सरकारी आवास में तोड़फोड़ का मामला ! जांच में शिकायत सही, फिर गयानाथ मौर्य पर कब होगी एफआईआर ?

कोरबा। रामपुर स्थित हसदेव बराज जल प्रबंध विभाग के शासकीय आवास क्रमांक H-05 में कथित तोड़फोड़ और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला अब प्रशासनिक और कानूनी सवालों के घेरे में आ गया है। विभागीय निरीक्षण में शिकायत सही पाए जाने के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं होने से प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इस पूरे मामले में कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य का नाम सामने आया है, जिन पर शासकीय आवास को क्षतिग्रस्त करने और वहां लगी सामग्री उखाड़कर ले जाने के आरोप लगाए गए हैं।
विभागीय जांच में सामने आया गयानाथ मौर्य का नाम
मामले में अनुविभागीय अधिकारी, हसदेव बराज जल प्रबंध उप संभाग दर्री द्वारा दिनांक 27 फरवरी 2026 को कार्यपालन अभियंता को भेजे गए पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि निरीक्षण के दौरान शासकीय आवास क्रमांक H-05 में व्यापक तोड़फोड़ पाई गई। पत्र में यह भी उल्लेख है कि आवास निरस्तीकरण के बाद कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य द्वारा मकान के कई हिस्सों को तोड़ा और क्षतिग्रस्त किया गया।
पत्र में दर्ज विवरण के अनुसार आवास के कमरों की सिलिंग तोड़ दी गई, किचन शेड को नुकसान पहुंचाया गया, बाथरूम की टाइल्स तक उखाड़ दी गईं। इसके अलावा कमरों की पूरी वायरिंग उखाड़ ली गई और लकड़ी के रैक भी निकालकर ले जाने की बात सामने आई है। विभागीय निरीक्षण में यह भी पाया गया कि मकान के सामने लगा लोहे का गेट भी उखाड़कर ले जाया गया।
लाखों की सरकारी संपत्ति को नुकसान
विभागीय निरीक्षण में सामने आए तथ्यों के आधार पर यह माना जा रहा है कि शासकीय आवास को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया गया है। आवास की संरचना, फर्श, विद्युत वायरिंग, फिटिंग्स और अन्य स्थायी सामग्री को नुकसान पहुंचाने से सरकारी संपत्ति को भारी आर्थिक क्षति पहुंची है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार इस पूरी घटना में लाखों रुपये की सरकारी संपत्ति को नुकसान हुआ है।
सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और शासकीय भवन की संरचना को तोड़ना भारतीय कानून के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में सामान्यतः तत्काल पुलिस में एफआईआर दर्ज कर जांच प्रारंभ की जाती है। लेकिन इस मामले में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, जिससे पूरे प्रकरण पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
जांच में शिकायत सही, फिर भी एफआईआर नहीं
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब विभागीय निरीक्षण में शासकीय आवास को नुकसान पहुंचाने की पुष्टि हो चुकी है और दस्तावेज़ों में कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य का नाम भी दर्ज है, तो फिर अब तक पुलिस में एफआईआर क्यों नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार इस मामले की जानकारी जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंच चुकी है। बताया जा रहा है कि कोरबा कलेक्टर के साथ-साथ जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और विभागीय मंत्री तक भी पूरे मामले से अवगत कराया गया है। इसके बावजूद अब तक गयानाथ मौर्य के खिलाफ कोई पुलिस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
क्या दबाव में है प्रशासन ?
कार्रवाई में हो रही देरी को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि जब विभागीय पत्र में कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य द्वारा आवास को क्षतिग्रस्त किए जाने का उल्लेख है, तो फिर एफआईआर दर्ज करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
क्या प्रशासन किसी दबाव में है ? या फिर किसी कारणवश मामले को आगे बढ़ाने से बचा जा रहा है ? यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि सरकारी संपत्ति से जुड़े मामलों में सामान्यतः तत्काल कार्रवाई की जाती है।
सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर सवाल
यह मामला केवल एक शासकीय आवास की तोड़फोड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि किसी निरस्त शासकीय आवास में इस तरह से तोड़फोड़ कर सामग्री उखाड़ ली जाती है और लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है।
सरकारी संपत्ति सार्वजनिक धन से निर्मित होती है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि किसी मामले में लाखों रुपये की सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आते हैं और जांच में उसका उल्लेख भी मिलता है, तो उस पर त्वरित कार्रवाई अपेक्षित होती है।
न्यायालय जाने की तैयारी
मामले से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि जल्द ही कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू नहीं की गई, तो इस पूरे प्रकरण को न्यायालय में ले जाया जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विभागीय दस्तावेज़ों में भी नुकसान की पुष्टि हो चुकी हो और इसके बावजूद पुलिस कार्रवाई न हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
ऐसी स्थिति में प्रशासन को यह बताना पड़ सकता है कि जब जांच में शिकायत सही पाई गई थी और विभागीय पत्र में गयानाथ मौर्य का नाम भी दर्ज था, तब पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
अब सबकी नजर प्रशासन पर
फिलहाल इस पूरे मामले में प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन विभागीय दस्तावेज़ सामने आने के बाद यह मामला कोरबा में चर्चा का विषय बन चुका है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य के खिलाफ कब कार्रवाई करता है और क्या इस मामले में एफआईआर दर्ज होती है या नहीं।
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