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कोयले की भूख ने अस्पताल भी निगल लिया!

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हरदीबाजार में SECL गेवरा विस्तार के लिए सरकारी भवनों पर चला बुलडोजर—स्वास्थ्य केंद्र, छात्रावास, आंगनबाड़ी और पटवारी कार्यालय ध्वस्त

 

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ग्रामीणों का आरोप—दवाइयां, दस्तावेज और जरूरी सामान निकालने का पूरा समय दिए बिना कार्रवाई; इलाज के लिए पहुंचे मरीज लौटे

 

विरोध के बीच भारी पुलिस बल तैनात; कटघोरा विधायक प्रेमचंद पटेल मौके पर पहुंचे—SDM और तहसीलदार से समाधान पर चर्चा

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोयले की काली भूख ने हरदीबाजार में कथित रूप से जनस्वास्थ्य, बच्चों की देखभाल और राजस्व व्यवस्था—तीनों को एक साथ बुलडोजर के नीचे ला दिया।

एसईसीएल की गेवरा खदान के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण और विस्तार से जुड़ी कार्रवाई के दौरान जिला प्रशासन ने हरदीबाजार स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, छात्रावास, आंगनबाड़ी केंद्र और पटवारी कार्यालय सहित कई सरकारी भवनों को ध्वस्त कर दिया।

कार्रवाई के दृश्य बेहद गंभीर हैं। कहीं बुलडोजर सरकारी भवन की दीवारों को तोड़ता दिखाई देता है, कहीं मलबे के बीच स्वास्थ्य केंद्र का बोर्ड पड़ा है और कहीं मेज, कुर्सियां, कार्टन तथा कार्यालयी सामान खुले परिसर में रखा नजर आता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि भवनों को पूरी तरह खाली कराने और अंदर रखी दवाइयां, सरकारी दस्तावेज तथा जरूरी सामान सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। कुछ सामान के मलबे में दबने की आशंका भी जताई गई है। इस दावे की प्रशासनिक पुष्टि और वस्तुवार पंचनामा सामने आना अभी बाकी है।

पहले अस्पताल तोड़ा—मरीज जाएं कहां?

सबसे बड़ा और संवेदनशील प्रश्न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर उठ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार कार्रवाई की जानकारी से अनभिज्ञ कुछ मरीज उपचार के लिए स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे, लेकिन भवन ध्वस्त होने और स्वास्थ्य सेवा बाधित रहने के कारण उन्हें बिना इलाज लौटना पड़ा। मरीजों और परिजनों को अचानक हुई इस कार्रवाई से भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

यदि स्वास्थ्य केंद्र हटाना भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास योजना का हिस्सा था, तो प्रशासन को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए था:

– वैकल्पिक स्वास्थ्य केंद्र कहां स्थापित किया गया?
– डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी अब कहां बैठेंगे?
– दवाइयां और मरीजों के रिकॉर्ड किस सुरक्षित स्थान पर भेजे गए?
– गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और आपात मरीजों को तत्काल उपचार कहां मिलेगा?
– क्या नए केंद्र को चालू किए बिना पुराने भवन को तोड़ने की अनुमति दी गई?
– भवन खाली कराने और रिकॉर्ड हस्तांतरण का पंचनामा कहां है?

कोयला निकालने की तारीख तय हो सकती है, बुलडोजर चलाने का समय तय हो सकता है—तो मरीजों के इलाज की वैकल्पिक व्यवस्था पहले क्यों तय नहीं की गई?

क्या कोयले का उत्पादन एक दिन रुकना राष्ट्रीय संकट है, लेकिन गरीब का इलाज रुक जाना केवल “प्रशासनिक कार्रवाई”?

दवाइयां और दस्तावेज मलबे में दबे होने का आरोप

ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि स्वास्थ्य केंद्र और दूसरे कार्यालयों के भीतर रखा कुछ सामान पूरी तरह सुरक्षित निकाले बिना भवनों पर बुलडोजर चला दिया गया। दवाइयां, अभिलेख और कार्यालयी सामग्री अंदर दबने की बात कही जा रही है।

वीडियो में भवन के बाहर बड़ी संख्या में कार्टन, फर्नीचर और दूसरी सामग्री रखी दिखाई देती है। इससे यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि:

 

– भवन खाली कराने की सूची किसने तैयार की?
– दवाइयों का स्टॉक रजिस्टर मिलाया गया या नहीं?
– मरीजों के पंजीयन और स्वास्थ्य संबंधी अभिलेख सुरक्षित हैं?
– पटवारी कार्यालय के भू-अभिलेख, नक्शे और प्रकरण फाइलें कहां स्थानांतरित हुईं?
– आंगनबाड़ी का पोषण आहार, बच्चों का रिकॉर्ड और उपकरण सुरक्षित हैं?
– छात्रावास का सामान किसकी सुपुर्दगी में दिया गया?
– ध्वस्तीकरण से पहले संयुक्त पंचनामा और वीडियोग्राफी हुई या नहीं?

यदि सब कुछ नियमानुसार निकाला गया है तो प्रशासन सूची, पंचनामा और नए स्थान की जानकारी सार्वजनिक करे। यदि सामान मलबे में दबा है तो जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही तय हो।  सरकारी भवन तोड़ना आसान है—लेकिन सरकारी रिकॉर्ड, मरीजों की जरूरत और बच्चों की सुविधा को मलबे में दफन करने का अधिकार किसी आदेश को नहीं मिल सकता।

पहले विकल्प, फिर विस्थापन—ग्रामीणों का सीधा सवाल

आक्रोशित ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी, छात्रावास और पटवारी कार्यालय जैसी अनिवार्य सेवाओं की वैकल्पिक व्यवस्था पहले की जानी थी। नई जगह पर संस्थाएं चालू होने और जनसेवा बहाल होने के बाद ही पुराने भवन हटाए जाने चाहिए थे। लेकिन आरोप है कि प्रशासनिक मशीनरी ने पहले बुलडोजर पहुंचाया और बाद में लोगों की परेशानी सुनने की स्थिति पैदा हुई।

ग्रामीण पूछ रहे हैं:

क्या अधिग्रहण का अर्थ यह है कि पहले जनता की सुविधा उजाड़ दी जाए और फिर विकल्प तलाशा जाए?
क्या बच्चों की आंगनबाड़ी, मरीजों का अस्पताल और ग्रामीणों का पटवारी कार्यालय कोयले की राह में केवल “अवरोध” बन गए थे?
क्या SECL की परियोजना समय-सारणी ग्रामीणों के जीवन और स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई?

भूमि अधिग्रहण विकास के नाम पर हो सकता है, लेकिन विकास का अर्थ अस्पताल, आंगनबाड़ी और सार्वजनिक सेवाओं को बिना व्यवस्थित विकल्प के समाप्त करना नहीं हो सकता।

पुलिस के घेरे में चला बुलडोजर

कार्रवाई से ग्रामीणों में भारी आक्रोश दिखाई दिया। विरोध की आशंका को देखते हुए मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। SDM, तहसीलदार और जिला प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी भी घटनास्थल पर मौजूद रहे।

यह दृश्य अपने आप में कठोर सवाल खड़ा करता है—

जिस जनता के इलाज, पोषण और राजस्व सेवा के लिए ये भवन बनाए गए थे, उन्हीं नागरिकों के विरोध को नियंत्रित करने के लिए पुलिस खड़ी करनी पड़ी; लेकिन उनकी वैकल्पिक सुविधा पहले तैयार कराने में यही तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई?

कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। मगर पुलिस की मौजूदगी प्रशासनिक संवाद और मानवीय संवेदनशीलता का विकल्प नहीं हो सकती।

मौके पर पहुंचे विधायक प्रेमचंद पटेल

ग्रामीणों के विरोध और बढ़ते तनाव के बीच कटघोरा विधायक प्रेमचंद पटेल मौके पर पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं तथा जिला प्रशासन और एसईसीएल से चर्चा कर समाधान निकालने की बात कही।

ग्रामीणों ने विधायक के सामने वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवा, आंगनबाड़ी, छात्रावास, पटवारी कार्यालय और सुरक्षित सामान हस्तांतरण का मुद्दा उठाया।

अब विधायक के हस्तक्षेप का परिणाम केवल आश्वासन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रशासन और एसईसीएल को लिखित रूप से बताना होगा कि:

– स्वास्थ्य केंद्र तत्काल कहां संचालित होगा;
– मरीजों को कौन-सी सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी;
– आंगनबाड़ी के बच्चों के लिए वैकल्पिक भवन कौन-सा है;
– छात्रावास के विद्यार्थियों को कहां स्थानांतरित किया गया;
– पटवारी कार्यालय किस नए स्थान पर कार्य करेगा;
– क्षतिग्रस्त अथवा दबे सामान का सत्यापन कब होगा;
– और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी?

सरकार मजबूर या कोयला प्रबंधन के सामने व्यवस्था लाचार?

गेवरा एशिया की बड़ी कोयला परियोजनाओं में गिनी जाती है। देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयला आवश्यक है, लेकिन क्या उसके लिए स्थानीय नागरिकों की स्वास्थ्य सेवा को बिना विकल्प ध्वस्त करना भी आवश्यक था?

यदि सभी विभागों की सहमति, वैकल्पिक व्यवस्था और नियमानुसार हस्तांतरण पहले ही पूरा हो चुका था तो ग्रामीणों, मरीजों और कर्मचारियों में ऐसी अफरातफरी क्यों दिखाई दी?

और यदि वैकल्पिक व्यवस्था पूरी नहीं थी तो बुलडोजर चलाने की ऐसी कौन-सी आपात मजबूरी थी?

आज हरदीबाजार के लोग पूछ रहे हैं

सरकार कोयले के सामने मजबूर है, प्रशासन SECL के सामने असहाय है या फिर जनता की पीड़ा किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही?

एसईसीएल को कोयला चाहिए। प्रशासन को जमीन खाली चाहिए। सरकार को उत्पादन चाहिए।

लेकिन ग्रामीणों को इलाज, बच्चों को आंगनबाड़ी, विद्यार्थियों को छात्रावास और किसानों को राजस्व कार्यालय चाहिए—इन जरूरतों का हिसाब कौन देगा?

जिला प्रशासन तत्काल सार्वजनिक करे पूरा रिकॉर्ड

इस विवाद की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए जिला प्रशासन को तत्काल सार्वजनिक करना चाहिए:

1. सभी भवनों को खाली कराने और ध्वस्त करने का लिखित आदेश।
2. संबंधित विभागों की सहमति और हैंडओवर रिपोर्ट।
3. दवाइयों, उपकरणों, फर्नीचर और दस्तावेजों की वस्तुवार सूची।
4. कार्रवाई से पहले और बाद की वीडियोग्राफी।
5. स्वास्थ्य केंद्र की नई जगह और सेवा प्रारंभ होने की तारीख।
6. आंगनबाड़ी, छात्रावास और पटवारी कार्यालय की वैकल्पिक व्यवस्था।
7. प्रभावित कर्मचारियों और मरीजों को दी गई पूर्व सूचना।
8. मलबे में दबे बताए जा रहे सामान का संयुक्त निरीक्षण।
9. भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास से जुड़ा स्वीकृत नक्शा।
10. इस पूरी कार्रवाई में SECL तथा जिला प्रशासन की अलग-अलग जिम्मेदारी।

कोयला निकले—लेकिन जनता की जिंदगी कुचलकर नहीं

विकास का बुलडोजर यदि अस्पताल की दीवार तोड़ते समय मरीज की जरूरत भूल जाए, आंगनबाड़ी गिराते समय बच्चों का पोषण भूल जाए और पटवारी कार्यालय मिटाते समय ग्रामीणों के अभिलेख भूल जाए—तो उसे विकास नहीं, प्रशासनिक संवेदनहीनता कहा जाएगा। हरदीबाजार की घटना केवल कुछ पुराने सरकारी भवनों को हटाने का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो एक तरफ खदान विस्तार के लिए घंटों में मशीनें उतार देती है, लेकिन दूसरी तरफ जनता की बुनियादी सेवाओं का विकल्प देने में बेबस दिखाई देती है।

कोयले की भूख ने अस्पताल की दीवारें गिरा दीं—अब प्रशासन बताए, मरीजों के इलाज और जनता के अधिकारों का मलबा कौन उठाएगा?

 

प्रशासन और SECL का पक्ष अपेक्षित

दवाइयां, दस्तावेज और अन्य सामान मलबे में दबने; भवन पूरी तरह खाली किए बिना कार्रवाई करने तथा मरीजों के लौटने संबंधी बातें ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों के आरोप हैं। जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और SECL का तथ्यात्मक पक्ष प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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