गेवरा–दीपका की कोयला खदानों में कथित ‘गब्बर टैक्स’!

हर DO, हर टन पर ₹12 से ₹40 तक कथित अवैध वसूली—कोयला SECL का, लेकिन ‘रेट कार्ड’ किस सिंडिकेट का?
तकनीकी और बिक्री शाखा से जुड़े कथित किरदारों के संरक्षण में पूरा खेल चलने का दावा—दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ जल्द होगा नामों का बड़ा खुलासा!
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोयला धरती के नीचे है, लेकिन उसके ऊपर कथित भ्रष्टाचार की फसल पूरी ताकत से लहलहा रही है!
क्या फिर दस्तक देंगी ED और दूसरी जांच एजेंसियां? पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में कथित ₹25 प्रति टन कोल-लेवी का मामला सामने आने के बाद ED सहित विभिन्न जांच एजेंसियों ने छापे, पूछताछ, गिरफ्तारी और संपत्ति संबंधी कार्रवाई की थी। उस प्रकरण ने यह दिखा दिया था कि प्रति टन की छोटी दिखाई देने वाली रकम जब लाखों टन कोयले से जुड़ती है, तो कथित अवैध वसूली का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच सकता है।
अब गेवरा–दीपका में प्रत्येक DO और प्रत्येक टन पर ₹12 से ₹40 तक की कथित वसूली के आरोप सामने आ रहे हैं। यदि इसके दस्तावेज, डिजिटल संवाद, बैंकिंग लेन-देन, नकद संग्रह और अधिकारियों-बिचौलियों की कथित धन-शृंखला प्रमाणित होती है, तो यह मामला केवल विभागीय जांच तक सीमित रहने वाला नहीं दिखाई देता।
पहले कथित ₹25 प्रति टन की लेवी ने जांच एजेंसियों को दरवाजे तक पहुंचाया था—अब ₹12 से ₹40 प्रति टन के आरोप सही निकले तो कितने दरवाजों पर दस्तक होगी?
सूत्रों के दावों और संभावित साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में ED, CBI, CIL Vigilance अथवा दूसरी सक्षम जांच एजेंसियों की बड़ी कार्रवाई देखने को मिल सकती है। हालांकि ऐसी किसी कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। SECL की गेवरा और दीपका कोयला खदानों से सामने आ रहे गंभीर आरोप बताते हैं कि यहां सरकारी दरों के साथ कथित रूप से एक निजी “रेट कार्ड” भी लागू है। सूत्रों का सनसनीखेज दावा है कि प्रत्येक डिलीवरी ऑर्डर—यानी DO—से जुड़े प्रत्येक टन कोयले पर ₹12 से ₹40 तक की कथित अवैध रकम मांगी अथवा वसूली जा रही है। कथित रकम को “कोयला अलाव” जैसे सांकेतिक नाम से पुकारे जाने की भी चर्चा है।
अब सवाल है—
यह “कोयला अलाव” किस नियम की आग में जल रहा है और उसकी गर्मी किन-किन अधिकारियों की जेब तक पहुंच रही है?
यदि यह कोई अधिकृत शुल्क है तो SECL उसकी अधिसूचना, निर्धारित दर और रसीद सार्वजनिक करे। यदि ऐसा कोई शुल्क नहीं है तो फिर प्रत्येक टन पर कथित रकम वसूलने वाले कौन हैं—और उन्हें संरक्षण देने वाला असली चेहरा किस ऊंची कुर्सी पर बैठा है?
कोयला सरकारी, DO सरकारी—फिर कथित टैक्स प्राइवेट क्यों?
SECL का कोयला निर्धारित मूल्य, कर और अधिकृत शुल्क के साथ वैधानिक प्रक्रिया से बेचा जाता है। प्रत्येक भुगतान का लेखा और रसीद होनी चाहिए। लेकिन सूत्रों के आरोप सही हैं तो गेवरा–दीपका में सरकारी बिक्री व्यवस्था के समानांतर कथित “कैश कलेक्शन सिस्टम” चल रहा है—DO सरकारी, कोयला सार्वजनिक संपत्ति, वाहन कारोबारी का, लेकिन प्रत्येक टन पर कथित हिस्सा किसी अदृश्य सिंडिकेट का! सूत्र दावा करते हैं कि रकम की दर हर व्यक्ति के लिए समान नहीं है। किसी से ₹12, किसी से ₹20 या ₹25 और किसी से ₹40 प्रति टन तक की कथित मांग होती है। यानी कथित भ्रष्टाचार ने भी अब “डायनामिक प्राइसिंग” सीख ली है!
कारोबारी जितना मजबूर, कथित टैक्स उतना भरपूर!
जिसने सवाल उठाया, उसका उठाव उलझाया; जिसने कथित रकम पहुंचाई, उसकी राह आसान बनाई!
बिक्री कार्यालय या कथित ‘कलेक्शन कंट्रोल रूम’?
सूत्रों का आरोप है कि यह कथित वसूली किसी अकेले कर्मचारी की जेब गर्म करने का छोटा खेल नहीं है। इसके पीछे तकनीकी और बिक्री व्यवस्था से जुड़े कुछ लोगों का संगठित गठजोड़ तथा संरक्षण काम कर रहा है।
कथित सिंडिकेट में हर किरदार की भूमिका पहले से तय बताई जाती है—
कौन DO धारक से संपर्क करेगा,
कौन कथित दर बताएगा,
कौन भुगतान का दबाव बनाएगा,
कौन वाहन अथवा कोयला उठाव में बाधा पैदा करेगा,
कौन कथित रकम इकट्ठी करेगा,
और कौन ऊपर तक हिस्सेदारी पहुंचाएगा। यदि आरोपों में सच्चाई है तो गेवरा–दीपका में कोयला प्रबंधन कम और कथित “गब्बर टैक्स प्राइवेट लिमिटेड” अधिक सक्रिय दिखाई देती है! बाहर बोर्ड SECL का, भीतर कथित हिसाब सिंडिकेट का!
तकनीकी जांच कोयले की या कारोबारी की जेब की?
तकनीकी शाखा का काम नियमों, गुणवत्ता और संचालन की निगरानी करना है। लेकिन आरोप हैं कि प्रभावशाली पदों और प्रक्रियात्मक अधिकारों का इस्तेमाल कथित दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
SECL बताए—
क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी को वाहन रोकने, प्रक्रिया लंबित रखने, कमियां निकालने अथवा कोयला उठाव प्रभावित करने की ऐसी शक्ति प्राप्त है जिसका इस्तेमाल कथित रकम वसूलने के लिए किया जा सके?
क्या भुगतान से इनकार करने वाले कारोबारियों के DO, वाहनों और उठाव की प्रक्रिया में असामान्य देरी हुई?
क्या तकनीकी कर्मचारियों का खरीदारों, ट्रांसपोर्टरों अथवा कथित वसूली करने वाले बाहरी लोगों से संपर्क जांचा गया?
तकनीकी निरीक्षण कोयले का हो रहा है या व्यापारी की भुगतान-क्षमता का?
‘कोयला अलाव’ की रसीद कहां है?
यदि प्रत्येक टन पर ₹12 से ₹40 तक कथित रकम ली जा रही है तो SECL प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए—
“कोयला अलाव” किस सरकारी नियम या परिपत्र में दर्ज है?
इसकी दर किस अधिकारी ने निर्धारित की?
रकम SECL के किस खाते में जमा होती है?
क्या खरीदार को इसकी वैधानिक रसीद मिलती है?
अलग-अलग DO धारकों के लिए कथित दर अलग क्यों है?
भुगतान से मना करने पर क्या वाहन या उठाव प्रभावित किया जाता है?
यदि SECL के रिकॉर्ड में ऐसा कोई शुल्क नहीं है, तो फिर कथित रकम सीधे रिश्वत और पद के दुरुपयोग की जांच का विषय बनती है।
रसीद नहीं, नियम नहीं, सरकारी खाता नहीं—फिर कथित रकम किसके लिए और किसके आदेश पर?
नीचे कलेक्शन, बीच में संरक्षण, ऊपर हिस्सेदारी?
सूत्रों का दावा है कि कथित व्यवस्था कई स्तरों पर काम कर रही है। नीचे संपर्क और वसूली, बीच में प्रक्रिया तथा संरक्षण और ऊपर कथित हिस्सेदारी का हिसाब! यदि यह दावा सही है तो किसी एक छोटे कर्मचारी को निलंबित कर प्रकरण बंद करना असली दोषियों को बचाने का तरीका होगा।
जांच का दायरा उन सभी तक पहुंचना चाहिए—
जिन्होंने कथित रकम मांगी, जिन्होंने रकम एकत्र की, जिन्होंने भुगतान नहीं करने वालों का काम रोका, जिन्होंने नियमविरुद्ध सुविधा दी, जिन्होंने शिकायतों को दबाया, और जिन तक कथित हिस्सेदारी पहुंचाई गई।
पद किसी का, पकड़ किसी की और कथित पर्स का पासवर्ड किसी तीसरे के पास—गेवरा–दीपका आखिर चला कौन रहा है?
प्रत्येक टन पर कथित कमाई—आंकड़ा करोड़ों में?
इस पूरे मामले की गंभीरता समझने के लिए सामान्य गणना ही पर्याप्त है। यदि किसी अवधि में 10 लाख टन कोयला उठाया गया हो तो— ₹12 प्रति टन पर कथित रकम ₹1.20 करोड़, ₹25 प्रति टन पर ₹2.50 करोड़, और ₹40 प्रति टन पर ₹4 करोड़ होती है। गेवरा और दीपका जैसी विशाल खदानों का वास्तविक उठाव इससे कई गुना अधिक हो सकता है। इसलिए कथित वसूली का कुल आकार करोड़ों से आगे भी जा सकता है। SECL Vigilance को पिछले दो वर्षों के सभी DO की मात्रा से ₹12, ₹25 और ₹40 प्रति टन के आधार पर संभावित रकम का तुलनात्मक आकलन करना चाहिए। तभी पता चलेगा कि यह कथित “अलाव” कुछ हजार रुपये का है या इसकी आग करोड़ों रुपये निगल चुकी है! जांच से पहले डिजिटल सबूत सुरक्षित किए जाएं
यदि SECL प्रबंधन वास्तव में निष्पक्ष जांच चाहता है तो सबसे पहले संभावित सबूत सुरक्षित करे—
पिछले दो वर्षों के सभी DO और वास्तविक उठाव का रिकॉर्ड, weighbridge एवं gate-entry logs, वाहनों के प्रवेश और निकासी का डेटा, संवेदनशील स्थानों की CCTV फुटेज, संबंधित कर्मचारियों की ड्यूटी और तैनाती, आधिकारिक तथा संदिग्ध निजी संचार, शिकायत करने वाले कारोबारियों के बयान, संदिग्ध बैंक, UPI और नकद लेन-देन, संबंधित अधिकारियों तथा निकटस्थ व्यक्तियों की असामान्य संपत्ति वृद्धि। देरी हुई तो CCTV मिट सकता है, डिजिटल लॉग बदले जा सकते हैं, गवाहों पर दबाव बनाया जा सकता है और कथित नकदी का रास्ता बदल सकता है। इसलिए जांच की घोषणा नहीं, तत्काल रिकॉर्ड संरक्षण जरूरी है।
कौन हैं कथित ‘गब्बर टैक्स’ के किरदार?
गेवरा और दीपका क्षेत्र में तकनीकी तथा बिक्री व्यवस्था से जुड़े कुछ व्यक्तियों के नाम सूत्रों ने बताए हैं। उनके पद, कार्यक्षेत्र, DO प्रक्रिया में कथित भूमिका और संरक्षण संबंधी सूचनाओं का दस्तावेजी परीक्षण किया जा रहा है। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जल्द ही साक्ष्यों, पदनाम और संबंधित आरोपों के साथ इन कथित किरदारों के नामों का बड़ा खुलासा करेगा। यह खुलासा केवल नाम प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रहेगा। पड़ताल यह भी सामने लाने का प्रयास करेगी—
किस व्यक्ति की क्या कथित भूमिका है, किसके संपर्क में कौन रहता है, भुगतान की कथित मांग कैसे पहुंचती है, कौन प्रक्रिया प्रभावित कर सकता है, और कथित रकम की अंतिम मंजिल कहां है। अभी चेहरे पर्दे में हैं—लेकिन दस्तावेज बोलेंगे तो कथित सिंडिकेट के मुखौटे एक-एक कर उतरेंगे!
SECL के सामने सीधे सवाल
1. क्या गेवरा और दीपका में प्रति टन अतिरिक्त नकद रकम वसूलने की शिकायत मिली है?
2. क्या “कोयला अलाव” नाम की कोई अधिकृत मद या शुल्क अस्तित्व में है?
3. पिछले दो वर्षों में कितने DO जारी हुए और कुल कितना कोयला उठा?
4. भुगतान से इनकार करने वाले कारोबारियों के उठाव में देरी या बाधा आई?
5. तकनीकी एवं बिक्री शाखा के कर्मचारियों की भूमिका का स्वतंत्र ऑडिट कब हुआ?
6. क्या संबंधित अधिकारियों को जांच तक संवेदनशील पदों से अलग किया जाएगा?
7. क्या CIL Vigilance अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाएगी?
8. क्या शिकायतकर्ताओं और गवाहों की पहचान सुरक्षित रखी जाएगी?
9. क्या कथित अवैध रकम की धन-शृंखला और संपत्ति की जांच होगी?
10. क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी या फाइल को कोयले की धूल के नीचे दबा दिया जाएगा?
‘Zero Tolerance’ का बोर्ड चमक रहा है—कथित कलेक्शन काउंटर कब बंद होगा?
Coal India भ्रष्टाचार के विरुद्ध “Zero Tolerance” की नीति का दावा करता है। लेकिन गेवरा–दीपका से उठ रहे आरोप पूछ रहे हैं—
Zero Tolerance भ्रष्टाचार करने वालों के लिए है या उसकी शिकायत करने वालों के लिए? यदि आरोप झूठे हैं तो निष्पक्ष जांच कर्मचारियों और संस्था की प्रतिष्ठा साफ कर देगी। लेकिन यदि आरोप सही निकले तो कार्रवाई केवल निचले स्तर पर नहीं रुकनी चाहिए।
पूरी कथित धन-शृंखला खोलनी होगी—
किसने दिया?
किसने मांगा?
किसने वसूला?
किसने रास्ता साफ किया?
किसे हिस्सा मिला?
और अंतिम संरक्षण किसने दिया?
कोयला खदान चल रही है या कथित ‘गब्बर टैक्स कंपनी’?
गेवरा और दीपका केवल कोरबा नहीं, देश की महत्वपूर्ण कोयला खदानों में शामिल हैं। यदि यहां प्रत्येक DO और प्रत्येक टन पर कथित निजी टैक्स वसूला जा रहा है, तो यह सामान्य भ्रष्टाचार नहीं—सार्वजनिक संसाधन के ऊपर खड़ी समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था का आरोप है। कोयला काला होता है, यह सभी जानते हैं। लेकिन आरोप सही निकले तो उससे कहीं अधिक काला होगा वह कथित रजिस्टर, जिसमें प्रत्येक टन के साथ किसी अधिकारी, कर्मचारी, बिचौलिए और संरक्षक का हिस्सा लिखा जाता है!
गेवरा–दीपका में कोयला निकल रहा है या प्रत्येक टन के साथ कथित ‘गब्बर टैक्स’ भी खोदा जा रहा है?
नाम अभी सुरक्षित हैं, जांच जारी है और दस्तावेज खंगाले जा रहे हैं—जल्द होगा कथित वसूली तंत्र के किरदारों का बड़ा खुलासा! ग्राम यात्रा का अगला खुलासा
गेवरा–दीपका ही नहीं—ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जल्द खोलेगा पूरे कोल माइंस तंत्र में कथित करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार की पोल! हर DO का हिसाब, प्रत्येक टन का कथित रेट, वसूली करने वाले चेहरे, संरक्षण देने वाली कुर्सियां और रकम की कथित अंतिम मंजिल—दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ परत-दर-परत सामने लाई जाएगी। चेहरे अभी पर्दे में हैं, लेकिन दस्तावेज तैयार हैं—जल्द होगा नामों सहित बड़ा खुलासा!
बने रहिए ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के साथ क्योंकि कोयले की काली परतों के नीचे दबे कथित भ्रष्टाचार का सच अभी बाकी है!
कानूनी-संपादकीय टिप्पणी..
गेवरा और दीपका में प्रत्येक DO अथवा प्रति टन ₹12 से ₹40 की कथित वसूली, “कोयला अलाव”, सिंडिकेट तथा संरक्षण संबंधी बातें सूत्र-आधारित आरोप हैं। इनका स्वतंत्र दस्तावेजी सत्यापन और सक्षम एजेंसी की जांच अभी अपेक्षित है। किसी भी संबंधित व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया गया है। SECL प्रबंधन तथा संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। आरोपों का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय ही करेगा।
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