कोरबा दीपावली धमाका सफाई के ठेकों में ‘30% कमीशन’ का आरोप: सात जोनों के औसत पर ₹3.78 करोड़ सालाना का सवाल—आयुक्त आशुतोष पांडेय हिसाब खोलें

एक जोन के ₹15 लाख के औसत मासिक बिल पर ₹4.50 लाख कथित वसूली; सातों जोनों में समान औसत मानने पर ₹31.50 लाख प्रतिमाह—दीपावली के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगने और भुगतान रोकने का भी आरोप
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क शहर की गंदगी साफ करने के ठेकों में भी कथित कमीशनखोरी! नगर पालिक निगम कोरबा की सफाई व्यवस्था पर सामने आए आरोपों ने आयुक्त आशुतोष पांडेय और संबंधित अधिकारियों की कार्यशैली, वित्तीय निगरानी तथा भुगतान प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि निगम के सभी जोनों में सफाई ठेकेदारों से उनके बिल की लगभग 30 प्रतिशत राशि अवैध कमीशन के रूप में ली जाती है। प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, ₹15 लाख का औसत मासिक बिल एक जोन का उदाहरण है। उस पर कथित कमीशन ₹4.50 लाख बैठता है।
यदि सातों जोनों में बिल का यही औसत और कथित कमीशन का यही अनुपात पूरे वर्ष लागू रहा हो तो गणना ₹31.50 लाख प्रतिमाह और ₹3.78 करोड़ सालाना होती है। यह वास्तविक वसूली का प्रमाणित आंकड़ा नहीं है; वास्तविक राशि प्रत्येक जोन के बिलों और संबंधित अवधि के मिलान से निर्धारित होगी।
एक जोन से सात जोन तक—आरोप का आर्थिक पैमाना
विवरण| एक जोन| सात जोन मिलाकर
माना गया औसत मासिक सफाई बिल| ₹15 लाख| ₹1.05 करोड़
कथित 30% कमीशन की मासिक गणना| ₹4.50 लाख| ₹31.50 लाख
इसी आधार पर वार्षिक बिल| ₹1.80 करोड़| ₹12.60 करोड़
इसी आधार पर वार्षिक कथित कमीशन| ₹54 लाख| ₹3.78 करोड़
इस गणना में दीपावली के नाम पर कथित अतिरिक्त मांग शामिल नहीं है। पर्चियों में मदवार प्रतिशत—भुगतान की हर टेबल का परीक्षण जरूरी उपलब्ध हस्तलिखित पर्चियों और उनके संबंध में दिए गए स्पष्टीकरण का संपादित सार नीचे प्रस्तुत है। यह कथित बंटवारे का विवरण है, प्रमाणित भुगतान रिकॉर्ड नहीं।
क्रम| कथित मद/पदनाम संबंधी उल्लेख| प्रतिशत
1| एग्रीमेंट—आयुक्त संबंधी आरोप| 6%
2| स्वास्थ्य अधिकारी संबंधी उल्लेख| 4%
3| सेक्शन बाबू| 2%
4| अकाउंट ऑफिसर| 1%
5| अकाउंट सेक्शन एवं चेक सेक्शन संबंधी उल्लेख| 3%
6| चेक जारी करने संबंधी मद—आयुक्त का उल्लेख| 5%
7| सेनेटरी इंस्पेक्टर संबंधी उल्लेख| 3%
8| ऑडिट, बाबू तथा अन्य प्रशासनिक एवं सफाई निगरानी पदों का समूह; कुछ शब्द अस्पष्ट| 5%
9| विविध खर्च—बाद में दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार| 1%
| कथित कुल| 30%
पर्चियों में अलग-अलग दर्ज प्रतिशतों का जोड़ 29 प्रतिशत है; शेष एक प्रतिशत बाद के स्पष्टीकरण में ‘विविध खर्च’ बताया गया है। लेखक, अस्पष्ट पदनामों और वास्तविक लेनदेन से इन प्रविष्टियों के संबंध का स्वतंत्र सत्यापन शेष है। किसी पदनाम के सामने प्रतिशत लिखा होना उस पदाधिकारी द्वारा रकम लेने का स्वतः प्रमाण नहीं है। लेकिन इन आरोपों की गंभीरता भुगतान की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक बनाती है—किस स्तर पर क्या जिम्मेदारी थी, किसने सत्यापन किया और किस अनुमोदन से भुगतान हुआ?
सफाईकर्मी से पूरा काम, भुगतान की टेबल से पूरा हिसाब
सफाई के बजट से मजदूरी, वाहन, ईंधन, उपकरण और कचरा उठाव का खर्च चलता है। कथित अवैध हिस्सेदारी प्रमाणित होने पर यह भी जांचना होगा कि उसका असर श्रमिकों, संसाधनों और वास्तविक सफाई पर कितना पड़ा। सड़क पर झाड़ू लगाने वाले कर्मचारी से हर कोना साफ रखने की अपेक्षा है। सार्वजनिक धन स्वीकृत करने वाली प्रत्येक टेबल से हर रुपये का हिसाब भी मांगा जाएगा।
कथित कमीशन के ऊपर दीपावली की ‘मिठाई’
प्रस्तुत जानकारी में आरोप है कि नियमित कथित कमीशन के अतिरिक्त कुछ ठेकेदारों से दीपावली के नाम पर ₹2 लाख मांगे गए। रकम देने वालों के बिल पास होने और नहीं देने वालों का भुगतान रोकने का भी दावा है। यदि यह प्रमाणित होता है तो सरकारी भुगतान को कथित वसूली के दबाव में बदलने का गंभीर मामला होगा। ठेकेदार का नियमानुसार देय भुगतान किसी अधिकारी की निजी मेहरबानी नहीं है। अतिरिक्त मांग की रकम पर पहली पर्ची में ₹5 लाख और साझा विवरण में ₹2 लाख का उल्लेख है। इस अंतर का समाधान मूल लेखक और संबंधित साक्ष्यों के परीक्षण से होना चाहिए।
आयुक्त आशुतोष पांडेय की जवाबदेही अभिलेखों से तय हो
किस ठेकेदार का बिल कब प्रस्तुत हुआ? किसने काम सत्यापित किया? किसने आपत्ति लगाई? भुगतान किस स्तर पर रुका और किसने स्वीकृत किया? पूरा तारीखवार विवरण सामने आए। काम अधूरा था तो निरीक्षण रिपोर्ट दिखाई जाए। दस्तावेज कम थे तो लिखित आपत्ति सार्वजनिक हो। भुगतान योग्य बिल लंबित था तो देरी का कारण और जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट हो। फाइल रोकने का अधिकार है तो उसका कारण दर्ज करने और बताने की जिम्मेदारी भी है। आयुक्त सहित संबंधित अधिकारियों की भूमिका उनके निर्देशों, अनुमोदनों, निरीक्षण और भुगतान निर्णयों के आधार पर निर्धारित की जाए। पौधा खरीदी, ठेकों और अन्य वित्तीय निर्णयों पर मुख्य सचिव को संबोधित अभ्यावेदन में भी जांच मांगी गई है। सफाई ठेकों के इन आरोपों का अलग, जोनवार और ठेकेदारवार परीक्षण आवश्यक है।
क्या यही सुशासन है? सरकार खुले हिसाब से जवाब दे
सुशासन की विश्वसनीयता सार्वजनिक धन की पारदर्शिता से तय होती है। मूल फाइलें, ई-नोटशीट, बिल रजिस्टर और भुगतान रिकॉर्ड सुरक्षित कर निगम से स्वतंत्र जांच कराई जाए। ठेकेदारों के बयान बिना दबाव दर्ज हों और संबंधित अधिकारियों को जवाब देने का अवसर मिले। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग स्पष्ट है—सातों जोनों के पूरे वर्ष के सफाई बिलों का हिसाब खोलिए। आरोप गलत हों तो कारण सहित निष्कर्ष सार्वजनिक कीजिए; प्रमाण मिलें तो पद और प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई कीजिए। कोरबा को साफ सड़कें भी चाहिए और साफ हिसाब भी। सफाई के पैसे पर उठे सवालों का जवाब अब रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों से मिलना चाहिए।
₹3.78 करोड़ समान मासिक औसत को सात जोनों और 12 महीनों पर लागू करने की गणना है, प्रमाणित वसूली नहीं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का उत्तर शेष है।
Live Cricket Info
