खदानों में कथित लूट, GM कार्यालयों में रहस्यमयी चुप्पी—क्या बिलासपुर मुख्यालय बना भ्रष्ट कुर्सियों का ‘सुरक्षा कवच’?

नीचे कोयला गायब, बीच में फाइलें दफन और ऊपर सब ‘ऑल इज वेल’—क्या SECL में खदान से मुख्यालय तक कथित संरक्षण की पूरी सीढ़ी खड़ी है?
दस वर्षों की पदस्थापना, संपत्ति, बैंक खाते और डिजिटल संवाद खुले तो क्या विजिलेंस की चौखट से लेकर बड़ी कुर्सियों तक बिछा मिलेगा कथित हिस्सेदारी का काला गलियारा?
ECL में दो GM सहित सात अधिकारी गिरफ्तार हो सकते हैं, SECL का DGM रिश्वत में पकड़ा जा सकता है—तो बिलासपुर मुख्यालय की जवाबदेही जांच से बाहर क्यों?
एपिसोड–2
कोरबा/बिलासपुर | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क खदानों से आरोप उठते रहे। कारोबारियों के बीच कथित रेट-कार्ड की चर्चा होती रही। सुरक्षा व्यवस्था की आंखों के सामने कोयला निकलता रहा। स्टॉक, ग्रेड, कांटा, ओवरलोडिंग और विशेष खरीदारों को कथित लाभ के सवाल हवा में तैरते रहे। लेकिन GM कार्यालयों से लेकर SECL मुख्यालय बिलासपुर तक बड़ी कुर्सियों की नींद नहीं टूटी!
क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है?
क्या अधिकारियों तक सही जानकारी नहीं पहुंची?
क्या शिकायतें बीच रास्ते में दफन कर दी गईं?
या फिर कथित भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी ऊपर तक पहुंच चुकी हैं कि जांच की प्रत्येक फाइल आगे बढ़ने से पहले ही किसी प्रभावशाली मेज के नीचे दम तोड़ देती है?
एपिसोड–1 में ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क ने मानिकपुर, गेवरा और दीपका सहित संबंधित खदानों में प्रति टन कथित वसूली, स्टॉक में संभावित हेरफेर और ओवरलोडिंग के जरिए कोयले की निकासी से जुड़े आरोपों को सामने रखा। अब सवाल उस व्यवस्था से है, जिसका काम इन खदानों की निगरानी करना है।
यदि नीचे कथित लूट हुई तो ऊपर कौन सोया था?
यदि ऊपर कोई नहीं सोया था, तो कथित लूट को बचा कौन रहा था?
खदान में खेल वर्षों तक चले और GM कार्यालय बेखबर रहे—यह कहानी कितनी सच्ची?
क्षेत्रीय GM कार्यालय कोई डाकघर नहीं, जो खदानों से रिपोर्ट लेकर मुख्यालय भेज दे और अपनी जिम्मेदारी समाप्त मान ले। उसके पास उत्पादन, बिक्री, डिस्पैच, स्टॉक, सुरक्षा, गुणवत्ता, वित्तीय प्रदर्शन और कर्मचारियों की पदस्थापना से संबंधित जानकारी पहुंचती है।
खदान की प्रत्येक बड़ी असामान्यता को समीक्षा में सामने आना चाहिए—
– उत्पादन और डिस्पैच का अंतर;
– physical और book stock का अंतर;
– असामान्य ओवरलोडिंग;
– weighbridge की तकनीकी शिकायत;
– source और destination weight में अंतर;
– एक ही खरीदार को बार-बार प्राथमिकता;
– DO में असामान्य संशोधन;
– संवेदनशील पदों पर वर्षों से जमे अधिकारी;
– चोरी और अवैध वसूली की शिकायतें।
यदि इनमें से कुछ भी GM कार्यालय के सामने नहीं आया, तो निगरानी व्यवस्था का अर्थ क्या रह गया?
यदि सामने आया और कार्रवाई नहीं हुई, तो फाइल किसने रोकी?
यदि जांच बैठी, तो परिणाम कहां है?
यदि दोषी मिले, तो कार्रवाई किस पर हुई?
और यदि हर बार कोई निचला कर्मचारी पकड़कर मामला समाप्त कर दिया गया, तो बड़ी कुर्सियों को किसने अभयदान दिया?
GM कार्यालय निगरानी का केंद्र था या कथित काले कारोबार के लिए ‘नो-ऑब्जेक्शन सेंटर’?
रिपोर्ट में सब हरा—जमीन पर कोयला काला और व्यवस्था उससे भी काली?
सार्वजनिक उपक्रमों में ऊपर बैठे अधिकारी प्रायः अधीनस्थों से आई रिपोर्ट पर निर्णय लेते हैं। लेकिन यही व्यवस्था कथित भ्रष्टाचार का सबसे सुविधाजनक पर्दा भी बन सकती है। खदान से रिपोर्ट गई—सब सामान्य। क्षेत्रीय कार्यालय ने लिखा—कोई गंभीर अनियमितता नहीं। विजिलेंस निरीक्षण हुआ—कुछ खास नहीं मिला। मुख्यालय ने फाइल बंद की—शिकायत प्रमाणित नहीं। फिर कुछ महीने बाद उसी क्षेत्र से वही आरोप दोबारा!
यदि हर रिपोर्ट में व्यवस्था निर्दोष है, तो आरोप बार-बार पैदा कहां से हो रहे हैं?
क्या निरीक्षण केवल दस्तावेज देखकर किया गया?
क्या physical stock की स्वतंत्र माप हुई?
क्या अचानक जांच वास्तव में अचानक थी?
क्या निरीक्षण की तारीख पहले ही संबंधित अधिकारियों तक पहुंच गई?
क्या कंप्यूटर से raw data लिया गया या आरोपित विभाग द्वारा दी गई Excel sheet को ही सत्य मान लिया गया?
क्या शिकायतकर्ता को सुना गया?
क्या कारोबारी और ट्रांसपोर्टरों के गोपनीय बयान लिए गए?
यदि आरोपित विभाग ने स्वयं अपना प्रमाणपत्र लिखा और विजिलेंस ने उसी पर मुहर लगा दी, तो यह जांच नहीं—कथित भ्रष्टाचार के शव पर सरकारी सफेद चादर है। बिलासपुर मुख्यालय—प्रहरी, दर्शक या कथित संरक्षण की राजधानी? SECL मुख्यालय बिलासपुर कंपनी की प्रशासनिक रीढ़ है। वहीं शीर्ष प्रबंधन बैठता है। वहीं विजिलेंस है। वहीं वित्त, पर्सनल, तकनीकी, बिक्री और सुरक्षा की सर्वोच्च संस्थागत जिम्मेदारी है।
फिर मुख्यालय जवाब दे—
– खदानों से प्राप्त शिकायतों का केंद्रीय डेटाबेस कहां है?
– एक अधिकारी के विरुद्ध अलग-अलग क्षेत्रों से आई शिकायतों को आपस में जोड़ा गया?
– संवेदनशील पदों की अधिकतम अवधि क्या है?
– उसका पालन क्यों नहीं हुआ?
– किन अधिकारियों के स्थानांतरण आदेश बार-बार रोके या बदले गए?
– किसकी अनुशंसा पर वही चेहरे स्टॉक, सेल्स, कांटा और डिस्पैच जैसे पदों पर लौटते रहे?
– मुख्यालय विजिलेंस ने कितने surprise checks किए?
– उनमें कितनी major irregularities मिलीं?
– कितने मामलों को CBI अथवा CVC को भेजा गया?
– कितने अधिकारियों की संपत्ति घोषणाओं का वास्तविक सत्यापन हुआ?
– और कितने मामलों में शिकायतकर्ता को ही प्रताड़ना अथवा स्थानांतरण झेलना पड़ा?
मुख्यालय यह कहकर नहीं बच सकता कि दैनिक संचालन क्षेत्रीय प्रबंधन की जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी नीचे सौंपने से जवाबदेही ऊपर से समाप्त नहीं हो जाती। यदि विभिन्न खदानों में समान प्रकार के आरोप सामने आए, तो उन्हें company-wide risk के रूप में पहचानना मुख्यालय का कर्तव्य था। यदि उसने ऐसा नहीं किया, तो यह अक्षमता है। यदि किया लेकिन कार्रवाई नहीं हुई, तो संभावित संरक्षण की जांच आवश्यक है। पर्सनल विभाग—क्या पदस्थापना बनी कथित वसूली तंत्र की ऑक्सीजन?
पर्सनल विभाग सीधे कोयला नहीं तौलता। वह DO जारी नहीं करता। वह ट्रक अथवा रेक लोड नहीं करता। लेकिन वह तय करने वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है कि कौन अधिकारी किस पद पर, किस क्षेत्र में और कितने समय तक बैठेगा।
यहीं से सबसे गंभीर प्रश्न जन्म लेते हैं—
– संवेदनशील पदों पर कौन-कौन अधिकारी पांच, सात अथवा दस वर्षों तक बने रहे?
– स्थानांतरण के बाद कौन दोबारा उसी अथवा समान संवेदनशील पद पर लौटा?
– किस अधिकारी के खिलाफ शिकायत के बावजूद उसकी पदस्थापना सुरक्षित रही?
– किसे जांच पूरी होने से पहले बेहतर पद मिल गया?
– किस ईमानदार कर्मचारी को अचानक दूर भेज दिया गया?
– किसकी अनुशंसा पर transfer order रोका गया?
– क्या पदस्थापना के बदले कथित आर्थिक अथवा अन्य लाभ लिया गया?
– क्या कुछ अधिकारियों का लंबा कार्यकाल कथित वसूली नेटवर्क को निरंतरता देता रहा?
लंबे समय तक एक पद पर रहना स्वयं भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि उसी अवधि में लगातार शिकायतें, विशेष कारोबारियों को लाभ और असामान्य संपत्ति-वृद्धि दिखाई दे, तो पदस्थापना फाइल जांच की केंद्रीय सामग्री बन जाती है। खदान में कथित वसूली का पौधा उगा हो तो पर्सनल विभाग की संदिग्ध पदस्थापना उसकी खाद और पानी साबित हो सकती है। विजिलेंस—भ्रष्टाचार की शिकारी या बड़ी कुर्सियों की चौकीदार? SECL की विजिलेंस व्यवस्था का उद्देश्य भ्रष्टाचार रोकना, शिकायतों की जांच करना और जोखिमपूर्ण प्रणालियों में सुधार करना है।
लेकिन लगातार उठते आरोप विजिलेंस से भी उत्तर मांगते हैं—
– क्या प्रति टन अवैध वसूली की शिकायत कभी मिली?
– क्या कांटा और स्टॉक प्रणाली की surprise checking हुई?
– क्या जांच में raw server data लिया गया?
– क्या अधिकारियों के फोन और वित्तीय संपर्क सक्षम एजेंसी को भेजे गए?
– क्या आय से अधिक संपत्ति की जांच की अनुशंसा हुई?
– क्या जांच क्षेत्रीय अधिकारियों से स्वतंत्र टीम ने की?
– क्या किसी senior officer की भूमिका सामने आने पर मामला कमजोर किया गया?
– क्या शिकायत को “साक्ष्य नहीं” कहकर बंद करने से पहले whistleblower को सुरक्षा दी गई?
यदि विजिलेंस ने सब कुछ किया, तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
यदि नहीं किया, तो इतने वर्षों तक विजिलेंस किसके खिलाफ सतर्क थी?
क्या उसकी दूरबीन केवल छोटे कर्मचारियों को देखती है और बड़ी कुर्सियों के सामने उसका शीशा धुंधला पड़ जाता है?
वित्त विभाग—कथित रकम कंपनी के खाते में नहीं आई तो किस खाते में गई?
यदि ₹10 से ₹50 प्रति टन कथित रकम वैधानिक नहीं थी, तो उसका कंपनी के खाते में आना संभव नहीं। फिर कथित रकम का रास्ता नकद, UPI, फर्जी बिल, ठेकेदार भुगतान, संपत्ति निवेश अथवा तीसरे व्यक्तियों के खातों से होकर गया हो सकता है—यह जांच का विषय है।
सक्षम एजेंसी को देखना चाहिए—
– अधिकारियों की ज्ञात आय;
– वार्षिक संपत्ति घोषणा;
– बैंक खातों में असामान्य जमा;
– परिजनों और आश्रितों के नाम संपत्ति;
– संदिग्ध फर्मों से लेन-देन;
– ठेकेदारों और एजेंसी प्रतिनिधियों द्वारा किए गए भुगतान;
– नकद में खरीदी जमीन और वाहन;
– तथा आय की तुलना में जीवनशैली।
जिन अधिकारियों का कोई दोष नहीं, स्वतंत्र जांच उन्हें भी संदेह से मुक्त करेगी। लेकिन जिनकी आय छोटी और साम्राज्य बड़ा निकला, उनसे पूछा जाना चाहिए— कोयले की कालिख हाथों पर नहीं दिखी तो क्या उसे जमीन, मकान, गाड़ी और बेनामी निवेश में धो दिया गया? दस वर्षों का ‘पद–संपत्ति–संपर्क’ ऑडिट हो जांच का सबसे निर्णायक तरीका तीन रिकॉर्ड को एक साथ मिलाना होगा— जांच का आधार| क्या देखा जाए
पद| अधिकारी कब, कहां और कितने समय तक संवेदनशील पद पर रहा
संपत्ति| उसी अवधि में उसकी तथा आश्रितों की घोषित और वास्तविक संपत्ति कैसे बदली
संपर्क| किन कारोबारियों, एजेंसियों और बिचौलियों से डिजिटल अथवा वित्तीय संपर्क रहा
सक्षम केंद्रीय एजेंसी पिछले दस वर्षों में निम्न विभागों से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों का कानूनसम्मत परीक्षण करे—
– सेल्स एवं मार्केटिंग;
– स्टॉक और डिस्पैच;
– कांटा एवं नाप-तौल;
– तकनीकी और गुणवत्ता;
– सुरक्षा तथा साइडिंग;
– वित्त;
– पर्सनल;
– क्षेत्रीय विजिलेंस;
– कोलियरी प्रबंधन;
– GM–CGM स्तर;
– और मुख्यालय के संबंधित नियंत्रक विभाग।
जांच अधिकारी की वैध आय, संपत्ति घोषणा, बैंक रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर हो। केवल पद अथवा लंबी तैनाती से किसी को दोषी न माना जाए। लेकिन जहां पद, संपत्ति और संदिग्ध संपर्क की तीनों रेखाएं एक बिंदु पर मिलें— वहीं कथित काले साम्राज्य का असली दरवाजा हो सकता है। देश में GM भी गिरफ्तार हुए—बिलासपुर की बड़ी कुर्सियां अभेद्य क्यों मानी जाएं? CBI ने 14 जुलाई 2022 को Eastern Coalfields Limited के दो तत्कालीन महाप्रबंधकों सहित सात आरोपियों को गिरफ्तार किया था। आरोप ECL के leasehold क्षेत्रों और रेलवे साइडिंग में कोयले के कथित दुरुपयोग तथा अवैध कोयला सिंडिकेट को नियमित नकद अनुचित लाभ के बदले संरक्षण देने से जुड़े थे। “CBI की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति” (https://cbi.gov.in/press-detail/NTExNg%3D%3D)
अर्थात जांच साइडिंग के छोटे कर्मचारी पर नहीं रुकी—दो GM तक पहुंची।
8 सितंबर 2011 को CBI ने SECL सोहागपुर के एक DGM को ₹30,000 रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। CBI के अनुसार ट्रैप के समय रकम शौचालय में फेंकी गई, लेकिन उसे बरामद कर लिया गया; तलाशी में ₹2.19 लाख संदिग्ध नकदी, बैंक खातों और तीन अचल संपत्तियों से जुड़े रिकॉर्ड भी मिले। “CBI की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति” (https://cbi.gov.in/press-detail/NDEzNw%3D%3D)
यह इतिहास बिलासपुर मुख्यालय की दीवार पर लिख दिया जाना चाहिए— बड़ी कुर्सी गिरफ्तारी से बड़ी नहीं होती। रकम शौचालय में फेंकने से रिश्वत पवित्र नहीं होती। और मुख्यालय में बैठने से कोई अधिकारी जांच की सीमा से बाहर नहीं हो जाता। कोयला मंत्रालय का अपना रिकॉर्ड—भ्रष्टाचार कोई काल्पनिक कहानी नहीं कोयला मंत्रालय की 2010–11 वार्षिक रिपोर्ट में पूरे क्षेत्र में 633 जांच मामले, 123 विभागीय जांच, CBI के 20 नियमित मामले, 20 निलंबन, 63 major penalties और 52 minor penalties दर्ज हैं। अकेले SECL में उसी वर्ष 66 मामले जांच के लिए लिए गए और 33 surprise checks हुए थे। “कोयला मंत्रालय की आधिकारिक रिपोर्ट” (https://coal.gov.in/sites/default/files/2019-11/xchap15.pdf)
मंत्रालय की 2019–20 रिपोर्ट में 639 शिकायत/मामलों में से 491 का निपटारा और 148 का लंबित रहना दर्ज है। शिकायतों की प्रकृति में नियुक्ति, पदोन्नति, निविदा अनियमितता, मुआवजा संबंधी भ्रष्टाचार और coal theft शामिल थे। “कोयला मंत्रालय की 2019–20 रिपोर्ट” (https://coal.gov.in/sites/default/files/2020-09/Chapter15-en.pdf) जब मंत्रालय स्वयं चोरी और भ्रष्टाचार को दर्ज जोखिम मानता है, तो कोरबा से उठते आरोपों को “अफवाह” कहकर रद्द करने से पहले स्वतंत्र जांच अनिवार्य है।
पहले डेटा सील हो—बाद में नोटिस और भाषण जांच की शुरुआत पत्राचार से नहीं, साक्ष्य संरक्षण से होनी चाहिए।
तत्काल सुरक्षित किए जाएं—
– ERP SAP audit trail;
– DO creation, modification और cancellation history;
– stock reconciliation reports;
– weighbridge raw data;
– calibration और maintenance logs;
– administrator login history;
– RFID और GPS movement;
– Railway FOIS तथा Railway Receipts;
– source–destination weighment;
– gate और loading CCTV;
– अधिकारियों की duty roster;
– transfer और posting files;
– शिकायत तथा vigilance records;
– आधिकारिक ईमेल और उपलब्ध डिजिटल संवाद।
यदि पहले नोटिस भेजा गया और बाद में डेटा लेने टीम पहुंची, तो कथित नेटवर्क को रिकॉर्ड बदलने, उपकरण हटाने और गवाह प्रभावित करने का अवसर मिल सकता है। भ्रष्टाचार को जांच की तारीख बताकर पकड़ना ऐसा है जैसे चोर को पहले फोन कर कहा जाए—घर साफ कर लो, तलाशी दल आ रहा है।
मुख्यालय से 20 सवाल—उत्तर नहीं तो CBI जांच
1. पिछले दस वर्षों में अवैध वसूली की कितनी शिकायतें मिलीं?
2. कितनी शिकायतें क्षेत्रीय कार्यालयों ने मुख्यालय को नहीं भेजीं?
3. कितने surprise checks वास्तव में बिना पूर्व सूचना हुए?
4. कितने मामलों में raw server data सुरक्षित किया गया?
5. कितने अधिकारियों के विरुद्ध संपत्ति जांच की अनुशंसा हुई?
6. कितने मामले CVC अथवा CBI को भेजे गए?
7. संवेदनशील पदों की अधिकतम अवधि क्या है?
8. कितने अधिकारियों ने वह अवधि पार की?
9. किसके आदेश से उनके स्थानांतरण रोके गए?
10. कितने officers बार-बार समान संवेदनशील पदों पर लौटे?
11. क्या शिकायतकर्ता कर्मचारियों का प्रताड़ना संबंधी audit हुआ?
12. क्या source–destination weight reconciliation मुख्यालय स्तर पर होती है?
13. stock variation की सीमा क्या है?
14. सीमा पार होने पर किसकी जवाबदेही तय होती है?
15. क्या buyer-wise abnormal lifting pattern की जांच हुई?
16. क्या मुख्यालय ने मानिकपुर, गेवरा और दीपका के आरोपों पर स्वतंत्र टीम भेजी?
17. क्या टीम क्षेत्रीय प्रबंधन से पूर्णतः स्वतंत्र थी?
18. क्या पिछले दस वर्षों की संपत्ति घोषणाएं सत्यापित की जाएंगी?
19. क्या मूल डिजिटल रिकॉर्ड CBI को सौंपे जाएंगे?
20. यदि व्यवस्था साफ है, तो CVC की निगरानी में व्यापक जांच से डर क्यों?
कथित साम्राज्य का सबसे बड़ा अपराध केवल लूट नहीं—संरक्षण है चोरी करने वाला एक रेक निकाल सकता है। कांटा प्रभावित करने वाला वजन बदल सकता है। बिचौलिया रकम बांट सकता है। लेकिन कथित खेल को वर्षों तक जिंदा रखने के लिए संरक्षण चाहिए। वह संरक्षण पदस्थापना बचाता है। शिकायत दबाता है। निरीक्षण की सूचना पहुंचाता है। जांच का दायरा छोटा करता है। बड़ी कुर्सियों को बाहर रखता है। और अंत में किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर पूरी व्यवस्था को ईमानदार घोषित कर देता है। इसलिए असली प्रश्न यह नहीं कि कोयला किसने उठाया।
असली प्रश्न है—
उसे बार-बार उठाने की हिम्मत किसने दी?
किसने कहा—लूटो, ऊपर तक सब सेट है?
अब प्यादे नहीं—कथित बादशाह की बारी SECL को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि एक आंतरिक कमेटी, एक निलंबन और एक गोलमोल प्रेस नोट से मामला ठंडा हो जाएगा। अब जांच खदान के गेट से आगे बढ़ेगी। GM कार्यालय की फाइल तक पहुंचेगी। पर्सनल विभाग की पदस्थापना खोलेगी। विजिलेंस की बंद शिकायतें पढ़ेगी। वित्तीय लेन-देन का पीछा करेगी। और बिलासपुर मुख्यालय की सबसे ऊंची जिम्मेदार कुर्सियों से पूछेगी—
आपको क्या पता था?
कब पता था?
क्या कार्रवाई की?
किसे बचाया?
और क्यों बचाया?
यदि अधिकारी निर्दोष हैं तो स्वतंत्र जांच उन्हें सार्वजनिक संदेह से मुक्त करेगी। लेकिन यदि खदान से उठती कथित हिस्सेदारी की सीढ़ी मुख्यालय तक पहुंचती मिली, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहेगा— यह राष्ट्र की संपत्ति की रक्षा के लिए बैठाई गई व्यवस्था द्वारा उसी संपत्ति के कथित सौदे का इतिहास होगा। कोयले की कालिख नीचे से ऊपर चढ़ चुकी है। अब या तो मुख्यालय अपना चेहरा धोकर रिकॉर्ड सार्वजनिक करे— या तैयार रहे उस दिन के लिए, जब CBI की दस्तक के साथ बंद अलमारियां खुलेंगी, कंप्यूटर सील होंगे और दस वर्षों की संपत्ति बड़ी कुर्सियों की असली कहानी सुनाएगी।
खदानों में कथित लूट हुई तो हिसाब केवल नीचे से नहीं लिया जाएगा। GM कार्यालय से पूछा जाएगा। विजिलेंस से पूछा जाएगा। पर्सनल और वित्त विभाग से पूछा जाएगा। और सबसे अंत में नहीं—सबसे पहले SECL मुख्यालय बिलासपुर से पूछा जाएगा।
“कथित लूट की जड़ खदान में थी या उसका मुकुट मुख्यालय की किसी बड़ी कुर्सी पर रखा था?”
दस्तावेजी पड़ताल जारी… जल्द—दस वर्षों की पदस्थापना, संदिग्ध संपत्ति और कथित संरक्षण की नामवार परतें!
संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
कानूनी एवं संपादकीय टिप्पणी
इस समाचार में खदान, क्षेत्रीय GM कार्यालय और SECL मुख्यालय तक कथित सांठगांठ, संरक्षण, शिकायत दबाने, पदस्थापना बचाने, अवैध वसूली तथा संपत्ति-वृद्धि से संबंधित विवरण आरोपों और जांच की मांग के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। किसी अधिकारी, कर्मचारी, विभाग, कारोबारी अथवा संस्था को दोषी घोषित नहीं किया गया है
लंबी पदस्थापना, उच्च पद अथवा संपत्ति होना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। संपत्ति और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच केवल सक्षम एजेंसी द्वारा लागू कानून और वैधानिक प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। राष्ट्रीय मामलों में गिरफ्तारी तथा विजिलेंस कार्रवाई के विवरण CBI और कोयला मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड पर आधारित हैं; गिरफ्तारी दोषसिद्धि नहीं होती।
SECL तथा संबंधित पक्षों का दस्तावेज-समर्थित उत्तर प्राप्त होने पर उसे निष्पक्षता और प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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