हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : पुरानी सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता नजरअंदाज, पेंशन कोई दान नहीं, सरकार को एल.बी. संवर्ग शिक्षकों के लिए नीति बनाने के निर्देश, सरकार की दलीलें खारिज

बिलासपुर , छत्तीसगढ़ में एल.बी. संवर्ग के हजारों शिक्षकों के लिए राहत भरा और दूरगामी असर वाला फैसला सामने आया है।
राज्य के विभिन्न जिलों में कार्यरत वे सहायक शिक्षक, शिक्षक एवं एल.बी. संवर्ग के शिक्षक, जिनकी प्रारंभिक नियुक्ति
वर्ष 1998–99 में शिक्षाकर्मी (पंचायत) अथवा शिक्षाकर्मी (नगरीय निकाय) के रूप में हुई थी और जो तब से लगातार
सेवाएं दे रहे हैं, उनकी पुरानी सेवा को पेंशन गणना से बाहर रखने की सरकारी सोच पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
वर्ष 2018 में इन शिक्षकों का संविलियन स्कूल शिक्षा विभाग में किया गया। इसके बाद राज्य शासन ने पुरानी पेंशन
योजना (OPS) बहाल तो कर दी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पेंशन के लिए सेवा की गणना किस तिथि से होगी—
प्रारंभिक नियुक्ति से, नियमितीकरण से या फिर 1 जुलाई 2018 के संविलियन से।
इसी अस्पष्टता के बीच 1 अप्रैल 2012 से पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग के शिक्षकों पर नवीन अंशदायी पेंशन योजना (NPS)
लागू कर दी गई थी, जिसके तहत शिक्षकों के मूल वेतन का 10 प्रतिशत अंशदान काटा जाता रहा और उतनी ही राशि
नियोक्ता अंश के रूप में जमा की जाती रही।
इससे आक्रोशित एल.बी. संवर्ग के शिक्षकों ने अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी, अनूप मजूमदार, ईशान वर्मा,
सी. जयंत के. राव एवं मोनिका ठाकुर के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की एकलपीठ में हुई।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि राज्य शासन ने स्वयं शिक्षाकर्मियों की प्रारंभिक नियुक्ति से आठ वर्ष
की सेवा की गणना कर 1 जुलाई 2018 को स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन किया था। इसके बाद नियमों में संशोधन कर
सेवा अवधि की अनिवार्यता आठ वर्ष से घटाकर दो वर्ष कर दी गई।
वर्तमान में ये सभी शिक्षक शासकीय वेतनमान, पदनाम और अन्य सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं, लेकिन उनकी सेवा की
गणना केवल संविलियन की तिथि से करते हुए पुरानी पेंशन योजना का लाभ न देना सरासर अन्यायपूर्ण है।
राज्य शासन की आपत्ति
राज्य शासन की ओर से यह आपत्ति दर्ज की गई कि संविलियन के बाद ही पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग के शिक्षक
स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी माने गए हैं। शासन ने 30 जून 2018 को जारी संविलियन आदेश का हवाला देते हुए कहा
कि कंडिका 4, 5 एवं 6 के अनुसार शिक्षक एल.बी. संवर्ग को देय समस्त लाभों की गणना 1 जुलाई 2018 से ही की जाएगी
तथा उससे पूर्व की अवधि के लिए किसी भी प्रकार का एरियर या पेंशन लाभ देय नहीं है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
माननीय हाईकोर्ट ने राज्य शासन की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि केवल संवर्ग बदलने से कर्मचारियों
की वर्षों पुरानी सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि
पेंशन कोई दान नहीं बल्कि कर्मचारी का आस्थगित वेतन (Deferred Wage) है।
अदालत ने माना कि वर्षों तक निरंतर दी गई सेवाओं को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि संविलियन बाद में
हुआ। सेवा की निरंतरता, कार्य की प्रकृति और समानता के संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
राज्य सरकार को नीति बनाने के निर्देश
माननीय न्यायालय ने राज्य शासन को निर्देश दिए हैं कि वह उन शिक्षकों की नियुक्ति तिथि से सेवा की गणना के
प्रश्न पर नए सिरे से विचार करे, जिनकी सेवा शिक्षाकर्मी के रूप में प्रारंभ हुई थी।
साथ ही 1 जुलाई 2018 से पूर्व की गई सेवाओं को पेंशन गणना में शामिल करते हुए 10 वर्ष की सेवा अवधि की
अनिवार्यता को लेकर स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत नियम बनाए जाएं।
हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत
यह फैसला एल.बी. संवर्ग सहित हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। यह केवल कानूनी जीत नहीं,
बल्कि उन शिक्षकों की दशकों की सेवा की मान्यता है, जिन्होंने वर्षों तक राज्य की शिक्षा व्यवस्था को संभाले
रखा।
अब निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वह हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कब और किस प्रकार नीति बनाकर
एल.बी. संवर्ग के शिक्षकों को उनका वाजिब पेंशन अधिकार देती है।
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