अपराधराज्य एव शहररोचक तथ्य

आत्मनिर्भर भारत की बात ऊपर, नीचे नियमों की धज्जियाँ ? अनिल अग्रवाल की वेदांता पर सवाल, बालको में सीईओ राजेश कुमार के राज में दो नोटिस के बाद भी जारी अवैध बाउंड्रीवाल

कोरबा। वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल मंचों से आत्मनिर्भर भारत, पारदर्शिता और नियमों के पालन की बात करते हैं। लेकिन कोरबा के बालको में जमीनी तस्वीर अलग नजर आ रही है। यहां सीईओ राजेश कुमार और प्रशासनिक प्रमुख कैप्टन धनंजय मिश्रा के कार्यकाल में बिना अनुमति बाउंड्रीवाल निर्माण नगर पालिक निगम के दो-दो नोटिसों के बावजूद जारी है। सवाल उठ रहा है—क्या स्थानीय प्रबंधन खुद को कानून से ऊपर समझ रहा है ?

नगर पालिक निगम ने 2 फरवरी और 3 फरवरी 2026 को नोटिस जारी कर स्पष्ट किया था कि बेलाकछार नदी किनारे, सेक्टर-01 और नेहरू नगर क्षेत्र में किया जा रहा निर्माण छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 293, 302 और 307 का उल्लंघन है। निर्माण रोकने, दस्तावेज प्रस्तुत करने और ऑनलाइन अनुमति लेने के निर्देश दिए गए थे। कार्रवाई और खर्च वसूली की चेतावनी भी दर्ज थी।

लेकिन 10 फरवरी को मौके पर स्थिति अलग ही कहानी कह रही थी। मजदूर काम करते मिले, मशीनें चलती रहीं और बाउंड्रीवाल की लंबाई बढ़ती दिखाई दी। यानी नोटिस अपनी जगह, निर्माण अपनी रफ्तार से।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह काम लगभग दो महीने से चल रहा है। अगर अनुमति नहीं थी तो काम शुरू कैसे हुआ ? और अगर अनुमति है तो सार्वजनिक क्यों नहीं की गई ?

मामला सिर्फ कागजी अनुमति का नहीं है। जिस नदी किनारे रास्ते से दोन्द्रो बेला के ग्रामीण वर्षों से बालको नगर और कोरबा शहर आते-जाते थे, वही रास्ता अब बाउंड्रीवाल से बाधित हो चुका है। ग्रामीणों को कई किलोमीटर घूमकर जाना पड़ रहा है। एक ग्रामीण ने कहा, “पहले सीधे पहुंच जाते थे, अब बेवजह लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है।”

निर्माण कार्य हेमस कॉर्पोरेशन को दिया गया है। क्षेत्र में चर्चा है कि ठेके की प्रक्रिया और अनुमति दोनों पर सवाल खड़े हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल नगर पालिक निगम और जिला प्रशासन पर है। दो नोटिस के बाद भी अगर काम जारी है तो क्या धारा 307 के तहत वास्तविक कार्रवाई होगी ? या मामला सिर्फ नोटिस तक सीमित रहेगा ?

शहर में चर्चा तेज है—अगर कोई आम नागरिक बिना अनुमति छोटा सा निर्माण कर दे तो तत्काल कार्रवाई होती है। लेकिन जब मामला बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान का हो तो क्या नियमों की धार कमजोर पड़ जाती है ?

फिलहाल हकीकत यही है—चेतावनी जारी, धाराएं लागू, लेकिन दीवार लगातार ऊंची। अब देखना यह है कि कानून मजबूत साबित होगा या मनमानी ?

 
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