कलेक्टर अजीत वसंत की जांच ने ढहाया भू-माफिया का ‘कागजी किला’—तालाब और आदिवासी भूमि के फर्जीवाड़े में आजाद इराकी गिरफ्तार

6.25 एकड़ तालाब की जमीन हथियाने की कथित साजिश बेनकाब; फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र, कूटरचित वंशावली और ₹40 लाख के सौदे का पुलिस का दावा
कलेक्टर कार्यालय की जांच बनी निर्णायक आधार—मणिपुर थाना, साइबर सेल और रायपुर पुलिस के संयुक्त अभियान में आरोपी रायपुर से गिरफ्तार; अब फरार साझेदारों की बारी!
अंबिकापुर। नगर निगम के मास्टर प्लान और शासकीय अभिलेखों में दर्ज 6.25 एकड़ तालाब क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजाति की कीमती भूमि को कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे हथियाने की साजिश पर आखिरकार कानून का शिकंजा कस गया। कलेक्टर सरगुजा अजीत वसंत के प्रशासन में कलेक्टर कार्यालय द्वारा कराई गई जांच के आधार पर मणिपुर थाना पुलिस ने गंभीर धाराओं में अपराध दर्ज किया। इसके बाद मणिपुर थाना, साइबर सेल और रायपुर पुलिस के संयुक्त अभियान में वांछित आरोपी आजाद इराकी को रायपुर से गिरफ्तार कर लिया गया।
यह कार्रवाई केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक तालाब और आदिवासी भूमि को कथित कागजी हेरफेर से निजी संपत्ति में बदलने वाले जमीनखोरी तंत्र पर प्रशासन एवं पुलिस का बड़ा प्रहार है। इस पूरे मामले में कलेक्टर अजीत वसंत के नेतृत्व वाले जिला प्रशासन और कलेक्टर कार्यालय की जांच ने कथित फर्जीवाड़े की परतें खोलने तथा आपराधिक कार्रवाई का रास्ता तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
तालाब की जमीन पर ‘कागजी मौत’ और फर्जी वारिसों का खेल!
पुलिस के अनुसार, अंबिकापुर स्थित प्रतीक्षा बस स्टैंड के पास खसरा क्रमांक 3714, रकबा लगभग 0.250/0.231 हेक्टेयर, नगर निगम के मास्टर प्लान-2021 और तालाबों की शासकीय सूची में दर्ज 6.25 एकड़ तालाब क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा है। इस भूमि का उपयोग वर्षों से स्थानीय निवासियों द्वारा निस्तारी, स्नान और छठ पूजा जैसे धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए किया जाता रहा है। इसके बावजूद कथित भूमाफिया तंत्र ने सार्वजनिक उपयोग की इस जमीन पर कागजी कब्जे की ऐसी पटकथा लिखी, जिसमें असली भू-स्वामी की पहचान से लेकर मृत्यु प्रमाणपत्र, वंशावली, नामांतरण और पंजीयन तक पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
कलेक्टर कार्यालय की जांच में खुलीं कथित फर्जीवाड़े की परतें
कलेक्टर कार्यालय द्वारा कराई गई जांच में सामने आया कि संबंधित भूमि वर्ष 1954-55 के पूर्व के राजस्व अभिलेखों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के भू-स्वामी जैलाल पिता बोधन गोंड़ के नाम दर्ज थी।
आरोप है कि भूमि को हड़पने के लिए मूल भू-स्वामी का कथित फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार कराया गया। इसके बाद एक अन्य व्यक्ति जयलाल पिता देवराम की वंशावली और नामांतरण का दुरुपयोग करते हुए कुछ लोगों ने स्वयं को वारिस के रूप में प्रस्तुत किया।
पुलिस के मुताबिक, विक्रेता चंद्रशेखर यादव एवं अन्य सह-खातेदारों के साथ मिलकर अनुसूचित जनजाति की भूमि को गैर-अनुसूचित जनजाति व्यक्ति के नाम पंजीकृत कराया गया तथा कथित रूप से अवैध अंतरण और फर्जी बैनामा निष्पादित किया गया। यदि पुलिस जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल जमीन की खरीद-बिक्री में धोखाधड़ी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि तालाब जैसी सार्वजनिक धरोहर और अनुसूचित जनजाति की संरक्षित भूमि पर सुनियोजित कागजी डकैती का गंभीर प्रकरण होगा।
₹40 लाख में कथित सौदा—फर्जी दस्तावेजों की जानकारी होने का पुलिस का दावा
तकनीकी सूचनाओं के आधार पर पुलिस ने आरोपी के संभावित ठिकानों का पता लगाया। मणिपुर थाना और साइबर सेल की संयुक्त टीम ने रायपुर पुलिस के सहयोग से दबिश देकर आजाद इराकी को रायपुर से पकड़ा।
गिरफ्तार आरोपी की पहचान आजाद इराकी, पिता रियाजुद्दीन इराकी, उम्र 43 वर्ष, निवासी मस्जिद मोहल्ला जयनगर, थाना जयनगर, जिला सूरजपुर के रूप में की गई है। पुलिस का दावा है कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपने मेमोरेंडम कथन में विवादित जमीन का ₹40 लाख में सौदा करने की बात स्वीकार की, जबकि उसे भूमि से संबंधित दस्तावेजों के फर्जी एवं कूटरचित होने की जानकारी थी। पर्याप्त साक्ष्य मिलने का दावा करते हुए पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया है।
मणिपुर थाने में गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज
कलेक्टर कार्यालय की जांच के बाद आवेदक की रिपोर्ट पर मणिपुर थाने में अपराध क्रमांक 168/2026 दर्ज किया गया है। प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2) एवं 61(2) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना की जा रही है। डीआईजी एवं एसएसपी सरगुजा राजेश अग्रवाल के निर्देशन में मणिपुर थाना और साइबर सेल की संयुक्त टीम गठित की गई थी। टीम द्वारा तकनीकी जानकारी और आरोपी के संभावित ठिकानों की पड़ताल के बाद रायपुर में कार्रवाई की गई।
कलेक्टर अजीत वसंत की जांच ने दिखाया—रिकॉर्ड बोलते हैं तो भू-माफिया का कागजी साम्राज्य कांपता है!
इस प्रकरण में कलेक्टर कार्यालय की जांच ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि राजस्व रिकॉर्ड, नगर निगम के मास्टर प्लान, पुरानी वंशावली, मृत्यु प्रमाणपत्र, नामांतरण और पंजीयन दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो तो कथित जमीनखोरी का कितना भी चालाक कागजी षड्यंत्र क्यों न हो, उसकी परतें खोली जा सकती हैं। कलेक्टर अजीत वसंत के नेतृत्व वाले जिला प्रशासन द्वारा कराई गई जांच ने वह आधार तैयार किया, जिसके बाद एफआईआर दर्ज हुई और वांछित आरोपी की गिरफ्तारी तक कार्रवाई पहुंची।
अब जनहित का बड़ा प्रश्न यह है कि कथित फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र और कूटरचित वंशावली तैयार करने वालों, संदिग्ध नामांतरण को आगे बढ़ाने वालों, पंजीयन में सहयोग करने वालों और पूरे सौदे के पर्दे के पीछे बैठे कथित सूत्रधारों पर कानून का शिकंजा कब कसेगा?
गिरफ्तारी शुरुआत है—पूरा नेटवर्क सामने आना अभी बाकी
पुलिस के अनुसार प्रकरण में शामिल अन्य आरोपी अभी फरार हैं। उनकी सरगर्मी से तलाश की जा रही है और पुलिस ने शीघ्र गिरफ्तारी का दावा किया है। .लेकिन इस मामले की जांच केवल जमीन खरीदने और बेचने वालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
जांच में इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी सामने आने चाहिए—
– कथित फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र किसने, कब और किन दस्तावेजों के आधार पर बनवाया?
– कूटरचित वंशावली तैयार करने और उसे सरकारी रिकॉर्ड में इस्तेमाल करने वाले कौन हैं?
– अनुसूचित जनजाति की भूमि के अंतरण संबंधी वैधानिक प्रतिबंधों की अनदेखी कैसे हुई?
– तालाब की शासकीय स्थिति और नगर निगम के मास्टर प्लान का सत्यापन किए बिना पंजीयन कैसे आगे बढ़ा?
– नामांतरण और पंजीयन प्रक्रिया में किन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका रही?
– ₹40 लाख के कथित सौदे में भुगतान किस माध्यम से हुआ और धनराशि किन-किन लोगों तक पहुंची?
– क्या इस जमीन के पीछे कोई संगठित भू-माफिया, बिचौलिया तंत्र या प्रभावशाली संरक्षण सक्रिय था?
– तालाब को पाटने अथवा उसका स्वरूप बदलने में किन लोगों, मशीनों और एजेंसियों की भूमिका रही?
तालाब जनता की धरोहर—इसे निजी जागीर बनाने वालों पर हो कठोरतम कार्रवाई
तालाब केवल राजस्व अभिलेखों में दर्ज जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वह शहर की जल संरचना, भूजल संरक्षण, पर्यावरण, धार्मिक आस्था और आम जनता के निस्तारी अधिकार से जुड़ी सार्वजनिक धरोहर है।
इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति की भूमि को कानून ने विशेष संरक्षण दिया है। यदि ऐसी जमीन को फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र, कूटरचित वंशावली और संदिग्ध नामांतरण के सहारे गैर-अनुसूचित जनजाति व्यक्ति के नाम पहुंचाने का प्रयास किया गया है, तो यह व्यवस्था की आंखों में धूल झोंकने वाला अत्यंत गंभीर अपराध है। आजाद इराकी की गिरफ्तारी इस कथित साजिश की पहली बड़ी कड़ी है; लेकिन न्याय तभी पूरा होगा, जब फर्जी दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला, प्रत्येक लाभार्थी, हर बिचौलिया और पर्दे के पीछे बैठा प्रत्येक सहयोगी कानून के कटघरे तक पहुंचेगा।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग
कलेक्टर अजीत वसंत की अध्यक्षता में राजस्व विभाग, नगर निगम, पंजीयन विभाग और पुलिस की संयुक्त उच्चस्तरीय जांच टीम गठित की जाए।
तालाब क्षेत्र का राजस्व एवं नगर निगम अभिलेखों के आधार पर तत्काल सीमांकन कराया जाए। कथित फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र, वंशावली, नामांतरण आदेश और पंजीयन दस्तावेजों का फोरेंसिक परीक्षण हो। संदिग्ध नामांतरण एवं पंजीयन निरस्त करने की वैधानिक प्रक्रिया प्रारंभ की जाए तथा तालाब एवं अनुसूचित जनजाति की भूमि को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित किया जाए। साथ ही संबंधित अवधि के राजस्व और पंजीयन अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही निर्धारित करते हुए दोष प्रमाणित होने पर विभागीय एवं आपराधिक कार्रवाई की जाए। कथित ₹40 लाख के सौदे की बैंकिंग एवं आर्थिक जांच भी हो, ताकि यह सामने आ सके कि रकम कहां से आई और किन लोगों तक पहुंची।
यह केवल जमीन का मामला नहीं—अंबिकापुर की सार्वजनिक धरोहर, आदिवासी अधिकार और प्रशासनिक विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा है।
कलेक्टर अजीत वसंत की जांच से शुरू हुई कार्रवाई अब कथित भू-माफिया नेटवर्क की अंतिम कड़ी तक पहुंचनी चाहिए। तालाब पाटने और आदिवासी भूमि पर कागजी कब्जे का खेल खेलने वालों के लिए संदेश साफ होना चाहिए—सरकारी अभिलेखों से खिलवाड़ कर जनता की धरोहर लूटने वाला कोई भी चेहरा कानून से बड़ा नहीं है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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