्र में कब्जा वापस न मिलने की स्थिति तथा जमा राशि लौटाने के लिए बैंक विवरण माँगे जाने का उल्लेख बताया गया है।

यदि नई लीज से इनकार हुआ, जमीन मालिक ने कब्जा माँगा और जमा राशि लौटाने की बात हुई—तो पेट्रोल का कारोबार किस वर्तमान दस्तावेज के सहारे खड़ा है?
क्या SECL ने बाद में नई अनुमति दी?
क्या IOCL ने नवीन भूमि-अधिकार की जाँच की?
क्या PESO को विवाद की सूचना मिली?
क्या जिला NOC बदली हुई परिस्थिति में भी प्रभावी है?
या पुराने कागजों पर नया कारोबार दौड़ रहा है और प्रत्येक विभाग दूसरे की मुहर देखकर अपनी जिम्मेदारी से आँख बचा रहा है?
हाईकोर्ट की अंतरिम राहत को “सर्वरोग निवारक लाइसेंस” किसने बनाया?

हाईकोर्ट के 25 मार्च 2025 के उपलब्ध आदेश में SECL के 3 सितंबर 2024 के मेमो के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगाई गई थी।

लेकिन उपलब्ध आदेश:

– नई लीज नहीं देता;
– SECL भूमि पर नया अधिकार पैदा नहीं करता;
– PESO लाइसेंस वैध घोषित नहीं करता;
– जिला NOC की पुष्टि नहीं करता;
– IOCL डीलरशिप पुनर्गठन को मंजूरी नहीं देता;
– पेट्रोल बेचने का स्पष्ट स्थायी आदेश नहीं देता।

फिर सीमित अंतरिम राहत को पेट्रोल कारोबार का अमर प्रमाणपत्र बनाकर किसने पेश किया?

बेदखली पर रोक का अर्थ यह नहीं कि भूमि-अधिकार, अग्नि सुरक्षा, टैंक परीक्षण, विद्युत प्रमाणपत्र और सार्वजनिक दायित्व बीमा की जाँच भी स्थगित हो गई।  अदालत के आदेश का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसकी आड़ में कानून से बाहर कोई नया अधिकार गढ़ना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

तीन वर्ष की लीज में “99 वर्ष” का बरगद कैसे उगा?

शिकायत में सबसे विस्फोटक दस्तावेजी विरोधाभास कथित “99 years” वाली प्रति है। एक ओर SECL रिकॉर्ड में मूल व्यवस्था तीन वर्षीय बताई जा रही है, दूसरी ओर विवादित प्रति में कथित रूप से 99 वर्ष अंकित दिखाई देता है।

तीन वर्ष की लीज अचानक 99 वर्ष की कैसे हुई?
शब्द मूल दस्तावेज में था या बाद में जोड़ा गया?
किसने प्रमाणित किया?
कहाँ-कहाँ प्रस्तुत हुआ?
किसे लाभ मिला?
और किस अधिकारी ने मूल रिकॉर्ड देखे बिना उस पर विश्वास किया?

अब अनुमान नहीं, FSL को बोलना चाहिए। स्याही, टाइपिंग, ओवरराइटिंग, हस्ताक्षर, मुहर और पृष्ठ क्रमांकन की वैज्ञानिक जाँच से दूध का दूध और दस्तावेज का दस्तावेज हो सकता है। यदि प्रति सही है तो SECL मूल दस्तावेज सार्वजनिक करे।

यदि गलत है तो यह कोई मासूम टंकण त्रुटि नहीं—सार्वजनिक क्षेत्र की भूमि पर निजी अधिकार गढ़ने की संभावित आपराधिक पटकथा हो सकती है।

2.5 करोड़ में कारोबार बिका या SECL की जमीन पर “हवा का अधिकार”?

शिकायत में लगभग ₹2.5 करोड़ के कथित निजी हस्तांतरण की वित्तीय जाँच माँगी गई है। इसे अभी प्रमाणित तथ्य नहीं बताया गया है।

फिर भी प्रश्न गंभीर है—यदि सौदा हुआ तो बेचा क्या गया?
डीलरशिप?
मशीनरी?
भूमिगत टैंक?
पेट्रोलियम स्टॉक?
कारोबार की goodwill?
संचालन का नियंत्रण?
या SECL की भूमि पर ऐसा कथित अधिकार, जिसे बेचने का कानूनी अधिकार किसी निजी व्यक्ति के पास था ही नहीं?

बैंकिंग ट्रेल, Sale Agreement, MoU, Power of Attorney, GST और आयकर रिकॉर्ड सामने आते ही ₹2.5 करोड़ की चर्चा अफवाह साबित होगी या वित्तीय जाँच की आग—यह तय हो सकता है। देबजानी मजूमदार सहित संबंधित पक्षों की भूमिका जाँच के दायरे में। शिकायत में प्रोपराइटर अथवा पूर्व प्रोपराइटर बताई गई देबजानी मजूमदार की भूमिका की मूल अभिलेखों से जाँच की माँग की गई है।

उन्हें या किसी अन्य व्यक्ति को केवल नाम के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन यह जाँचना आवश्यक है कि:

– डीलरशिप या संचालन कब और किसके पक्ष में बदला;
– किसने कौन-सा दस्तावेज प्रस्तुत किया;
– कथित भुगतान किसने लिया;
– विवादित लीज का उपयोग किसने किया;
– वर्तमान बिक्री की आय किसके खाते में जाती है;
– वास्तविक संचालक और लाइसेंसधारी एक ही हैं या अलग-अलग।

सभी संबंधित पक्षों को जवाब देने का अवसर मिले, लेकिन “जाँच से छूट” का विशेष लाइसेंस किसी को नहीं दिया जा सकता।

अब प्रशासन की चुप्पी भी रिकॉर्ड बनेगी

शिकायत में सात दिनों के भीतर FIR नंबर, जाँच अधिकारी का नाम अथवा प्रारंभिक जाँच का कारणयुक्त निर्णय माँगा गया है।

अब प्रशासन जो करेगा, रिकॉर्ड बनेगा।
और जो नहीं करेगा, वह भी रिकॉर्ड बनेगा।
यदि संयुक्त निरीक्षण हुआ—रिकॉर्ड बनेगा।
यदि मूल दस्तावेज माँगे गए—रिकॉर्ड बनेगा।
यदि PESO और IOCL से जवाब लिया गया—रिकॉर्ड बनेगा।
यदि शिकायत एक मेज से दूसरी मेज घूमती रही—वह सरकारी निष्क्रियता का रिकॉर्ड बनेगा।

पेट्रोलियम टैंक के ऊपर बैठी व्यवस्था को यह समझना होगा कि फाइल दबाने से ज्वलनशील प्रश्न बुझते नहीं; वे दबाव बढ़ाते हैं।

क्या पंप जल्द सील होगा? क्या FIR होगी?

अभी ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी। पंप की सीलिंग, ईंधन आपूर्ति रोकना अथवा FIR—तीनों विधिक जाँच, वर्तमान न्यायालयीन आदेश और मूल दस्तावेजों पर निर्भर करेंगे।

लेकिन शिकायत ने कार्रवाई के संभावित दरवाजे खोल दिए हैं:

1. जिला प्रशासन संयुक्त सुरक्षा निरीक्षण करा सकता है;
2. PESO लाइसेंस की वर्तमान वैधता की समीक्षा कर सकता है;
3. IOCL से आपूर्ति जारी रखने का आधार माँगा जा सकता है;
4. SECL मूल लीज और कब्जे की स्थिति स्पष्ट कर सकता है;
5. FSL विवादित दस्तावेज की जाँच कर सकती है;
6. पुलिस संज्ञेय अपराध मिलने पर FIR दर्ज कर सकती है;
7. EOW कथित ₹2.5 करोड़ के वित्तीय लेन-देन की जाँच कर सकता है;
8. वैध दस्तावेज न मिलने और सुरक्षा जोखिम पाए जाने पर विधिसम्मत ढंग से संचालन रोका जा सकता है।

अर्थात बड़ी कार्रवाई की संभावना और प्रशासनिक दबाव अवश्य बना है—लेकिन उसका वास्तविक प्रमाण आदेश, निरीक्षण, नोटिस, जब्ती, FIR अथवा लाइसेंस कार्रवाई होगी; केवल मौखिक आश्वासन नहीं।

अब 17 दरवाजों से एक ही सवाल टकराएगा

SECL की भूमि पर वर्तमान वैध लीज कहाँ है?

“99 वर्ष” किस कलम से निकले?

₹2.5 करोड़ किस अधिकार के बदले दिए गए?

IOCL ने ईंधन किस वर्तमान भूमि-अधिकार पर भेजा?

PESO लाइसेंस का आधार आज भी जीवित है या फाइलों में कृत्रिम साँस दी जा रही है?

और प्रशासन जाँच करेगा या किसी हादसे के बाद श्रद्धांजलि लिखेगा?

इस शिकायत ने व्यवस्था की मेज पर केवल कागज नहीं रखा—भूमि, लाइसेंस, कारोबार और जनसुरक्षा से जुड़े प्रश्नों का जलता हुआ पुलिंदा रख दिया है। अब इसे दबाने की कोशिश जिस दफ्तर में होगी, सवाल वहीं से और तीखा उठेगा। शिकायत कई दरवाजों तक पहुँचाई गई है—अब जवाब भी कई कुर्सियों को देना होगा!

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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