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खैरागढ़ में भाजपा को चार राज्यों में जीत का फायदा मिलने की उम्मीद, कांग्रेस को सरकार के काम पर भरोसा

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राजनांदगांव, 14 मार्च। खैरागढ़ उपचुनाव का बिगुल बजते ही सियासी दल प्रत्याशियों की तलाश में जुट गए हैं। कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होना है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की चुनावी तैयारी फिलहाल मैदान में नहीं दिख रही है। खैरागढ़ उपचुनाव दिवंगत नेता देवव्रत सिंह के निधन से रिक्त होने के चलते हो रहा है।

उपचुनाव में भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकार से दो-दो हाथ करना है। कांग्रेस प्रत्याशी के चेहरे के पीछे राज्य सरकार की पैतरेबाजी भी होगी। वहीं भाजपा को 5 राज्यों में आए चुनावी नतीजों से फायदा मिलने की उम्मीद है। चुनावी जानकार भी हाल के नतीजों को बेहद असरकारक मान रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस का चुनावी इतिहास काफी टकराव भरा रहा है। 1995 से 2022 के बीच खैरागढ़ में तीन उपचुनाव हुए हैं। 1995 में दिवंगत देवव्रत ङ्क्षसह ने अपनी माता रश्मिदेवी के स्वर्गवास से खाली हुए सीट से बाजी मारकर राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी। 2008 में सिंह के राजनांदगांव लोकसभा सांसद निर्वाचित होने के चलते खैरागढ़ में हुए उपचुनाव में भाजपा के कोमल जंघेल ने शानदार जीत दर्ज की थी। जंघेल ने स्व. सिंह की पूर्व पत्नी पदमादेवी सिंह को बड़े अंतर से पराजित किया था।

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इधर स्व. देवव्रत सिंह के निधन के कारण तीसरा उपचुनाव 12 अप्रैल को होना है। तकरीबन 30 साल के भीतर खैरागढ़ की जनता तीसरे उपचुनाव के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी। माना जा रहा है कि भाजपा इस चुनाव में पूरी ताकत लगाने की रणनीति के तहत मैदान में उतरेगी। राज्य सरकार भी काबिल चेहरे पर दांव लगाने के लिए मंथन कर रही है। पार्टी के भीतर नए और पुराने चेहरों की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का आंकलन किया जा रहा है। राजनीतिक रूप से राज्य गठन के बाद करीब 10 साल तक भाजपा का ही खैरागढ़ में दबदबा रहा है। कांग्रेस विधायक के तौर पर लंबा कार्यकाल स्व. देवव्रत का रहा।
2018 के विस चुनाव में देवव्रत ने छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर सीट पर जीत हासिल की, लेकिन वह अंदरूनी रूप से कांग्रेस के साथ ही रहे। ऐसे में उनके परिजन टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। खैरागढ़ राजपरिवार का क्षेत्रीय राजनीति में खासा दबदबा रहा है। वहीं जातिगत आधार पर भी टिकटों का फैसला किया गया। बीते कुछ सालों में लोधी समुदाय ने दोनों दल पर टिकट के लिए दबाव बनाया है। नतीजतन 2008 के विधानसभा में कांग्रेस से मोतीलाल जंघेल और भाजपा से कोमल जंघेल आमने सामने हुए। इस चुनाव में कोमल जंघेल ने ही बाजी मारी। इसके बाद 2013 के विस चुनाव में फिर से दोनों पार्टियों ने लोधी वर्ग से उम्मीदवारी तय की। इस चुनाव में कांग्रेस के गिरवर जंघेल ने कोमल जंघेल को मात दी।

2018 के विस चुनाव में देवव्रत सिंह विजयी हुए। इस तरह खैरागढ़ की सियासत में कांग्रेस की स्थिति हमेशा मजबूत रही है। राज्य में सत्तारूढ़ होने के बाद कांग्रेस की नींव फिर से सशक्त हो गई है। उधर भाजपा कांग्रेस सरकार के सत्तासीन होने के मद्देनजर मजबूत चेहरे की तलाश कर रही है। कांग्रेस भी हर हालत में खैरागढ़ में जीत का डंका बजाने पूरा जोर लगा रही है।

संभावित नामों में कांग्रेस से उत्तम सबसे आगे, भाजपा से विक्रांत और कोमल चर्चा में

लोधी बाहुल्य खैरागढ़ सीट के लिए संभावित नामों में कांग्रेस से उत्तम सिंह की भी मजबूत दावेदारी है। इसके अलावा लोधी समाज से पूर्व विधायक गिरवर जंघेल, नगर पालिका अध्यक्ष शैलेंद्र वर्मा, नीलांबर वर्मा सहित कई नाम है।
दूसरी तरफ, भाजपा से जिला पंचायत उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह और कोमल जंघेल के नामों की चर्चा है। कांग्रेस से गिरवर जंघेल का नाम भी सामने आ रहा है। पिछले चुनाव में मिली करारी हार से उनका दावा कमजोर हो रहा है। पिछले विधानसभा में गिरवर तीसरे नंबर तक खिसक गए थे। विधायक रहते उनके कामकाज से न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ता बल्कि क्षेत्र की जनता भी नाराज थी। उत्तम सिंह ठाकुर का नाम पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है। उत्तम लगातार खैरागढ़ विधानसभा का धुंआधार दौरा कर रहे हैं। कई तरह के कार्यक्रमों और सामाजिक सरोकार से जुड़े आयोजनों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। इधर भाजपा से विक्रांत सिंह एक अच्छे चेहरे के रूप में सामने आए हैं। वहीं कोमल जंघेल को भी प्रबल दावेदार माना जा रहा है। ऐसी चर्चा है कि भाजपा कांग्रेस के टिकट के ऐलान के बाद ही अपने उम्मीदवार का नाम का ऐलान करेगी।

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