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गेवरा–दीपका की काली खदानों में किस दरवाजे पर पड़ेगी अगली दस्तक?

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₹10 की कथित “कुर्सीवार हिस्सेदारी”, ₹50 तक निजी रेट-कार्ड और VIP–VVIP संरक्षण—फाइलें खुलीं तो कितनी कुर्सियों के नीचे से खिसकेगी जमीन?

 

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सेल्स से शीर्ष प्रबंधन तक पदों पर उठे सवाल; कहीं आधी रात को डिजिटल रिकॉर्ड मिटाने की तैयारी तो नहीं? CIL विजिलेंस, EOW–ACB और CBI से निर्णायक जाँच की मांग

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क गेवरा–दीपका की खदानों में मशीनें अभी सामान्य रूप से चल रही हैं। कोयले से भरे वाहन निकल रहे हैं, कार्यालय खुल रहे हैं और अधिकारी अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे हैं।

लेकिन सूत्रों से सामने आ रहे आरोपों ने एक सवाल हवा में छोड़ दिया है—

अगली सुबह भी सब कुछ सामान्य रहेगा या किसी कार्यालय का ताला जाँच एजेंसी की मौजूदगी में खुलेगा?

किसी कंप्यूटर की हार्ड डिस्क जब्त होगी?

किसी मोबाइल से मिटाए गए संदेश वापस निकाले जाएंगे?

किसी बैंक खाते में प्रति टन का कथित हिसाब दिखाई देगा?

या फिर हर बार की तरह कोई छोटी मछली जाल में डालकर पूरे तालाब को ईमानदार घोषित कर दिया जाएगा?

कोयले की काली धूल के बीच कथित वसूली की जो कहानी उभर रही है, उसमें अब केवल नीचे खड़े किसी कर्मचारी की उंगलियां नहीं, बल्कि कई प्रभावशाली कुर्सियों की छाया दिखाई दे रही है।

खदान SECL की, कोयला देश का—फिर कथित “कमीशन पर्ची” किसकी?

सूत्रों का आरोप है कि कथित वसूली किसी एक व्यक्ति की जेब तक सीमित नहीं रहती। प्रत्येक टन के साथ रकम ऊपर की ओर बढ़ती है और रास्ते में कई कथित हिस्सेदारों की प्यास बुझाती है।

बताई जा रही कथित हिस्सेदारी इस प्रकार है—

बिक्री व्यवस्था से जुड़े स्तर पर—₹2 प्रति टन
– कोलियरी प्रबंधन स्तर पर—₹3 प्रति टन
– उपमहाप्रबंधक स्तर पर—₹2 प्रति टन
– क्षेत्रीय शीर्ष प्रबंधन स्तर पर—₹2 प्रति टन
– नोडल व्यवस्था से जुड़े स्तर पर—₹1 प्रति टन
कुल कथित हिस्सा—₹10 प्रति टन।

यह विवरण फिलहाल सूत्र-आधारित आरोप है। इसकी स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि और सक्षम एजेंसी की जाँच आवश्यक है। लेकिन यदि आरोप का एक अंश भी प्रमाणित हुआ, तो मामला छुटपुट वसूली नहीं, बल्कि कथित रूप से संचालित एक संगठित “कोल कलेक्शन सिंडिकेट” का हो सकता है।

सवाल बड़ा सीधा है—

क्या हर कुर्सी का हिस्सा पहले से तय है और केवल टन की संख्या बदलती है?

₹10 नीचे, ₹20 सुविधा के और “स्टीम” हुआ तो ₹50 तक!

आरोप है कि कथित पदवार हिस्सेदारी के अतिरिक्त कोयला गिरवाने, सुविधानुसार उपलब्ध कराने और उठाव में प्राथमिकता दिलाने का अलग निजी रेट-कार्ड चलाया जा रहा है। किसी से ₹10 प्रति टन, किसी से ₹20 और कथित “स्टीम कोयले” के लिए ₹50 प्रति टन तक लिए जाने की चर्चा है। यदि यह वैधानिक शुल्क है तो SECL उसका आदेश, दर-सूची और रसीद सार्वजनिक करे। और यदि कोई आदेश नहीं, कोई रसीद नहीं तथा पैसा कंपनी के खाते में भी नहीं—तो रकम आखिर किसकी जेब में उतर रही है?

क्या सरकारी कोयले के साथ किसी कथित सिंडिकेट ने अपना निजी “प्रीमियम पैकेज” भी लॉन्च कर दिया है?

“कोयला उपलब्ध नहीं”—लेकिन खास आदमी आया तो खदान में चमत्कार!

सबसे विस्फोटक आरोप कथित विशेष कोयला व्यवस्था को लेकर है। सूत्रों का दावा है कि सामान्य खरीदार को “कोयला उपलब्ध नहीं” बताया जाता है, लेकिन कुछ प्रभावशाली अथवा कथित भुगतान करने वाले लोगों के लिए अचानक व्यवस्था बन जाती है।

फिर कोयला किस स्टॉक से निकलता है?
किस DO में उसका हिसाब बैठाया जाता है?
किस अधिकारी की अनुमति से लोडिंग होती है?
किस वैध खरीदार का हिस्सा प्रभावित होता है?
और इस कथित चमत्कार की कीमत कौन तय करता है?
धरती के नीचे कोयला हो सकता है, लेकिन नियमों के नीचे दबा कथित “विशेष कोयला” आखिर किस कुर्सी के इशारे पर बाहर आता है?
सेल्स कार्यालय है या कथित वसूली का कंट्रोल रूम?

बिक्री व्यवस्था का दायित्व निष्पक्ष आवंटन, वैधानिक भुगतान और पारदर्शी उठाव सुनिश्चित करना है। आरोप इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में इशारा कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार कारोबारी की जरूरत, DO की मात्रा, भुगतान-क्षमता, लोडिंग की जल्दी और कोयले की उपलब्धता जैसी संवेदनशील जानकारी कथित वसूली तंत्र के लिए “रेट तय करने का डेटा” बन सकती है। इसलिए जाँच केवल रकम वसूलने वाले कथित चेहरे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसे उन कुर्सियों तक पहुंचना होगा जहां से जानकारी, अनुमति और संरक्षण मिलने का आरोप है।

क्या कंप्यूटर पर कोयले का हिसाब बनता है या कारोबारी की मजबूरी का भाव तय होता है?
तकनीकी नियम या भुगतान नहीं करने वालों के लिए ब्रेक?

तकनीकी शाखा को सुरक्षा, गुणवत्ता और संचालन संबंधी मानकों की रक्षा करनी होती है। लेकिन आरोप है कि इन्हीं नियमों का चुनिंदा इस्तेमाल दबाव बनाने अथवा विशेष लोगों को रास्ता देने के लिए किया जा सकता है।

जाँच में यह देखा जाना चाहिए—

भुगतान से इनकार करने वाले कारोबारियों के वाहन कितनी देर रोके गए?

– किन खरीदारों की लोडिंग बार-बार बाधित हुई?

– किन लोगों को लगातार प्राथमिकता दी गई?

– तकनीकी आपत्तियां सबके लिए समान थीं या चुनिंदा लोगों के लिए?

– बिक्री और तकनीकी शाखा के बीच कौन-सा असामान्य समन्वय दिखाई देता है?

– किन बाहरी व्यक्तियों को कार्यालय एवं खदान में निर्बाध प्रवेश मिलता रहा?

तकनीकी नियम खदान चलाने के लिए हैं या कथित टैक्स नहीं देने वालों की कमर तोड़ने के लिए?

₹10 छोटा लगता है—लाखों टन पर यही करोड़ों का पहाड़ है प्रति टन ₹1, ₹2 या ₹3 मामूली दिखाई दे सकता है। लेकिन लाखों टन के आगे यही छोटी रकम कथित भ्रष्टाचार का विशाल पहाड़ बन सकती है।

10 लाख टन पर ₹10 की दर—₹1 करोड़
– 50 लाख टन पर—₹5 करोड़
– एक करोड़ टन पर—₹10 करोड़
– पांच करोड़ टन पर—₹50 करोड़

इसके ऊपर यदि ₹10–₹20 का कथित सुविधा शुल्क और ₹50 तक का कथित “स्टीम रेट” जोड़ा जाए, तो संभावित रकम का आकार और भयावह हो सकता है। इसलिए फोरेंसिक ऑडिट में पिछले वर्षों के कुल उठाव, खरीदारवार DO, वास्तविक लोडिंग, ग्रेड, स्टॉक और भुगतान का मिलान अनिवार्य है।

हर टन पर थोड़ा-थोड़ा कथित जहर—और साल के अंत में करोड़ों की काली फसल!
कुर्सियां शांत हैं, लेकिन डिजिटल निशान बेचैन हो सकते हैं
कागज चुप रह सकता है, लेकिन डिजिटल सिस्टम अक्सर बोलता है।

Gate-entry log बताएगा कि कौन-सा वाहन कब पहुंचा।
Weighbridge बताएगा कि उसमें कितना वजन था।
CCTV बताएगा कि कौन अंदर आया।
मोबाइल लोकेशन बताएगी कि कौन किसके संपर्क में था।
UPI और बैंक रिकॉर्ड बताएंगे कि रकम किस रास्ते चली।
डिलीट किए गए संदेश बताएंगे कि मिटाने की जरूरत क्यों पड़ी। CIL विजिलेंस एवं सक्षम एजेंसियों को तत्काल सुरक्षित करना चाहिए

पिछले दो वर्षों के सभी संबंधित DO
– खरीदारवार आवंटन एवं वास्तविक उठाव
– ग्रेडवार स्टॉक रिकॉर्ड
– Gate-entry तथा weighbridge logs
– Loading-point records
– CCTV फुटेज और उसका बैकअप
– अधिकारियों की ड्यूटी एवं लॉगिन हिस्ट्री
– तकनीकी आपत्तियों का रिकॉर्ड
– विशेष आवंटन और अतिरिक्त कोयला देने के आदेश
– संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और डिजिटल संवाद

आज रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं हुए तो कल कोई कह सकता है—“डेटा अपने आप ओवरराइट हो गया।” और तब सवाल उठेगा—

डेटा मिटा था या किसी की गर्दन बचाई गई थी?
VIP–VVIP का नाम—सुरक्षा कवच या डर बेचने की दुकान?

सूत्र कथित नेटवर्क के पीछे VIP–VVIP संरक्षण का दावा किए जाने की बात भी कहते हैं। इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। जाँच को यह स्पष्ट करना होगा कि प्रभावशाली नामों का संरक्षण वास्तव में उपलब्ध था या वसूली करने वाले लोग बड़े नामों का भय बेचकर अपनी दुकान चला रहे थे।

कथित रकम की अंतिम मंजिल कहां थी?

क्या वह स्थानीय स्तर पर बंटी?

क्या कोई हिस्सा ऊपर भेजे जाने का दावा किया गया?

किन नेताओं अथवा अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल हुआ?

और क्या संरक्षण के बदले कोई लाभ पहुंचाया गया?

खदान में वसूली करने वाले हाथ दिखाई दे सकते हैं—लेकिन उनकी डोर किस अंधेरे कमरे से खींची जा रही थी?

BJP हो या कांग्रेस—जनता पूछेगी, जाँच किसके दरवाजे पर रुकी?

प्राप्त प्रतिक्रियाओं में कुछ पाठकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि पूर्व कोल लेवी प्रकरणों में प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, लेकिन कथित भुगतान करने वाले कोल कारोबारियों, वाशरियों, DO धारकों और SECL के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समान गहराई से जाँच नहीं हुई। यह जनप्रतिक्रिया है, प्रमाणित निष्कर्ष नहीं। लेकिन इसका जवाब जाँच एजेंसियों को पारदर्शी कार्रवाई से देना चाहिए।

यदि पैसा लेने वाला अपराधी है, तो जानबूझकर पैसा देकर अवैध लाभ लेने वाले की भूमिका भी क्यों न जाँची जाए?
क्या कानून की तलवार केवल उस गर्दन तक पहुंचती है, जिसे बचाने वाला कोई शक्तिशाली हाथ नहीं होता?
अगली दस्तक किस कुर्सी पर?

अब निगाहें CIL Vigilance, CVC, EOW–ACB और आवश्यकता पड़ने पर CBI जैसी सक्षम एजेंसियों पर हैं।

क्या संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों को जाँच तक हटाया जाएगा?
क्या अचानक निरीक्षण होगा?
क्या मोबाइल और डिजिटल उपकरण सुरक्षित किए जाएंगे?
क्या खातों और संपत्तियों की पड़ताल होगी?
क्या कारोबारियों एवं ट्रांसपोर्टरों के गोपनीय बयान लिए जाएंगे?
क्या कथित भुगतान करने वालों और लेने वालों की श्रृंखला एक साथ जाँची जाएगी?

छापे, गिरफ्तारी या अपराध दर्ज करने का निर्णय केवल सक्षम एजेंसी साक्ष्यों और कानून के आधार पर कर सकती है। लेकिन जाँच में देरी कथित नेटवर्क को रिकॉर्ड बदलने, गवाह प्रभावित करने और धन का रास्ता छिपाने का अवसर अवश्य दे सकती है। छोटी मछली का निलंबन अब पर्याप्त नहीं होगा यदि जाँच केवल किसी लिपिक, ऑपरेटर या निचले कर्मचारी को पकड़कर समाप्त कर दी गई, तो सवाल और गंभीर होंगे।

जाँच को हर कड़ी तक जाना होगा—

किसने रेट तय किया?
किसने मांग पहुंचाई?
किसने रकम इकट्ठी की?
किसने लोडिंग कराई?
किसने स्टॉक का हिसाब बैठाया?
किसने शिकायत दबाई?
और किसने संरक्षण का भरोसा दिया?

एक प्यादा हटाकर शतरंज की पूरी बिसात को पाक-साफ घोषित करने का दौर अब खत्म होना चाहिए। अगली किस्त में खुल सकती हैं और परतें ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की पड़ताल अब कथित पदवार हिस्सेदारी से आगे बढ़ रही है।

जाँच के केंद्र में हैं—

संबंधित पदाधिकारियों के कार्यकाल
– खरीदारवार असामान्य उठाव
– विशेष कोयला व्यवस्था
– बिक्री और तकनीकी शाखा का कथित तालमेल
– संदिग्ध बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही
– डिजिटल संवाद एवं वित्तीय संकेत
– और VIP–VVIP नामों के इस्तेमाल की वास्तविकता

नाम केवल तब प्रकाशित किए जाएंगे, जब उनके साथ दस्तावेज, वित्तीय संकेत, डिजिटल संवाद, प्रत्यक्ष गवाही अथवा स्वतंत्र पुष्टिकारक सामग्री उपलब्ध होगी।

लेकिन इतना तय है

नाम अभी पर्दे में हैं, पद सवालों के घेरे में हैं और डिजिटल निशान अधिक समय तक मौन नहीं रहेंगे। गेवरा–दीपका की खदानों से कोयला निकलता है। आरोप है कि कोयले के साथ एक अदृश्य पर्ची भी बाहर आती है—जिस पर किसी व्यक्ति का नाम नहीं, केवल पद और प्रति टन का कथित भाव दर्ज होता है।

ग्राम यात्रा का सवाल स्पष्ट है—

खदानें SECL चला रहा है या कुर्सीवार हिस्सेदारी पर खड़ा कथित कोल कलेक्शन सिंडिकेट?”
अगली सुबह सामान्य होगी या किसी बंद अलमारी, मोबाइल और कंप्यूटर से खुलेगी करोड़ों की कथित वसूली का रहस्य?

पड़ताल जारी है।
दस्तावेजों का मिलान जारी है।
और कथित हिस्सेदारी की श्रृंखला में शामिल प्रत्येक पद अब सार्वजनिक जवाबदेही के घेरे में है। बने रहिए ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के साथ—क्योंकि कोयले की काली परत के नीचे छिपी पूरी कहानी अभी बाहर आना बाकी है

कानूनी एवं संपादकीय टिप्पणी

इस समाचार में वर्णित पदवार हिस्सेदारी, प्रति टन कथित वसूली, विशेष कोयला व्यवस्था, राजनीतिक अथवा VIP–VVIP संरक्षण तथा संबंधित व्यक्तियों की भूमिका से जुड़े विवरण सूत्रों, प्राप्त प्रतिक्रियाओं और आरोपों पर आधारित हैं। इन्हें न्यायिक अथवा जाँच एजेंसी द्वारा प्रमाणित तथ्य नहीं माना गया है। किसी अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी, राजनीतिक दल अथवा अन्य व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया गया है। अंतिम निष्कर्ष केवल निष्पक्ष जाँच और सक्षम न्यायालय के निर्णय के अधीन होगा। SECL प्रबंधन तथा संबंधित पक्षों का तथ्यात्मक उत्तर प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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