दो-दो आदेश… फिर भी सूचना गायब! वाह रे सरकार? क्या कोरबा वन विभाग में सूचना का अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित है? बालको वन परिक्षेत्र अधिकारी जयंत सरकार पर गंभीर सवाल—क्या अपीलीय आदेशों की भी अनदेखी?

विशेष खोजी रिपोर्ट
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
लोकतंत्र बनाम गोपनीयता का संघर्ष
भारत का सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण कानूनी माध्यम माना जाता है। लेकिन यदि प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के आदेश, अभिलेखों का निरीक्षण और वरिष्ठ अधिकारी के पुनः निर्देश के बाद भी मांगी गई सूचना उपलब्ध न हो, तो यह केवल एक आरटीआई आवेदन का विषय नहीं रह जाता—यह प्रशासनिक जवाबदेही, कानून के पालन और शासन की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न बन जाता है।
कोरबा वनमण्डल के बालको वन परिक्षेत्र से सामने आया घटनाक्रम इसी प्रकार के कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
क्या कानून से ऊपर हैं अधिकारी?
उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार आवेदक ने 01 जनवरी 2023 से 31 जनवरी 2026 तक के कैशबुक एवं मासिक लेखा रजिस्टर की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
- पहले धारा 7(9) का हवाला देकर सूचना देने से इंकार किया गया।
- इसके बाद प्रथम अपील दायर की गई।
- 24 मार्च 2026 को प्रथम अपीलीय प्राधिकारी एवं वनमण्डलाधिकारी ने आदेश पारित किया।
- 17 अप्रैल 2026 को विभाग द्वारा अभिलेखों का निरीक्षण कराया गया।
- निरीक्षण के दौरान जिन अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां चाहिए थीं, उन्हें स्पष्ट रूप से चिन्हित किया गया।
- इसके बावजूद 05 मई 2026 को पुनः नया आवेदन देने की सलाह दी गई।
- इसके बाद शिकायत प्रस्तुत की गई।
- 12 जून 2026 को वनमण्डलाधिकारी ने दूसरी बार स्पष्ट निर्देश जारी किया कि नियमानुसार सूचना उपलब्ध कराई जाए।
लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों और शिकायतकर्ता के अनुसार, इन आदेशों के बाद भी मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई।
सबसे बड़ा प्रश्न
यदि प्रथम अपील का आदेश लागू नहीं होगा…
यदि निरीक्षण के बाद भी प्रमाणित प्रतियां नहीं मिलेंगी…
यदि वरिष्ठ अधिकारी के पुनः निर्देशों का भी पालन नहीं होगा…
तो आम नागरिक सूचना का अधिकार किससे और कैसे प्राप्त करेगा?
क्या छिपा रहे हैं अधिकारी?
यह रिपोर्ट किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—
- क्या धारा 7(9) का प्रयोग सूचना रोकने के लिए किया जा सकता है?
- निरीक्षण के बाद भी प्रमाणित प्रतियां देने से इंकार किस आधार पर किया गया?
- क्या प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के आदेश बाध्यकारी नहीं हैं?
- यदि आदेशों का पालन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
- क्या संबंधित अभिलेखों में ऐसी वित्तीय जानकारी है जिसकी जांच आवश्यक हो सकती है?
- यदि विभागीय आदेशों का अनुपालन नहीं हो रहा, तो प्रशासनिक अनुशासन कैसे सुनिश्चित होगा?
राष्ट्रीय महत्व का विषय क्यों?
यह मामला केवल कोरबा तक सीमित नहीं है।
यदि किसी विभाग में अपीलीय आदेशों के बावजूद सूचना उपलब्ध नहीं होती, तो यह पूरे देश में सूचना के अधिकार कानून की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सूचना का अधिकार केवल आवेदन लेने का कानून नहीं, बल्कि उत्तरदायी और पारदर्शी शासन की आधारशिला है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की मांग
- पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय विभागीय जांच कराई जाए।
- अपीलीय आदेशों के अनुपालन की समीक्षा की जाए।
- यदि देरी आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत आती है, तो आवेदक को प्रमाणित प्रतियां निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएं।
- आदेशों की अवहेलना के लिए उत्तरदायित्व तय किया जाए।
- पूरे मामले की जानकारी राज्य सूचना आयोग एवं प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भेजकर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
संपादकीय टिप्पणी
यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेज़ों, आदेशों एवं शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर जनहित में उठाए गए प्रश्नों पर आधारित है। संबंधित वन अधिकारियों एवं विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना सक्षम प्राधिकारी की जांच एवं उपलब्ध अभिलेखों पर निर्भर करेगा।
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