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कोरबा मेडिकल कॉलेज में मौत का कारोबार ! जुड़वा बेटों में एक की मौत — लापरवाही, फर्जीवाड़ा और दलाली के दलदल में तड़प रहे मरीज

कोरबा मेडिकल कॉलेज में मौत का कारोबार ! जुड़वा बेटों में एक की मौत — लापरवाही, फर्जीवाड़ा और दलाली के दलदल में तड़प रहे मरीज

कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का स्व. बिसाहू दास महंत स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय सह अस्पताल अब अस्पताल नहीं, मौत का ठिकाना बन चुका है। सिस्टम की अराजकता, अफसरशाही की लापरवाही और दलालों के कब्जे ने इस अस्पताल को मरीजों की कब्रगाह में तब्दील कर दिया है।

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ताजा मामला जुड़वा बेटों में एक मासूम की मौत का

26 अप्रैल को धनराज पटेल की पत्नी रीना पटेल ने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। दोनों बच्चों का वजन दो-दो किलो था। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने दोनों को SNCU वार्ड में भर्ती किया।

15 दिन इलाज चला। शुक्रवार रात तक बच्चे पूरी तरह स्वस्थ थे। शनिवार सुबह डिस्चार्ज की तैयारी थी। मां रीना सुबह दूध पिलाने वार्ड पहुंची, तो देखा कि एक बेटे की सांसें बंद हैं। घबराकर नर्स को बुलाया, लेकिन हद तो तब हो गई जब मौजूद नर्स ने उसे बाहर निकाल दिया।

परिजनों ने हंगामा किया, तो सामने आया कि बच्चे की मौत हो चुकी थी। आनन फानन में डर से परिजन दूसरे जीवित बच्चे की निजी नर्सिंग होम में उपचार कराने लेकर पहुंचे।

 

रीना पटेल ने बताया कि चिकित्सक ने माफी मांगी। यानी स्टाफ ने अपनी लापरवाही कबूल की। लेकिन क्या सिर्फ माफी इस नुकसान की भरपाई कर सकती है। माँ ने कहा

मुझे मेरा बेटा वापस कर दो माफी अपने पास रखो

ये पहला मामला नहीं! कोरबा मेडिकल कॉलेज बना लापरवाही और मौत का गढ़

ध्यान दीजिए — ये कोई इकलौती घटना नहीं। इसी अस्पताल में 13 वर्षीय किशोरी की मौत के 17 घंटे बाद पोस्टमार्टम किया गया। परिजन लाश लेकर गलियारे में भटकते रहे।

एक चर्चित नर्स, जो लगातार ड्यूटी से गायब रहती है या फिर बेतरतीब अंदाज में नौकरी करती है, उसकी देर से अस्पताल आने की आदत ने लापरवाही के बीच एक मरीज को ब्लड इंफेक्शन करवा दिया गया।

दूसरी घटना में उसी नर्स के जल्दी ड्यूटी से भाग जाने की वजह से स्टाफ की नानी को डेढ़ घंटे तक खाली ड्रिप लगाए रखा गया।

कुल मिलाकर अस्पताल में व्यवस्था नाम की चीज ही नहीं

जो जिम्मेदार हैं, वो फर्जी टेंडर, मनमानी खरीदी और कमीशनखोरी में व्यस्त हैं। मरीज तड़प रहे हैं।

इस बार फिर चर्चा में डॉ. राकेश वर्मा

सबसे बड़ा सवाल ये कि शिशु रोग विभाग के एचओडी डॉ. राकेश वर्मा के नेतृत्व में एक के बाद एक हादसे क्यों हो रहे हैं? ये वही डॉक्टर हैं, जिनका नाम पहले भी नियमों को ताक पर रखकर नॉन इन्वर्टर एसी खरीद में कंसाइनी बनने को लेकर चर्चा में था।

बावजूद इसके न कोई कार्रवाई, न रोक-टोक।

दलाली का अड्डा बना मेडिकल कॉलेज

सूत्र बताते हैं कि अस्पताल में फर्जी टेंडरों का खेल खुलेआम चल रहा है।

एमएस डॉ. गोपाल कंवर को अस्पताल में हो रही मनमानी से फुर्सत नहीं, एसी चेंबर में बैठ खेला होता रहता है।

मनमानी खरीदी, कमीशनखोरी और दलालों के चंगुल में पूरा सिस्टम कैद है। डॉक्टर से लेकर अधिकारी तक मरीजों से ज्यादा फाइलों में दिलचस्पी ले रहे हैं।

मरीजों के लिए न जरूरी दवाइयां उपलब्ध, न समय पर इलाज। ICU, SNCU से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक अधिकारियों की अनदेखी और मनमानी का अड्डा बन चुके हैं।

डीन का बयान, लीपापोती की तैयारी

मेडिकल कॉलेज डीन डॉ के के सहारे ने हमेशा की तरह मामले की जांच का रटा-रटाया बयान दे दिया है। लेकिन हकीकत ये है कि अब तक किसी भी घटना में न तो किसी पर एफआईआर हुई, न निलंबन, न जवाबदेही।

कितनी और मौतें चाहिए अफसरशाही को?

अब सवाल ये कि आखिर कितनी और जानें जाएंगी? कितने और मासूम दम तोड़ेंगे? कब तक कोरबा मेडिकल कॉलेज सिस्टम की लापरवाही, कमीशनखोरी और दलाली का शिकार बना रहेगा?

प्रदेश सरकार, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन कब जागेगा ? या फिर ये अस्पताल इसी तरह लाशें गिनता रहेगा और अधिकारी कमीशन गिनते रहेंगे ?

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