नगर निगम की महिमा अपरम्पार! दीवार 190 मीटर, मिट्टी–खाद 4,420 मीटर—सरकारी कलम का यह ‘चमत्कार’ किसकी निगरानी में?

₹21.40 लाख के डिवाइडर अनुमान में ₹11.03 लाख सिर्फ मिट्टी–खाद के लिए! ठेकेदार से पहले अनुमान बनाने, जांचने और स्वीकृति देने वाले अधिकारी जवाब दें—इतना बड़ा माप-अंतर कैसे आया?
कोरबा। नगर निगम कोरबा के डिवाइडर निर्माण का अनुमान देखकर सवाल उठता है—यहां इंजीनियरिंग के नियम चलते हैं या सरकारी कागज पर लिख दिया गया हर आंकड़ा अपने आप सत्य मान लिया जाता है? एम.पी. चौक से जैन मंदिर तक डिवाइडर निर्माण के साझा अनुमान में आरसीसी दीवारों की लंबाई 190 मीटर है। लेकिन मिट्टी और गोबर खाद का हिसाब आते ही लंबाई 4,420 मीटर हो जाती है। दीवार वहीं खड़ी रही, लेकिन भराव का हिसाब 23 गुना से अधिक लंबा हो गया! यह विस्तार जमीन पर है या सिर्फ अनुमान की पंक्तियों में—निगम के जिम्मेदार अधिकारी बताएं। ठेकेदार का हिसाब बाद में आएगा। पहला जवाब उस सरकारी तंत्र से चाहिए, जिसने अनुमान बनाया, उसकी जांच की और स्वीकृति दी।
कागज पर इतनी लंबाई बढ़ी—जांच करने वालों को क्या दिखाई दिया?
सिस्टम टेंडर नंबर 183605, सूचना क्रमांक 360/2025, दिनांक 09 जनवरी 2026 से संबंधित साझा विवरण में कार्य की अनुमानित लागत ₹21.40 लाख है। इसमें मिट्टी के लिए ₹8,52,883.20 और गोबर खाद के लिए ₹2,50,348.80—कुल ₹11,03,232 का प्रावधान है। यानी अनुमान की आधे से अधिक रकम इन्हीं दो मदों में। यदि भराव भी 190 मीटर में होना था और बाकी माप एवं दरें वही रहें, तो लागत ₹47,424 होती है। दोनों हिसाबों का अंतर ₹10,55,808 है। यह अभी सिद्ध नुकसान नहीं है। लेकिन ₹10.56 लाख के सशर्त गणना-अंतर पर तकनीकी आधार मांगना कोई एहसान नहीं—जवाबदेही की न्यूनतम शर्त है।
यदि 4,420 मीटर सही है, तो उसका स्वीकृत नक्शा सामने रखिए। यदि गलत है, तो बताइए कि उसे पकड़ने के लिए नियुक्त अधिकारियों ने क्या जांचा?
मुहर लगाने से पहले माप देखा था या केवल फाइल आगे बढ़ाई?
निगम प्रशासन स्पष्ट करे—
अनुमान किसने बनाया?
किस अभियंता ने मात्रा जांची?
किस अधिकारी ने तकनीकी स्वीकृति दी?
क्या स्वीकृति से पहले स्थल निरीक्षण हुआ?
यदि मिट्टी–खाद अलग क्षेत्र में डाली जानी थी, तो उस क्षेत्र का विवरण अनुमान में स्पष्ट क्यों नहीं है?
यदि टंकण की गलती थी, तो संशोधित अनुमान और शुद्धिपत्र कहां हैं?
सरकारी स्वीकृति सजावटी हस्ताक्षर नहीं है। उसके पीछे जनता के पैसे की जिम्मेदारी होती है। इतनी बड़ी विसंगति का समाधान किए बिना फाइल आगे बढ़ी हो तो यह गंभीर लापरवाही का प्रश्न है। यदि जांच में जानबूझकर मात्रा बढ़ाने या अनुचित लाभ पहुंचाने के प्रमाण मिलें, तो मामला भ्रष्टाचार और संरक्षण की जांच तक जाना चाहिए।
भ्रष्टाचार के संरक्षण का सवाल फाइलों से खुलेगा
यदि मात्रा गलत थी, तो उसे स्वीकृति तक पहुंचने देने वाला कौन था? यदि आपत्ति दर्ज हुई थी, तो उसे किसने दरकिनार किया? यदि सुधार हुआ, तो संशोधित दस्तावेज कहां हैं?
यही वे प्रश्न हैं जिनसे तय होगा कि मामला तकनीकी भूल है, निगरानी की विफलता है या किसी को लाभ पहुंचाने का प्रयास। बिना प्रमाण किसी को भ्रष्ट घोषित करना उचित नहीं। लेकिन जांच योग्य अंतर को “कागजी गलती” कहकर दफन कर देना भी जनता के साथ न्याय नहीं होगा। नगर निगम को आरोपों से बाहर निकलना है तो फाइल खोलनी होगी। पद की कुर्सी जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं बन सकती।
जनता पैसा दे और अधिकारी अस्पष्ट हिसाब पेश करें?
खुदाई की चौड़ाई 1.50 मीटर, मिट्टी भराव की चौड़ाई 1.60 मीटर और दीवारों के माप का आपसी संबंध भी तकनीकी स्पष्टीकरण मांगता है। दीवार एवं शटरिंग में एक मीटर ऊंचाई, जबकि पुट्टी–पेंट में 1.20 मीटर का आधार बताया गया है। मिट्टी एवं खाद की मदों में भुगतान कटौती की शर्तें हैं, लेकिन साझा गणना में उनका अलग प्रभाव स्पष्ट नहीं है। हर बिंदु का उत्तर संभव हो सकता है। मगर उत्तर दस्तावेज देगा—कुर्सी का रुतबा नहीं।
ठेकेदार का नाम बाद में—सरकारी जिम्मेदारी पहले
इस कार्य से श्याम बाबा कंस्ट्रक्शन का नाम बताया गया है, लेकिन प्रमाणित कार्यादेश एवं भुगतान रिकॉर्ड की पुष्टि अभी नहीं हुई है। ठेकेदार ने क्या किया, उसका परीक्षण कार्यादेश, वास्तविक माप और बिल से होगा। लेकिन सरकारी अनुमान का आधार बताने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की है। निगम अपने अनुमान की गलती ठेकेदार के पीछे छिपाकर नहीं बच सकता। पहले यह स्पष्ट हो कि स्वीकृत मात्रा सही थी या नहीं; उसके बाद निष्पादन और भुगतान की जांच हो।
सुशासन की साख पर सवाल—जवाब अधिकारियों को देना होगा सुशासन का दावा तभी विश्वसनीय होगा जब सरकारी खर्च की फाइलें भी जवाब देने योग्य हों। अस्पष्ट माप और अपारदर्शी स्वीकृति से जनता का भरोसा कमजोर होता है।
क्या जिम्मेदार अधिकारी अपने काम से सरकार की साख पर सवाल खड़े कर रहे हैं?
किसी राजनीतिक साजिश का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन जवाबदेही से बचने की हर कोशिश सुशासन के दावे को खोखला कर सकती है। सरकार को भी देखना होगा कि उसके नाम पर स्वीकृत खर्च का तकनीकी परीक्षण कितना गंभीर है।
जांच उन्हीं हाथों से क्यों, जिनकी स्वीकृति सवालों में है?
इस अनुमान की जांच ऐसी स्वतंत्र तकनीकी टीम से हो जो मूल अनुमान तैयार करने और स्वीकृति देने की प्रक्रिया में शामिल न रही हो। स्वीकृत नक्शा, तकनीकी स्वीकृति, संशोधित अनुमान, निविदा परिणाम, कार्यादेश, माप पुस्तिका और भुगतान रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं। विवादित मदों का भुगतान लंबित हो तो सत्यापन के बाद ही भुगतान हो। भुगतान हो चुका हो तो वास्तविक मात्रा से मिलान किया जाए। गलत मात्रा या अधिक भुगतान प्रमाणित होने पर वसूली तथा संबंधित अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका के अनुसार कार्रवाई हो। जानबूझकर हेराफेरी के प्रमाण मिलने पर सक्षम जांच एजेंसी को मामला सौंपा जाए।
कोरबा की जनता को आश्वासन की खाद नहीं चाहिए। उसे मिट्टी–खाद के ₹11.03 लाख का प्रमाणित हिसाब चाहिए।
190 मीटर से 4,420 मीटर तक पहुंची सरकारी गणना का रास्ता दिखाइए—और उस रास्ते पर लगी हर स्वीकृति की जिम्मेदारी तय कीजिए।
संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
तथ्य-स्पष्टीकरण: रिपोर्ट साझा दस्तावेजीय विवरण पर आधारित है। ₹10.56 लाख समान माप एवं दरों पर 190 मीटर की सशर्त तुलना का अंतर है; सिद्ध अधिक भुगतान नहीं। भ्रष्टाचार, संरक्षण अथवा अनुचित लाभ का निष्कर्ष मूल अभिलेखों, वास्तविक कार्य और भुगतान की जांच से ही निकलेगा। संबंधित अधिकारियों एवं फर्म का पक्ष प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा।
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