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पारंपरिक आदिवासी जीवन शैली, रहन-सहन, खानपान, पोशाक को संरक्षित कर रहा बस्तर पंडुम : विधायक नेताम

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उत्तर बस्तर कांकेर (ग्रामयात्रा छत्तीसगढ़ )। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मंशानुसार प्रदेश सरकार द्वारा बस्तर की पारंपरिक, सांस्कृतिक तथा विभिन्न अवसरों व त्यौहारों पर आदिवासियों द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक लोकनृत्य, लोकगीत, लोकनाट्य आदि की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन किया जा रहा है। इसके तहत आज जिला स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन कांकेर शहर से लगे ग्राम सिंगारभाट के गोंडवाना भवन में धूमधाम पूर्वक किया गया, जिसमें जिले के सभी सात विकासखण्डों से आए लोक कलाकारों ने विभिन्न विधाओं में अपनी शानदार प्रस्तुति दी। इस अवसर पर कांकेर विधायक आशाराम नेताम, भानुप्रतापपुर विधायक सावित्री मनोज मंडावी, जिला पंचायत अध्यक्ष किरण नरेटी सहित उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने बस्तर की पारंपरिक विधाओं का आनंद लिया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित कांकेर विधायक नेताम ने कहा कि बस्तर की पारंपरिक धरोहरों को संरक्षित करने एवं पहचान दिलाने का कार्य बस्तर पंडुम के माध्यम से प्रदेश के मुखिया साय द्वारा किया जा रहा है। अपनी संस्कृति और विरासत से दूर हो रहे आदिवासियों को उनकी परंपराओं से जोड़ने की यह अच्छी पहल है और इसका लाभ बस्तर के सभी जनजातियों को लेना चाहिए। इस अवसर पर भानुप्रतापपुर विधायक ने अपने उद्बोधन में कहा कि बस्तर की अपनी अलग परंपरा है। उन्होंने आगे कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के बीच अपनी उत्कृष्ट विरासत से दूर हो रही आदिवासी जनजातियों के लिए बस्तर पंडुम एक अच्छा माध्यम है, जिसे संजोने व सहेजने का काम शासन-प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। कार्यक्रम में उपस्थित जिला पंचायत की अध्यक्ष नरेटी ने कहा कि बस्तर पंडुम यहां की लोक संस्कृति और परंपराओं को पुनर्जीवित करने का बेहतर प्लेटफॉर्म साबित हुआ है।

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उन्हांने आगे कहा कि प्रकृति के पूजक आदिवासियों को अपनी विभिन्न परंपराओं से जुड़ने का यह सुनहरा अवसर मिला है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बधाई के पात्र हैं। इसके पहले, कलेक्टर निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने जिला स्तरीय बस्तर पंडुम प्रतियोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उक्त आयोजन के जरिए आदिवासियों को अपनी छिपी हुई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने अवसर मिला। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को बधाई देते हुए संभाग स्तरीय प्रतिस्पर्धा के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं।

पारंपरिक व्यंजनों और आकर्षक वेशभूषा से रूबरू हुए आगंतुक, अतिथियों ने चखा स्वाद : 

सिंगारभाट के गोंडवाना भवन में आयोजित ‘बस्तर पंडुम’ में जनजातीय शिल्प कला, वाद्ययंत्र, आखेट यंत्र, आभूषण, पारंपरिक वेशभूषा आदि का प्रदर्शन स्टॉल लगाकर किया गया। इस दौरान आगंतुकों ने बस्तर के पारंपरिक आभूषण हंसली, पहुंची, ऐंठी, चुटकुल, चूड़ा, करधन, कौड़ीमाला, कौड़ी गजरा, झलिंग, खोपा खोंचनी, बटकी खिनवा, बनुरिया, पैरकड़ा, मुड़पिन, रूपिया माला, पनिया, फुंदरा, तल्लानेर, झोबा, नेर्क, सिहारी बीजमाला सहित लया-लयोर की पारंपरिक पोशाकों व गोदना (पारंपरिक टैटू) का भी प्रदर्शन का अवलोकन किया। इसी तरह बस्तरिया व्यंजन के स्टॉल में पुड़गा, आकीरोटी, सल्फी, जिर्रा शरबत, इमली (हित्ता) चटनी, कोड़ेंग घुघरी, गुड़चिंवड़ा, आमट, जिमीकांदा सहित छिंद दाड़को, जिर्रा गुंड़ा, हित्ता चटनी, जुंवार लाई, रेंगा, डोंक, गोड़गा जावा, हिंद दांड़गो, माड़िया झुनगा, कुल्थी कोड़ेंग, सिकुन, चापोड़ा चिट्टी, फुटु गुंडा, जीर्राभाजी, तुमीर पंडिंग, सियारी बीजा के अलावा पेय पदार्थो में अड़कुड़ जावा, गोर्रा जावा, कनकी जावा, काराखुला, मेमरी शरबत, बेल शरबत, कुटकी पेज, जुंवार पेज, डुमर पेज, कोदो पेज आदि की प्रदर्शनी लगाई गई। इस दौरान अतिथियों ने स्वादिष्ट व्यंजन का स्वाद भी चखा।

आदिवासियों की पुरानी परंपरा : गोदना : 

स्टॉल में पहुंचे नरहरपुर ब्लॉक के ग्राम गंवरसिल्ली से आए ओझा जनजाति के आदिवासियों ने बताया कि आदिवासी महिला के विभिन्न अंगों में गोदना की पुरानी परंपरा है। बिसाहूराम नेताम, सुखमीबाई व दुकलूबाई ने बताया कि गोदना को घी और धुंए से विशिष्ट प्रकार के मिश्रण से तैयार किया जाता है, जिसे सुई से चुभोकर अंगों में आकृतियां उकेरी जाती हैं। यह भी बताया कि गोदना गोदने के उपरांत शांति के लिए उन अंगों में गोबर का लेप लगाया जाता है। इसके अलावा ग्राम की शीतलामाता को तेल, हल्दी, चावल, दाल, नमक, मिर्च आदि अनिवार्य रूप से अर्पित किया जाता है। यह परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है। देवार याया द्वारा भी गोदना अंकित किए जाने का चलन है। उल्लेखनीय है कि जिला स्तरीय ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता में सभी ब्लॉक से आए 464 प्रतिभागियों ने हिस्सा लेकर विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट प्रस्तुति दी, जिसमें जिले के आदिवासी प्रतिभागियों ने रेला पाटा नृत्य, धनकुल नृत्य, डहकी गीत, मांदर नृत्य, मोहरी वाद्य आदि का प्रदर्शन किया गया।

इस अवसर पर नगरपालिका कांकेर के अध्यक्ष अरूण कौशिक, जिला पंचायत की उपाध्यक्ष ताराबती ठाकुर, मछुआ विकास बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष भरत मटियारा, पूर्व विधायक शिशुपाल शोरी एवं सुमित्रा मारकोले, प्रतिष्ठित नागरिक महेश जैन सहित राजीव लोचन सिंह के अलावा विभिन्न आदिवासी समाज के प्रमुखगण उपस्थित थे।

 

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