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हाल-ए-कोरबा:अंधेरी नगरी-चौपट राजा,घोटाला LED या मरम्मत में…!

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चाम्पा से कोरबा-कटघोरा-पाली से लेकर जिले में चौतरफ़ा मुख्य और व्यस्त सड़कें अंधेरे में


विकास की गंगा में नहीं नहा पा रही सड़क रौशनी की कुव्यवस्था

कोरबा। छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला यूं तो दूसरों को रोशन कर रहा है पर खुद ही काफी जगह अंधेरे में रहता है। पैसे की कमी नहीं लेकिन खर्च किस तरह से करना है इसकी दूरदर्शिता का अभाव जिम्मेदार लोगों में है। कमीशनखोरी की मार वाली अंधेरी नगरी में व्यवस्था बनाने वाला राजा ही चौपट हो तो फिर आम पब्लिक को टैक्स पटाने के बाद भी अंधेरी राहों से ही गुजरना होगा।

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समस्या कोई एकाएक उत्पन्न होने वाली या नई नवेली नहीं है बल्कि यह महीनो-वर्षों से चली आ रही है लेकिन समाधान करने का जिनके पास अधिकार है, उसे शायद सड़क पर उतरकर व्यवस्थाओं को सुधारने की फुर्सत नहीं है।

कोरबा कद्दावर नेताओं का जिला और क्षेत्र है, वर्तमान में ट्रिपल इंजन की सरकार में कोरबा को नजराने मिले हैं और खुद उप मुख्यमंत्री यहां के प्रभारी मंत्री हैं। विकास के दावों और वादों का दम भरने वाले बहुतेरे फोटो व सोशल मीडियाबाज नेता है लेकिन इस सबका लाभ कोरबा की जनता को नहीं मिल पा रहा है। अभी नवरात्रि का त्यौहार शुरू हो चुका है, दशहरा के साथ यह भी अंधेरे में बीत जाएगा। शहर हो या आऊटर, प्रवेश हो या निकास या फिर आंतरिक इलाके क्षेत्र की अधिकांश सड़कें अंधेरे में ही लोगों को रास्ता दिखाती आ रही हैं, आऊटर की तो बात ही छोड़ दें। आलम यह है कि दुकानों और मकानों की रौशनी से अनेक सड़कें रोशन हो रही हैं। शटर गिरा कि अंधेरा कायम…!

 

शहर से लेकर चौतरफा यही आलम अंधेरा-अंधेरा और सिर्फ अंधेरा नजर आता है। पीडब्ल्यूडी, पीएमजीएसवाय, फोरलेन हो या हाइवे या फिर सीसी रोड, शहर हो या गाँव, सब तरफ हर सड़क रोशनी का हाल बदहाल है।
इन रास्तों से गुजरने वाले अंधेरी सड़कों से किस तरह आना-जाना करते हैं, यह तकलीफ वही समझ सकते हैं जिनका वास्ता पड़ता है। अनगिनत गड्ढों वाली अंधेरी सड़कें न जाने कब किसके लिए जानलेवा साबित हो जाएं..!
अंधेरी सड़कों के कोढ़ में खाज रूपी इन गड्ढों में सिर्फ वाहनों की चाल बदलती है, हादसे होते-होते रह जाते हैं लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि सब कुछ देख और जानकर भी कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं बनाई जाती।

 

 

यह कहने में कोई संदेह नहीं कि नगरीय निकायों से लेकर पंचायतों में या तो एलईडी का घोटाला हो रहा है या फिर मरम्मत के नाम पर बड़ा खेल खेला जा रहा है, वरना ऐसी कौन सी वजह है कि लगाई गई स्ट्रीट लाईटें कुछ ही महीने कुछ हफ्ते में ही खराब हो जाती हैं, पीली हो जाती हैं, रौशनी मद्धम पड़ जाती हैं। फिर उन्हें महीनों तक बदला नहीं जाता। कारण, एलईडी बल्ब का न होना, बजट का न होना, शासन से फंड न मिलना आदि-आदि कई कारण सुनने को मिलते हैं।

 

इसी तरह मुख्य सड़क से लेकर आंतरिक मार्गों पर भी बड़े पैमाने पर अंधेरा आज भी देखा जा सकता है। अंधेरी सड़कों पर बने छोटे-बड़े अनगिनत गड्ढों का कहर कम नहीं। इनसे बचने-बचाने की कोशिश में हर दिन लोग लड़खड़ा रहे हैं, फिर भी सड़कों का अंधेरा जिम्मेदार व जवाबदेह जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और मैदानी अमलों से देखा नहीं जा रहा।

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