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112 से 261 परिवार! आखिर बोदई-दलदली की फाइलों में कैसे बढ़ता गया विस्थापन का आंकड़ा?

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2007 की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के बाद 2009 में भारत सरकार की EAC के सामने खुली नई परत—261 आदिवासी परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी BALCO पर बताई गई

अप्रैल 2009 तक सिर्फ 72 परिवार स्थानांतरित, 189 बाकी होने का उल्लेख—मुआवजा और जमीन का पूरा हिसाब भी समिति के सामने नहीं!

 

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विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

कबीरधाम/कोरबा।  बोदई-दलदली की पहाड़ियों से बॉक्साइट निकलता रहा, लेकिन इन पहाड़ियों पर पीढ़ियों से बसे आदिवासी परिवारों के पुनर्वास की कहानी सरकारी और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में लगातार और बड़ी होती दिखाई देती है।

पहली पड़ताल में सामने आया था कि Norway के Government Pension Fund के Council on Ethics की रिपोर्ट में 112 व्यक्तियों की जमीन जाने और उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनमें केवल 50 को मुआवजा मिलने का उल्लेख था।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

2009 आते-आते भारत सरकार की Expert Appraisal Committee के सामने मामला 261 प्रभावित आदिवासी परिवारों के पुनर्वास तक पहुंच चुका था। और यहीं से सवाल और विस्फोटक हो जाता है—

112 से 261 तक कैसे पहुंचा आंकड़ा?

क्या पहले केवल जमीन गंवाने वाले व्यक्तियों की गणना हुई थी और बाद में सभी परियोजना-प्रभावित परिवार शामिल किए गए?

या शुरुआती आकलन में प्रभावित लोगों की पूरी तस्वीर ही सामने नहीं आई थी?

इस अंतर का अंतिम जवाब मूल परिवारवार सरकारी सूची, भूमि अभिलेख और R&R रिकॉर्ड से ही निकलेगा।

 EAC: 261 परिवारों का उचित पुनर्वास BALCO की जिम्मेदारी। 2009 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की Expert Appraisal Committee के सामने BALCO की Bodai-Daldali खदान के विस्तार का प्रस्ताव विचाराधीन था।

उपलब्ध EAC विवरण के अनुसार समिति ने माना कि खदान 2003 से संचालित थी और चार गांवों में पीढ़ियों से रह रहे 261 आदिवासी परिवारों को खनन के दौरान स्थानांतरित किया जाना था, इसलिए उचित Rehabilitation & Resettlement लागू करना BALCO की जिम्मेदारी थी। यानी मामला अब किसी NGO के आरोप तक सीमित नहीं रह गया था।

भारत सरकार की विशेषज्ञ समिति के सामने पुनर्वास स्वयं खदान विस्तार के मूल्यांकन का महत्वपूर्ण विषय बन चुका था।

72 स्थानांतरित… 189 बाकी!

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार EAC की उप-समिति ने स्थल निरीक्षण भी किया।

अप्रैल 2009 तक 72 परिवारों के पुनर्वास स्थलों पर स्थानांतरित होने और 189 परिवारों के अभी पुनर्वासित होना बाकी रहने का उल्लेख मिलता है।

जरा आंकड़ा देखिए—

कुल प्रभावित परिवार — 261

अप्रैल 2009 तक स्थानांतरित — 72

शेष — 189  और EAC ने पुनर्वास की प्रगति को संतोषजनक नहीं माना।

 

 सबसे बड़ा सवाल—पूरा हिसाब समिति को क्यों नहीं मिला?

EAC ने जिन जानकारियों की जरूरत बताई, वे और भी महत्वपूर्ण हैं।

समिति के सामने प्रत्येक परिवार की भूमि कितनी थी, देय मुआवजा कितना था, वास्तव में कितना भुगतान किया गया, कितने परिवार स्थानांतरित हुए, कितनों को भुगतान बाकी था और जिन परिवारों के पास वैध भूमि रिकॉर्ड नहीं थे उनका पुनर्वास किस तरह होना था—इनसे संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी अधूरी बताई गई।

यहीं ग्राम यात्रा का सवाल है—

खनिज का हिसाब था… तो विस्थापित आदिवासी की जमीन का पूरा हिसाब क्यों नहीं?

₹1000 करोड़ मुनाफे का उल्लेख—और सामने सिर्फ 261 परिवार!

EAC विवरण में कंपनी द्वारा एक प्रस्तुति में लगभग ₹1,000 करोड़ वार्षिक शुद्ध लाभ बताए जाने का भी उल्लेख मिलता है। समिति ने इसी संदर्भ में कहा कि इतने संसाधनों वाली कंपनी 261 परिवारों के लिए मानवीय दृष्टिकोण वाली CSR नीति के जरिए समाधान कर सकती है।

इसलिए सवाल सिर्फ पैसे का नहीं था।

सवाल प्राथमिकता का था।

सवाल पुनर्वास की गति का था।

और सबसे बढ़कर—

सवाल उन परिवारों के भविष्य का था जिनकी पुश्तैनी जमीन खनन क्षेत्र में आ रही थी।

 फिर 2010 में कहानी ने लिया नया मोड़

बाद के Council on Ethics आकलन में उल्लेख मिलता है कि अप्रैल 2010 में EAC ने विस्तार की अनुमति दी, जबकि 2009 में पुनर्वास को लेकर गंभीर सवाल सामने आए थे। Council ने यह भी प्रश्न उठाया कि इतने बड़े विस्तार में सार्वजनिक सुनवाई क्यों नहीं हुई।

यही अब अगली सरकारी फाइल खोलने का कारण है—

2009 की आपत्तियों के बाद 2010 तक ऐसा क्या बदल गया कि विस्तार का रास्ता खुला?

क्या सभी शर्तें पूरी हुईं?

क्या 261 परिवारों का पुनर्वास पूरा हो गया?

क्या मुआवजे की परिवारवार सूची जमा हुई?

क्या बिना भूमि-पट्टे वाले बैगा परिवारों को भी अधिकार मिला?

और यदि नहीं—

तो अनुमति किन शर्तों पर दी गई?

 

कंपनी का पक्ष भी रिकॉर्ड पर
निष्पक्षता के लिए BALCO/Vedanta का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।

Vedanta ने बाद में Council के आकलन से असहमति जताई। कंपनी का कहना था कि विस्थापन स्वैच्छिक था और परिवारों की पसंद के स्थानों पर पुनर्वास किया गया। कंपनी ने जमीन के लिए ₹1 लाख प्रति एकड़ की मुआवजा दर का भी दावा किया।  लेकिन इसी कारण आज सरकारी रिकॉर्ड खोलना और जरूरी हो जाता है।

क्योंकि एक तरफ कंपनी कहती है—

स्वैच्छिक पुनर्वास।
दूसरी तरफ EAC के रिकॉर्ड में 261 परिवारों के पुनर्वास की धीमी प्रगति पर चिंता दिखाई देती है।
तो सच किस फाइल में बंद है?

करीब दो दशक बाद आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि नामवार और परिवारवार हिसाब सामने आना चाहिए।

कौन थे वे 261 परिवार?

किसकी कितनी जमीन गई?

किसको कितना भुगतान हुआ?

किसे कृषि भूमि मिली?

किसे मकान मिला?

जिनके पास राजस्व पट्टा नहीं था, उन बैगा परिवारों का क्या हुआ?

और सबसे महत्वपूर्ण—

आज वे परिवार कहां और किस हालत में हैं?

2012 की एक जमीनी रिपोर्ट ने भी दावा किया था कि कंपनी के रिकॉर्ड के 261 परिवारों में से 182 परिवारों का 2010 तक पुनर्वास किया गया था, जिससे शेष परिवारों की स्थिति पर सवाल बने रहे।

 अब ग्राम यात्रा फाइल से जमीन तक पहुंचेगा इस मामले की निर्णायक पत्रकारिता अब पुराने आरोप दोहराने से नहीं होगी।

261 परिवारों की मूल सूची + मुआवजा भुगतान रजिस्टर + पुनर्वास स्थल + राजस्व रिकॉर्ड + पर्यावरण स्वीकृति की शर्तें + आज की भौतिक स्थिति—। इन छह बिंदुओं को जोड़ने पर ही बोदई-दलदली की पूरी कहानी सामने आएगी।  पहाड़ से बॉक्साइट निकालने का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है… तो 261 आदिवासी परिवारों के पुनर्वास का पूरा रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क BALCO–Vedanta तथा संबंधित राज्य एवं केंद्रीय विभागों का पक्ष आमंत्रित करता है। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड अथवा कंपनी दस्तावेजों से यदि इन पुराने आंकड़ों की स्थिति बाद में बदली हो, तो उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

अगली कड़ी

“261 परिवारों की LIST कहां है?”

नाम-दर-नाम खोजेंगे—किसकी कितनी जमीन गई, किसे कितना मुआवजा मिला और आज कहां हैं बोदई-दलदली के विस्थापित बैगा परिवार?

विशेष खोजी श्रृंखला | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

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