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कोरबा की तिजोरी का हिसाब अब दिल्ली तक—15 साल की FD/FDR पर उठे सवाल!

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नगर निगम की वर्षों पुरानी जमा पूंजी पर बड़ी जांच शिकायत—CAG से केंद्र सरकार, मुख्य सचिव, कलेक्टर, महापौर और आयुक्त तक पहुंची आवाज

 

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सवाल सीधा—2010 से अब तक कितनी FD बनीं, कितनी समय से पहले टूटीं, किसकी मंजूरी से टूटीं और जनता का पैसा आखिर गया कहां?

 

कोरबा।  नगर पालिक निगम कोरबा की तिजोरी से जुड़ा सवाल अब स्थानीय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा।   नगर निगम की 01 अप्रैल 2010 से वर्तमान तक की FD/FDR/TDR/Term Deposit और अन्य निवेश, उनके कथित समयपूर्व नकदीकरण तथा उससे निकली रकम के उपयोग की स्वतंत्र विशेष वित्तीय एवं फॉरेंसिक जांच की मांग वाला विस्तृत अभ्यावेदन देश और प्रदेश के कई महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्राधिकारियों के सामने रखा गया है। शिकायत कहां-कहां पहुंचाई गई?

दस्तावेज़ में मामला सीधे इन प्राधिकारियों के समक्ष उठाया गया है—

 

1. भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), नई दिल्ली
2. प्रधान महालेखाकार (लेखापरीक्षा), छत्तीसगढ़, रायपुर
3. सचिव, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली
4. सचिव, प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग, भारत सरकार
5. मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन
6. प्रमुख सचिव/सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, छत्तीसगढ़
7. संचालक, नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय, छत्तीसगढ़
8. कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी, कोरबा।
9. महापौर, नगर पालिक निगम कोरबा
10. आयुक्त, नगर पालिक निगम कोरबा।

यानी सवाल अब केवल “नगर निगम जवाब दे” का नहीं है।  सवाल यह भी है कि इतने स्तरों पर शिकायत पहुंचने के बाद कौन संस्था सबसे पहले नगर निगम की वित्तीय किताब खोलती है?

15 साल की तिजोरी खोलने की मांग

अभ्यावेदन की मांग बेहद स्पष्ट है—

01 अप्रैल 2010 से वर्तमान तक प्रत्येक बैंक में रखी गई हर FD/FDR/TDR/Term Deposit/Sweep Deposit का पूरा हिसाब निकाला जाए।  सिर्फ निगम के कागजों से नहीं। सीधे बैंकों से स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए।

जांच में सामने आना चाहिए—

 

कितनी रकम जमा हुई?

किस बैंक में जमा हुई?

कितना ब्याज मिला?

FD की maturity कब थी?

वह वास्तव में कब बंद हुई?

क्या maturity से पहले तोड़ी गई?

किस अधिकारी/प्राधिकारी ने अनुमति दी?

रकम किस खाते में आई?

और उसके बाद वह पैसा किसे दिया गया?

FD टूटी… और फिर किसे मिला पैसा? शिकायत का सबसे धारदार बिंदु यहीं है।

मांग की गई है कि FD/FDR बंद होने की तारीख को निगम द्वारा किए गए बड़े Vendor/Contractor भुगतानों से कंप्यूटर आधारित तरीके से मिलाया जाए।

जांच की तीन खिड़कियां प्रस्तावित हैं—

FD टूटने के 0–7 दिन के भीतर,
8–15 दिन के भीतर,
और 16–30 दिन के भीतर

अगर बार-बार कोई ऐसा पैटर्न सामने आता है कि सावधि जमा टूटी और उसके तुरंत बाद किसी Vendor/Contractor को बड़ा भुगतान हुआ, तो संबंधित लेन-देन की अलग गहन जांच की मांग है। यह पैटर्न अपने आप किसी अपराध का प्रमाण नहीं होगा। लेकिन यदि ऐसा पैटर्न मौजूद है तो फिर सवाल बेहद गंभीर होगा—

जनता की वर्षों की बचत तोड़कर किसे भुगतान किया गया और क्यों?”

2023-24, 2024-25 और 2025-26—इन तीन वर्षों की विशेष जांच क्यों?

अभ्यावेदन में इन तीन वित्तीय वर्षों का Special Financial Audit मांगा गया है।

जांच के घेरे में सिर्फ FDR Register नहीं, बल्कि—

Balance Sheet, Cash Book, Bank Book, General Ledger, Trial Balance, Investment Register, Bank Reconciliation Statement, Voucher Register, Vendor Ledger, Outstanding Liabilities और Internal/Pre-Audit Reports तक लाने की मांग की गई है।  अर्थात जांच हुई तो सवाल केवल यह नहीं रहेगा कि “FD कहां है?”

बल्कि यह भी देखा जा सकेगा कि—

FD से निकला पैसा किस खाते, किस वाउचर और किस भुगतान के रास्ते किस अंतिम लाभार्थी तक पहुंचा?”

GeM का भी खुले पूरा हिसाब। शिकायत ने सरकारी खरीद के डिजिटल प्लेटफॉर्म GeM को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की है।

प्रत्येक महत्वपूर्ण खरीद में—

Bid → Approval → Comparative Rate → Order → Supplier → Bill → Material Receipt → Stock Entry → Installation/Use → Payment

तक पूरी श्रृंखला मिलाने की मांग है।  असामान्य लेन-देन सामने आने पर संबंधित GeM Bid/Order ID के आधार पर मूल रिकॉर्ड प्राप्त करने की मांग भी रखी गई है।

कागज पर सड़क बनी तो जमीन पर भी दिखनी चाहिए!  बड़े निर्माण और विकास कार्यों में Administrative Sanction से लेकर Measurement Book, Completion Certificate और Payment Voucher तक मिलाने तथा जरूरत पड़ने पर मौके पर स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराने की मांग की गई है।

मतलब—

फाइल में भुगतान है तो जमीन पर काम भी होना चाहिए।

सबसे संवेदनशील मांग—डिजिटल रिकॉर्ड तुरंत सुरक्षित करो

अभ्यावेदन में जांच शुरू होने से पहले ही निगम के वित्तीय डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित करने की मांग की गई है।

इसमें— Accounting Software Database, User Access Logs, Audit Logs, Voucher Creation/Modification/Deletion Logs, Ledger Modification History, Bank Reconciliation Data, GeM Records, e-Office Files और Backup  शामिल हैं।

भौतिक रिकॉर्ड में  Original FDR Certificates, FDR Register, Bank Statements, Payment Registers, Vouchers, Tender Files, Work Orders, Measurement Books, Stock Registers, Invoice Files और Approval/Note Sheets सुरक्षित करने की मांग है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मांग? क्योंकि वित्तीय जांच में सिर्फ यह जानना महत्वपूर्ण नहीं होता कि आज रिकॉर्ड में क्या लिखा है।

यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि—

किसने रिकॉर्ड बनाया?

कब बनाया?

किसने बदला?

क्या हटाया गया?

और किस User ID से बदलाव हुआ?

यहीं डिजिटल Audit Trail वित्तीय जांच का निर्णायक औजार बन सकता है।  CAG की पुरानी आपत्तियों के बाद नया सवाल। यह पूरा मामला इसलिए और गंभीर दिखाई देता है क्योंकि कोरबा नगर निगम की वित्तीय व्यवस्था पहले भी ऑडिट सवालों से अछूती नहीं रही।

सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट हुई CAG संबंधी जानकारी में कोरबा निगम में एक ठेकेदार को ₹7.88 करोड़ अतिरिक्त भुगतान, कॉलोनाइजरों को अनुचित वित्तीय लाभ और अन्य वित्तीय आपत्तियों का उल्लेख सामने आ चुका है।

दूसरी ओर निगम की CMS बैंक जमा से जुड़े एक अलग मामले में करीब ₹79 लाख के अंतर पर FIR दर्ज होने और बाद में दो आरोपियों की गिरफ्तारी की खबरें भी सामने आई थीं।

इन पुराने मामलों को मौजूदा FD/FDR शिकायत का प्रमाण नहीं माना जा सकता।  लेकिन ये इतना जरूर बताते हैं कि नगर निगम के Bank Reconciliation, Payment Control और Financial Oversight की स्वतंत्र जांच की मांग को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

केंद्रीय पैसा FD में गया था तो दिल्ली तक खुलेगा हिसाब शिकायत में मांग है कि यदि जांचाधीन बैंक खातों अथवा FD/FDR में वित्त आयोग अनुदान, केंद्र प्रायोजित योजना या अन्य केंद्रीय निधि शामिल रही हो तो उसका अलग Fund-wise Audit कराया जाए।

पूरा रास्ता बने—

Central Grant → Bank Account → FD/Investment → Withdrawal → Expenditure → Utilisation Certificate

और यदि केंद्रीय धन निर्धारित उद्देश्य से अलग इस्तेमाल पाया जाता है तो संबंधित भारत सरकार के मंत्रालय/विभाग को रिपोर्ट भेजी जाए।  अब बचने का सबसे आसान रास्ता भी जांच ही है। इस शिकायत की सबसे मजबूत बात यही है कि इसमें किसी व्यक्ति को पहले ही अपराधी घोषित नहीं किया गया है।

बल्कि चुनौती लगभग सीधी है—

 

FD सुरक्षित है—रिकॉर्ड दिखाइए।

FD नियमानुसार टूटी—स्वीकृति दिखाइए।

पैसा विकास में लगा—मनी ट्रेल दिखाइए।

ठेकेदार को भुगतान हुआ—काम दिखाइए।

सब कुछ सही है—स्वतंत्र ऑडिट से साबित कर दीजिए।

लेकिन अगर रिकॉर्ड और बैंक का हिसाब नहीं मिला तो?  यही वह सवाल है जिसका उत्तर अब जांच से ही निकल सकता है।  यदि जांच में अनधिकृत FD नकदीकरण, अनियमित भुगतान, रिकॉर्ड में हेरफेर, अनुचित विक्रेता लाभ, सार्वजनिक धन की क्षति या आपराधिक मिलीभगत के प्रथमदृष्टया तथ्य सामने आते हैं, तो शिकायत में प्रकरण सक्षम जांच एजेंसी को भेजने की मांग भी की गई है।

कोरबा पूछ रहा है—तिजोरी का हिसाब कौन देगा?

नगर निगम आम नागरिक से संपत्तिकर और अन्य बकाया वसूलने के लिए नोटिस और कार्रवाई करता है। अगस्त 2026 में भी बकाया संपत्तिकर और दुकान किराया न चुकाने पर दुकानों को सील करने की कार्रवाई रिपोर्ट हुई है।

तो जनता भी पूछ सकती है

जब नागरिक से एक-एक रुपये का हिसाब लिया जाता है, तो जनता की वर्षों की जमा पूंजी का एक-एक रुपया सार्वजनिक क्यों न हो?”। अब निगाह CAG, प्रधान महालेखाकार, केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ शासन, कलेक्टर और नगर निगम प्रशासन पर है।

  क्योंकि इस विवाद को खत्म करने का सबसे सरल तरीका बयान नहीं—

FDR REGISTER खोलना है।
BANK CONFIRMATION कराना है।
और 2010 से आज तक जनता के एक-एक रुपये की MONEY TRAIL सामने रखना है।

 

तिजोरी सही है तो जांच से डर कैसा?

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। जनता के धन का हिसाब—दस्तावेजों के साथ

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