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इंदिरा प्रियदर्शनी बैंक:कम ब्याज पर कर्ज देने 1996 में खोला बैंक 2006 में ताला, 11 साल में 54 करोड़ का घपला

प्राइवेट बैंक और फायनेंस कंपनियों से कम ब्याज दर पर कर्ज देने के लिए महिला समूह ने सदरबाजार में 1995 में इंदिरा प्रियदर्शिनी के नाम से बैंक शुरू किया। बैंक की लुभावनी स्कीम के चक्कर में राज्यभर की 22 हजार से ज्यादा महिलाओं ने खाता खुलवा लिया। बैंक के खाते में 54 करोड़ रुपए जमा हो गए।

यह बैंक 11 साल तक चलता रहा फिर अगस्त 2006 को अचानक ही बैंक बंद कर दिया गया। बैंक के गेट पर लगातार ताला देखने के बाद उसमें पैसा जमा करने वालों को जानकारी हुई। उसके बाद लोगों ने जमकर हंगामा और प्रदर्शन किया। उसके बाद पुलिस ने जालसाजी और गबन के दो केस दर्ज किए।

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पुलिस ने प्रारंभिक जांच के आधार पर 19 महिलाओं को गबन के केस में आरोपी बनाया। इसमें सभी संचालक मंडल में शामिल थीं। पुलिस ने कई दिनाें की जांच के बाद बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा को भी आरोपी माना और उसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की। उसके बाद कुछ और को आरोपी बनाया गया।

पुलिस ने एक के बाद एक अधिकांश आरोपियों की गिरफ्तारी की जा चुकी है। बैंक पर आरोप है कि फर्जी एफडीआर, डीडी और पे-आर्डर जारी किए गए थे। उसी तरीके से ग्राहकों का पैसा उनकी जानकारी के बिना निकालकर गबन किया गया।

छह माह के भीतर दो एफआईआर
बैंक के खिलाफ पहली एफआईआर अगस्त 2006 में की गई। इसमें उन लोगों को प्रार्थी बनाया गया, जिनके पैसे डूबे थे। इसी एफआईआर में बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा और सुलोचना आडिल समेत अन्य के नाम थे। फिर 9 जनवरी 2007 को दूसरा केस बैंक की ओर से दर्ज कराया गया। इसमें धारा 409, 420, 467, 468, 201 एवं 120 बी के तहत केस दर्ज किया गया। इसमें गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन पुलिस ने किसी से गबन का पैसा जब्त नहीं किया। हालांकि डिपाजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कारपोरेशन मुंबई द्वारा 13 करोड़ रुपए लौटा गए। इसमें एक लाख की सीमा तक के छोटे खातेदारों को ही पैसा वापस किया गया।

नार्को टेस्ट के तीन बार किए गए प्रयास
उमेश पर पुलिस को पहले ही शक था कि उसी ने पैसे बांटे हैं। उमेश ने पैसे किए दिए, वह ये जानकारी नहीं दे रहे था। इस वजह उसका तीन बार नार्को टेस्ट करवाने का प्रयास किया गया। पहले वह राजी नहीं हो रहा था। कोर्ट से अनुमति लेने के बाद कई बार उसकी सहमति के प्रयास किए गए। पहली बार जब उसे अहमदाबाद ले जाया गया तो उसने लैब में टेस्ट करवाने से मना कर दिया। पुलिस फिर आ गई। दूसरी बार कोर्ट से मंजूरी लेकर फिर लैब ले जाया गया। वहां भी उसने टेस्ट नहीं करवाया। तीसरी बार कोर्ट की मंजूरी के बाद उसे बेंगलुरु ले जाया गया। वहां टेस्ट हुआ और उसने टेस्ट के दौरान कई चौंकाने वाली जानकारी दी।

इन्हें बनाया गया आरोपी
पुलिस ने बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा के अलावा सुलोचना आडिल, किरण शर्मा, दुर्गा देवी, संगीता शर्मा, सविता शुक्ला, सरोजनी शर्मा, रीता तिवारी, नीरज जैन, संजय समेत अन्य को आरोपी बनाया गया है। सभी आरोपी जमानत पर बाहर है। कुछ लोगों की मौत हो चुकी है। कुछ लोग राज्य के बाहर हैं। इसमें बैंक स्टाफ को सरकारी गवाह बनाया गया है।

जिंदगी भर की कमाई जमा की
पुरानी बस्ती के रवि बिक्रम अग्रवाल ने कारोबार और खेती से मिले करीब सात लाख रुपए बैंक में जमा किए थे। उनकी कमाई का पैसा डूब गया। टिकरापारा के शंकर सोनकर ने अपनी पत्नी के नाम से खाता खुला वाया था। उन्होंने सब्जी बेच कर बच्चों की शादी के लिए पैसे जुटाए थे। उसे बैंक में जमा किया था। उन्हें एक भी पैसा नहीं मिला।

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