राशन व्यवस्था फेल ! कोरबा में गरीब है भूखे, गोदाम खाली — सिस्टम की लापरवाही उजागर

कोरबा। जिले में सरकारी राशन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और इसका सीधा खामियाजा गरीब परिवार भुगत रहे हैं। जनवरी माह का राशन अब तक नहीं उठाने वाले हजारों बीपीएल हितग्राही आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन पीडीएस दुकानों में चावल नदारद है। हालात इतने बदतर हैं कि वेयरहाउस गोदाम खाली पड़े हैं और जिले की 30 प्रतिशत से अधिक उचित मूल्य दुकानों में चावल पूरी तरह खत्म हो चुका है। प्रशासनिक सुस्ती और अव्यवस्था ने गरीबों की थाली से निवाला छीन लिया है।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी भयावह बताई जा रही है। कई गांवों में जनवरी का राशन वितरण शुरू ही नहीं हुआ, जिससे मजदूर, वृद्ध, निराश्रित और अंत्योदय परिवारों के सामने रोजमर्रा के भोजन का संकट खड़ा हो गया है। शासन हर माह 553 शासकीय उचित मूल्य दुकानों के माध्यम से चावल, चना, शक्कर और नमक उपलब्ध कराने का दावा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दुकानों पर सिर्फ आश्वासन मिल रहा है, राशन नहीं।
एफआरके बना बहाना, गरीब बना शिकार
बीपीएल हितग्राहियों को दिए जाने वाले फोर्टिफाइड राइस कर्नेल्स (FRK) चावल का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो चुका है। सामान्य चावल मौजूद है, लेकिन वह केवल एपीएल कार्डधारियों के लिए रखा गया है। नियमों का हवाला देकर गरीबों को चावल देने से साफ इनकार किया जा रहा है। सवाल यह है कि जब एफआरके उपलब्ध नहीं था, तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? क्या नियम गरीब की भूख से ज्यादा जरूरी हो गए हैं ?
असल वजह साफ है — एफआरके आपूर्ति करने वाली एजेंसी से अनुबंध समाप्त हो गया और समय रहते नई निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। अब इस प्रशासनिक लापरवाही की सजा तीन लाख से अधिक गरीब परिवार भुगत रहे हैं।
तीन लाख से ज्यादा बीपीएल परिवार संकट में
खाद्य विभाग की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक जिले में 3 लाख 21 हजार से अधिक बीपीएल हितग्राही हैं, जिनमें अंत्योदय, निराश्रित, प्राथमिकता और निःशक्त परिवार शामिल हैं। हर माह लगभग एक लाख क्विंटल चावल की जरूरत होती है, लेकिन हालात इतने बदतर हैं कि आठ हजार क्विंटल का डीओ जारी होने के बावजूद सिर्फ एक हजार क्विंटल चावल ही बांटा जा सका। बाकी गरीब परिवार राशन दुकानों से खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं।
एक हफ्ते का भरोसा, आज की भूख का क्या ?
खाद्य विभाग की ओर से दावा किया जा रहा है कि निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण में है और एक सप्ताह के भीतर स्थिति सामान्य हो जाएगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तब तक गरीब परिवार क्या खाएंगे ? क्या प्रशासन को पहले से यह जानकारी नहीं थी कि हर माह कितनी खपत होती है ? अगर संकट की आशंका थी, तो समय रहते तैयारी क्यों नहीं की गई ?
Gram Yatra के तीखे सवाल
• जब जरूरत तय है, तो आपूर्ति क्यों फेल हुई ?
• निविदा प्रक्रिया में देरी की जिम्मेदारी किसकी है ?
• क्या गरीबों को सिर्फ कागज़ी योजनाओं और आश्वासनों के भरोसे छोड़ दिया गया है ?
कोरबा में राशन संकट अब केवल तकनीकी समस्या नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक नाकामी और संवेदनहीनता का खुला उदाहरण बन चुका है। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट भूख के साथ-साथ जनआक्रोश को भी जन्म देगा — और इसकी जिम्मेदारी तय करना अनिवार्य होगा।
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