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देखिए कलेक्टर साहब ! आपके पीआरओ का मीडिया मैनेजमेंट — मुस्कुराते रहे PRO, जमीन पर बैठे रहे पत्रकार…

कोरबा जिले में आयोजित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कार्यक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी। खासकर जनसंपर्क विभाग और पीआरओ की भूमिका पर ऐसे गंभीर सवाल खड़े हुए हैं, जिनका जवाब अब सिर्फ औपचारिक सफाई से नहीं बल्कि ठोस जवाबदेही से दिया जाना चाहिए।

यह कोई साधारण आयोजन नहीं था। मुख्यमंत्री का दौरा था — और वह भी ऐसे मुख्यमंत्री का, जो स्वयं प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री हैं। इसके बावजूद कार्यक्रम स्थल पर पत्रकारों के लिए न तो बैठने की समुचित व्यवस्था थी, न छांव और न ही पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा। तेज धूप में पत्रकार जमीन पर बैठने को मजबूर रहे, जबकि पीछे ही जनसंपर्क अधिकारी सहज भाव से मुस्कुराते नजर आए।

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इस अव्यवस्था से आहत पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुला अपमान बताते हुए कार्यक्रम का सामूहिक रूप से बहिष्कार कर दिया और कवरेज न करने का निर्णय लिया। सवाल सीधा है — क्या यही मीडिया समन्वय का स्तर है ?

जनसंपर्क विभाग को हर महीने सत्कार मद के नाम पर हजारों रुपये का बजट उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि कार्यक्रम स्थल पर पत्रकारों के लिए एक गिलास पानी तक की व्यवस्था नहीं की गई थी। जब इस लापरवाही पर सवाल किया गया तो पीआरओ की ओर से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि यह “शासकीय कार्यक्रम नहीं है”।

अब सवाल यह है कि अगर कार्यक्रम शासकीय नहीं था, तो टेंट, मंच, सुरक्षा, वाहन पार्किंग और तमाम प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी किस आदेश से थी ? क्या ये सभी व्यवस्थाएं बिना प्रशासनिक निर्देशों के हो गईं ? यदि नहीं, तो फिर पत्रकारों के लिए माकूल इंतजाम क्यों नहीं किए गए ?

पीआरओ का दायित्व सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति जारी कराना नहीं होता। वे पत्रकारों और प्रशासन के बीच सेतु होते हैं। उनकी जिम्मेदारी होती है कि वे समय रहते अधिकारियों का ध्यान मीडिया की आवश्यकताओं की ओर आकृष्ट करें। लेकिन यहां ऐसा प्रतीत हुआ कि पीआरओ ने या तो जानबूझकर अनदेखी की या अपने मिजाज के अनुसार जिम्मेदारी निभाने से बचते रहे।

और जब हालात बिगड़े तो यह तर्क दिया गया कि प्रेस रिलीज जारी कर अखबारों में खबर छपवा दी जाएगी। क्या पत्रकारों का सम्मान प्रेस नोट से पूरा हो जाता है ? क्या मौके पर सम्मानजनक व्यवस्था देना अब प्रशासन की प्राथमिकता नहीं रही ?

किसी भी जिले में मुख्यमंत्री का दौरा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कोरबा में यह दौरा मीडिया प्रबंधन की विफलता और जनसंपर्क विभाग की लापरवाही का उदाहरण बन गया। पत्रकारों ने मांग की है कि इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की जाए, पीआरओ की भूमिका तय हो और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय की जाए।

सवाल अब यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं  —
सवाल यह है कि जिम्मेदारी तय होगी या अगली बार भी पत्रकार जमीन पर ही बैठेंगे ?

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