13/04/2026

सार्वजनिक सड़क पर ‘कब्जा राज’ ! बालको-वेदांता ने बंद किया आम रास्ता , प्रशासन बना मूकदर्शक… हादसों में जा रही जानें

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कोरबा | ग्राम यात्रा विशेष

कोरबा में एक बार फिर “पावर बनाम जनता” की जंग खुलकर सामने आ गई है । मामला है परसाभाटा चौक से अमरनाथ होटल तक जाने वाले उस सार्वजनिक मार्ग का , जिसे कभी आम जनता की सुविधा के लिए बनाया गया था , लेकिन आज वही सड़क एक निजी कंपनी के कब्जे की कहानी बन चुकी है । सवाल सिर्फ सड़क का नहीं है , सवाल है सिस्टम की नीयत , प्रशासन की चुप्पी और जनता की सुरक्षा का ।

सड़क या निजी साम्राज्य ?

जिस सड़क को विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण और बाद में नगर निगम कोरबा ने जनता की आवाजाही के लिए विकसित किया , आज उसी पर बालको वेदांता प्रबंधन ने अपने अधिकार जैसा व्यवहार करते हुए बेरहमी से ताला जड़ दिया है । बिना किसी सक्षम अनुमति के रास्ता बंद कर दिया गया और कंक्रीट की दीवार खड़ी कर उसे निजी मार्ग में तब्दील कर दिया गया ।

यह सिर्फ अतिक्रमण नहीं है , यह सीधे-सीधे कानून और जनता दोनों को चुनौती है ।

2013 में टूटी थी दीवार , फिर किसके इशारे पर लौटा कब्जा ?

इतिहास भी इस मामले में गवाही दे रहा है । वर्ष 2013 में तत्कालीन निगम आयुक्त आर . एक्का ने इसी स्थान पर खड़ी की जा रही अवैध दीवार को हटाकर आम रास्ते को बहाल किया था । यानी प्रशासन ने खुद माना था कि यह रास्ता जनता का है ।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि 2016-17 के बीच फिर से वही खेल खेला गया । रास्ता फिर बंद हुआ , दीवार फिर खड़ी हुई और कब्जा फिर स्थापित हो गया ।

सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या जब एक बार अवैध साबित हो चुका था , तो दोबारा यह कब्जा कैसे हो गया ?
किसकी शह पर यह दुस्साहस हुआ ?

दीवार खड़ी… और प्रशासन की नीयत ढही

अमरनाथ होटल के पास खड़ी की गई कंक्रीट की दीवार सिर्फ ईंट और सीमेंट की नहीं है , यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमजोरी का प्रतीक बन चुकी है ।

नगर निगम ने नोटिस भी जारी किया , लेकिन वह नोटिस भी शायद फाइलों में दम तोड़ चुका है । न कोई कार्रवाई , न कोई जवाबदेही ।

क्या नोटिस देना सिर्फ खानापूर्ति है ?
क्या बड़ी कंपनियों के सामने नियम कानून सिर्फ दिखावा बनकर रह गए हैं ?

रास्ता बंद… मौत का रास्ता खुला

इस अवैध कब्जे का सबसे खतरनाक पहलू है आम जनता की जान पर बन आई आफत ।

अब लोगों को मजबूरी में बेलगिरी नाला के पास से रिंग रोड का उपयोग करना पड़ रहा है , जहां भारी ट्रेलरों का लगातार आवागमन होता है । यही ट्रेलर अब “चलती फिरती मौत” बन चुके हैं ।

स्थानीय लोगों के अनुसार —
सैकड़ों दुर्घटनाएं हो चुकी हैं ।
कई निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है ।

हर हादसे के बाद वही पुराना बयान — “जांच होगी”… लेकिन जमीन पर न सड़क खुली , न कब्जा हटा ।

कानून भी बेबस या जानबूझकर अंधा ?

इस पूरे मामले में कानून भी साफ-साफ रास्ता दिखाता है ।

छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम , 1956 की धारा 305 , 307 और 322 साफ कहती हैं कि सार्वजनिक मार्ग पर अतिक्रमण हटाना अनिवार्य है ।

वहीं छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता , 1959 की धारा 248 के तहत एसडीएम और तहसीलदार को सीधे अतिक्रमण हटाने की शक्ति दी गई है ।

लेकिन सवाल वही —
जब कानून मौजूद है , तो कार्रवाई क्यों नहीं ?
क्या कानून सिर्फ आम लोगों के लिए है ?

कंपनी बड़ी या जनता की जान ?

यह पूरा मामला अब सिर्फ एक सड़क का नहीं रहा , यह “कॉर्पोरेट ताकत बनाम आम नागरिक” की लड़ाई बन चुका है ।

क्या एक कंपनी इतनी ताकतवर हो सकती है कि वह सार्वजनिक सड़क को अपने कब्जे में ले ले और प्रशासन चुपचाप देखता रहे ?

अगर आज सड़क गई है , तो कल क्या मोहल्ले भी घेर लिए जाएंगे ?

जनता का गुस्सा… और सिस्टम की खामोशी

स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है । कई बार शिकायतें दी गईं , नोटिस जारी हुए , लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई ।

जनता पूछ रही है —
क्या हमें सुरक्षित रास्ता मिलना भी अब एक संघर्ष बन गया है ?
क्या जान की कीमत सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रह गई है ?

अब भी नहीं चेते तो…

यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक फाइल का हिस्सा नहीं रह गया है । अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई , तो यह मुद्दा बड़े आंदोलन और न्यायालय तक पहुंच सकता है ।

जनता अब चुप बैठने के मूड में नहीं है ।

ग्राम यात्रा का सवाल

क्या कोरबा में कानून जिंदा है या सिर्फ कागजों में ?
क्या प्रशासन आम जनता के लिए है या सिर्फ ताकतवरों के लिए ?
कब खुलेगा वह रास्ता , जो जनता का हक है ?

परसाभाटा से अमरनाथ होटल तक की यह सड़क अब सिर्फ एक रास्ता नहीं रही , यह “न्याय बनाम कब्जा” की जंग बन चुकी है ।

अगर प्रशासन ने अब भी आंखें बंद रखीं , तो यह सिर्फ एक सड़क का नुकसान नहीं होगा , बल्कि सिस्टम पर जनता का भरोसा भी टूट जाएगा ।

 
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