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कोरबा ने नम आंखों से किया  पित्र पुरुष को नमन, गोल्ड मेडलिस्ट स्व. डॉ. बंशीलाल महतो की पुण्यतिथि पर उमड़ा जनसैलाब, लोगो ने कहा—“हमर बाबूजी आज भी देवता समान”

कोरबा (ग्रामयात्रा छत्तीसगढ़)।
कोरबा की राजनीति, समाज और जनजीवन में एक ऐसा नाम है जो आज भी लोगों की भावनाओं में रचा-बसा है—गोल्ड मेडलिस्ट स्व. डॉ. बंशीलाल महतो, जिन्हें ग्रामीण प्रेम से “बाबूजी” कहा करते थे।
उनकी पुण्यतिथि पर आज प्रदेशभर में भावुक माहौल रहा। शहर से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक लोगों ने उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दी और कहा—
“बाबूजी नेता नई रहिन… हमन के परिवार के सदस्य रहिन।”


ग्रामीणों के लिए चिकित्सक नहीं—सच्चे मसीहा थे बाबूजी

डॉ. महतो ने राजनीति में आने से बहुत पहले ही गरीब, मजदूर और ग्रामीण परिवारों के लिए मसीहा की पहचान बना ली थी।
गोल्ड मेडलिस्ट डॉक्टर होते हुए भी वे लगभग निःशुल्क उपचार करते थे।
उनकी फीस इतनी कम और इलाज इतना भरोसेमंद था कि गांव वाले गर्व से कहते—
“महतो बाबूजी गरीब के डॉक्टर हवं, पैसा देखके इलाज नई करतें।”

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उनकी यही सेवा भावना उन्हें साधारण डॉक्टर से उठाकर जनता के देवता समान बना देती थी।


सांसद बने… पर सेवा का संकल्प नहीं छोड़ा

सांसद बनने के बाद भी डॉ. महतो का सेवाभाव पहले जैसा ही रहा।
जनसभा हो, गांव की चौपाल हो या कोई सार्वजनिक कार्यक्रम—
जहां भी जाते, वहीं खड़े-खड़े लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण कर देते।

जनता कहती है—
“बाबूजी सांसद बन गइन… पर गरीब के इलाज मं कभू फर्क नहीं आय। बाबूजी हमेशा बाबूजीच रहिन।”


आज भी उनके क्लिनिक में चलता है वही सेवा का संस्कार

उनके जाने के बाद भी उनके क्लिनिक का “सेवा-संस्कार” खत्म नहीं हुआ।
आज भी उनके बेटों के सहयोग से वहां
बहुत किफायती इलाज,
सुलभ दवाई,
और उसी मानवीय व्यवहार के साथ उपचार मिलता है।

ग्रामीण कहते हैं—
“क्लिनिक मं जावत हन, त लागथे बाबूजी अब्बड़ु रूप मं हावं।”


स्मरणशक्ति—जिसने उन्हें हर घर का अपना बना दिया

डॉ. महतो की स्मरणशक्ति अद्भुत थी।
वे किसी व्यक्ति से एक बार मिल लेते, तो वर्षों बाद भी उसका नाम, गांव, घर-परिवार और पूरी समस्या याद रखते थे।
गांव के बुजुर्ग मुस्कुराते हुए कहते हैं—
“बाबूजी भीड़ मं देख लेहिं, त दूर ले नाम लेके पूछ देथें—कइसे चलत हे ?
ऐसी बुद्धि काकर मं रहथे !”

यह विरला गुण ही उन्हें लोगों के दिल में स्थायी जगह देता था।
जनता को भरोसा था—
“बाबूजी हमन ला कभू भूली नई सकें।”


छत्तीसगढ़ी भाषा प्रेम—अपनी दाई-भाखा को जीवनभर सम्मान दिया

हिंदी और अंग्रेज़ी पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद
डॉ. महतो हमेशा छत्तीसगढ़ी में बात करना पसंद करते।
उनका मानना था—
“दाई भाखा मनखे के पहचान होथे।”
उनकी वाणी और व्यवहार ने कई पीढ़ियों को छत्तीसगढ़ी बोलने का गर्व दिया।


जनसेवा की अपार विरासत—रेल, सड़क, स्वास्थ्य हर क्षेत्र में अमिट छाप

  • हसदेव एक्सप्रेस की शुरुआत कर कोरबा को रायपुर से सीधी जोड़ने का श्रेय उनके प्रयासों को जाता है।
  • ईएसआईसी हॉस्पिटल की स्थापना में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है।
  • सड़क, रेल और प्रशासनिक सुविधाओं को मजबूत करने में वे लगातार संघर्षरत रहे।
  • किसानों, मजदूरों, आदिवासियों—हर वर्ग की आवाज वे बिना हिचक संसद तक ले जाते थे।

पुण्यतिथि पर उमड़ी भावनाएं—अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभाओं में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
हर किसी के मन में एक ही भाव था—
“बाबूजी राजनीति के नहीं… जनभावना के आधार रहिन।”


उनको जानने वाले कहते है —

“बाबूजी,
आपकी सादगी, आपकी सेवा, आपका प्यार…
आज भी कोरबा को रास्ता दिखा रहा है।
आप हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।”


ग्राम यात्रा परिवार आपकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन करता है…

– अब्दुल सुल्तान, संपादक

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